जयमल और फत्ता – अकबर की सेना के दाँत खट्टे करने वाले वीर।

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जयमल और फत्ता ही नहीं, चित्तौड़गढ़ के कण कण में इतिहास बसा हुआ है। लेकिन कुछ इतिहासकारों ने जयमल और फत्ता की वीरता और शौर्य को दबाने के लिए इतिहास के पन्नों से इनका नाम गायब ही कर दिया था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर जयमल और फत्ता महल आज जर्जर अवस्था में है और इसकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। जयमल और फत्ता  ने अकबर की सेना के दांत खट्टे कर दिए थे।

जयमल और फत्ता कौन थे या जयमल और फत्ता का किस्सा –

सबसे पहले आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जयमल और फत्ता दोनों अलग अलग व्यक्ति थे। कई लोग जयमल फत्ता को एक ही समझते हैं जो सही नहीं है। अगर जयमल राठौड़ मेड़तिया की बात की जाए तो यह बदनोर के रहने वाले थे और कृष्ण भक्त मीराबाई के चचेरे भाई भी थे। फत्ता का पूरा नाम फतेह सिंह सिसोदिया था।

मेड़ता पर मालदेव का आक्रमण –

1544 ईस्वी में जयमल राठौड़ मेड़तिया मेड़ता (पिता वीरमल की मृत्यु के पश्चात) के राजा बने इस समय जोधपुर के राजा मालदेव लगातार अपनी सेना बढ़ा रहे थे और मेड़ता को जीतकर अपने राज्य में मिलाना चाहते थे।

इस बात का अंदेशा जब जयमल राठौड़ मेड़तिया को हुआ तो उन्होंने सोचा कि मालदेव की विशाल सेना से टक्कर लेना आसान नहीं है।

मालदेव से टक्कर लेने के लिए जयमल ने बीकानेर के शासक राव कल्याणमल को अपनी सहायता के लिए बुलाया।

कल्याणमल भी उनकी सहायता के लिए राजी हो गया लेकिन जयमल राठौड़ नहीं चाहते थे कि जन-धन की हानि हो इसलिए उन्होंने मालदेव को संधि के लिए बोला।

लेकिन मालदेव ने उनकी बात नहीं मानी और मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। यह देख कर जयमल राठौड़ मेड़तिया ने भी अपनी छोटी सी सेना के साथ जोधपुर की सेना पर धावा बोल दिया और इनकी यह उनकी वीरता का परिणाम था कि जोधपुर की सेना को पराजित कर दिया।

27 जनवरी 1557 का दिन था मालदेव ने मौका पाकर फिर से मेड़ता पर आक्रमण कर दिया और इस बार जयमल राठौड़ मेड़तिया की हार हुई।

मेड़ता बर मालदेव का अधिकार हो गया। मेड़ता पर अधिकार करने के पश्चात मालदेव ने मेड़ता के कुछ हिस्से पर अपना अधिकार रखा जबकि कुछ हिस्सा जयमल राठौड़ के भाई जगमाल राठौड़ को सौंप दिया।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जगमाल राठौड़ मालदेव के पक्ष में था और इसी का फायदा उसको मिला।

जयमल राठौड़ का मेवाड़ आगमन और अकबर से युद्ध-

जयमल राठौड़ मेड़तिया मेड़ता छोड़कर मेवाड़ चले गए। मेवाड़ में उस समय चित्तौड़गढ़ पर राणा उदय सिंह का शासन था। उदय सिंह ने इनको अपने साथ ले लिया और बदनौर की बागडोर उनके हाथों में सौंप दी।

यह उस समय की बात है जब चित्तौड़गढ़ पर महाराणा उदयसिंह का राज़ था। फिर महाराणा उदय सिंह ने चित्तौड़गढ़ छोड़ने का मन बना लिया और उदयपुर के लिए निकल पड़े।

