तानाजी माळुसरे का इतिहास, Tanhaji History In Hindi.

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तानाजी माळुसरे का इतिहास,युद्ध और जीवनी-

तानाजी माळुसरे छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन के दोस्त थे। इन्हें छत्रपति शिवाजी का शेर भी कहा जाता हैं।

छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई के प्रण को पूरा करने के लिए अपने पुत्र का विवाह छोड़कर रणभूमि में भगवा लहराने के लिए निकल पड़े।

जन्म ( Tanhaji ka janm)- 1600 ईस्वी में, गोडोली,जवाली तालुका, सातारा जिले (महाराष्ट्र) में हुआ था।

पूरा नाम- तानाजी माळुसरे।

माता-पिता का नाम (Tanhaji ke mata pita)- इनके पिता का नाम सरदार देशमुख साहेब कोलाजी था जबकि माता का नाम पार्वती बाई था।

भाई का नाम (Tanhaji ka bhai ka naam)- सरदार सुर्याजी।

वीरगति ( Tanhaji ki mratyu kab hue)- 4 फ़रवरी 1670 सिंहगढ़(कोंढाणा) , पुणे।

उपाधि- छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में सूबेदार थे।

युद्ध कौनसा लड़े- सिंहगढ़ का युद्ध।

संताने – इनके पुत्र का नाम रायभा (रायबा) तथा पुत्री का नाम उमाबाई था।

26 अप्रैल 1645 के दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू स्वराज की स्थापना का प्रण किया था।

इसी दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए उन्होंने अपने आसपास के वीर योद्धाओं को एकत्रित करना शुरू किया।

उनकी इस लिस्ट में तानाजी माळुसरे का नाम सबसे ऊपर था। इतना ही नहीं तानाजी उनके बचपन के दोस्त थे। छत्रपति शिवाजी और तानाजी बचपन में साथ में खेला करते थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्य और शक्ति निरंतर बढ़ती जा रही थी। इससे चिंतित होकर मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने सूबेदार को आदेश दिया कि कैसे भी करके छत्रपति शिवाजी को रोका जाए।

जैसे-जैसे समय बीतता गया छत्रपति शिवाजी के अधीनस्थ से 23 किले अपने राज्य में मिला लिया।

इससे चिंतित होकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने 22 जून 1965 ईस्वी में महाराजा जयसिंह से पुरंदर की संधि की।

इस संधि के तहत शिवाजी महाराज को कोंढाणा नामक किला मुगलों के अधिनस्थ करना पड़ा।

इस संधि के बाद यह किला मुगलों के राजपूत शासक जय सिंह के हाथ में आ गया। छत्रपति  शिवाजी महाराज इस किले को पुनः प्राप्त करना चाहते थे।

सन 1670 ईसवी की बात है, तानाजी के एकमात्र पुत्र रायबा की शादी की तैयारियां जोरों पर चल रही थी।

घर और क्षेत्र के सभी लोग जश्न में डूबे हुए थे। तभी तानाजी को शिवाजी महाराज का संदेश मिलता है कि किसी भी हालत में कोंढाणा का किला जीतना है।

यह माता जीजाबाई का आदेश भी है। माता जीजाबाई ने यह प्रण लिया है कि जब तक कोंढाणा के किले से हरे रंग का झंडा उतार कर भगवा रंग का झंडा नहीं फहरा दिया जाता तब तक वह अन्न और जल ग्रहण नहीं करेगी।

यह बात सुनते ही तानाजी जी ने प्रण किया की युद्ध भूमि में जाएंगे और कोंढाणा किले को जीत कर ही वापस लौटेंगे।

अगर वापस नहीं लौटे तो छत्रपति शिवाजी महाराज मेरे पुत्र का विवाह करवाएंगे। यह प्रण लेकर तानाजी अपने मामा शेलार के साथ कोंढाणा दुर्ग की ओर निकल पड़े।

उनकी इस सेना में लगभग 342 सैनिक थे। जबकि कोंढाणा दुर्ग पर मुगल सेना के 5000 सैनिक दुर्ग की रक्षा में तैनात थे।

मुगल सेना का सेनापति था जय सिंह और जय सिंह के आदेशानुसार इस किले का दुर्गपाल उदय भान सिंह राठौड़ को बनाया गया। उदय भान अपनी सेना के साथ पूरी तरह मुस्तैद इस किले की रक्षा के लिए खड़ा था।

अगर कोंढाणा किले की बात की जाए तो यह 4304 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। तानाजी माळुसरे के साथ उनके भाई सूर्याजी भी 500 सैनिकों के इस किले पर लगभग 2300 फीट की ऊंचाई पर तानाजी का इंतजार कर रहे थे।

क्योंकि इस किले की निगरानी बड़ी मुस्तैदी के साथ की जा रही की थी। दिन के उजाले में इसके ऊपर चढ़ाई करना बहुत ही मुश्किल था। ऐसे में तानाजी और उनके सैनिकों ने रात के समय इस किले पर चढ़ाई करने का प्लान बनाया।

जैसे ही तानाजी माळुसरे इस किले के ऊपर पहुंचे मुगल सैनिकों और मराठा सैनिकों के बीच में युद