इन्होंने उदयपुर को मेवाड़ की राजधानी बना दिया। जाने से पहले इन्होंने जयमल राठौड़ को चित्तौड़गढ़ का क़िलेदार बनाया और संपूर्ण चित्तौड़गढ़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी इनको सौंप दी।

26 अक्टूबर1567 ईस्वी में अकबर की सेना ने चित्तौड़गढ़ किले को चारों तरफ से घेर लिया लेकिन यह इतना मजबूत था कि लगभग 3 से 4 महीने तक अकबर की सेना इसके अंदर प्रवेश नहीं कर सकी।

अकबर की बेचैनी बढ़ने लगी और उसने तोप का सहारा लेकर किले की एक दीवार को तोड़ दिया ताकि किले के अंदर प्रवेश किया जा सके।

अकबर के पास एक बहुत अच्छी और विश्वसनीय बंदूक थी जिसका नाम “संग्राम” था। किले की टूटी हुई दीवार को ठीक करने का काम जल्द ही जयमल राठौड़ की देखरेख में शुरू हुआ।

एक समय की बात है जब स्वयं जयमल राठौड़ इस टूटी हुई दीवार का निरीक्षण करने के लिए वहां पर पहुंचे तो अकबर को एहसास हुआ कि यह शाही ड्रेस पहने इस किले का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है।

अकबर ने अपनी बंदूक संग्राम से इस व्यक्ति को घायल कर दिया यह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि वीर जयमल राठौड़ थे।

इनके घायल होते ही पूरे किले में यह बात आगे की तरह फैल गई और राजपूत सैनिकों को लगने लगा कि अब या तो मरना तय है या फिर वीरता के साथ ही युद्ध करना पड़ेगा। क्योंकि इनके पास मात्र 30000 सैनिक थे।

इस युद्ध में अकबर का साथ आमेर के राजा भगवानदास दे रहे थे। भगवान दास भली भांति जानते थे कि मेवाड़ी सपूत जान दे देंगे लेकिन हार नहीं मानेंगे।

चित्तौड़गढ़ के किले पर जोहर की तैयारी भी की जाने लगी। जिसे देखकर भगवान दास पूर्णतया समझ गए कि अब राजपूत सैनिक बिजली की तरह मुगल सेना पर टूट पड़ेंगे और जब तक मुगलों को यहां से खदेड़ नहीं देते, ये चैन की सांस नहीं लेंगे। अब इन्हें मरने का भी डर नहीं है।

फतेह सिंह सिसोदिया अर्थात फत्ता भी इस युद्ध में बिजली की तरह अकबर की सेना पर टूट पड़े और ऐसा भयंकर रौद्र रूप दिखाया कि भगवान दास को यकीन नहीं हो रहा था। कई मुगल सैनिकों को इन्होंने अपनी तलवार के दम पर मौत के घाट उतार दिया।

मुगल सेना से इस युद्ध में रायमल राठौड़ (मेड़तिया) और फतेह सिंह सिसोदिया वीरगति को प्राप्त हुए। पैर में गोली लगी होने की वजह से रायमल राठौड़ मेड़तिया वीर कल्लाजी राठौड़ के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे।

इस भीषण युद्ध में रायमल राठौड़ और फतेह सिंह सिसोदिया ने मुगल सेना में इतनी मारकाट मचाई कि इनकी वीरता देखकर मुगल सम्राट अकबर दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो गया। युद्ध में जयमल और पत्ता के मारे जाने के बाद अकबर ने इनको झुक कर प्रणाम किया।

 इस युद्ध में जयमल और फत्ता से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि ताज महल के सामने दोनों वीर योद्धाओं की हाथी पर बैठे हुए मूर्तियां बनवाई । मगर इनके बाद आए आक्रमणकारी औरंगजेब ने दोनों मूर्तियों को तुड़वा दिया।

इतिहास में जयमल और फत्ता का नाम साथ में लिया जाता हैं। जयमल और फत्ता ने अकबर को बहुत प्रभावित किया था।

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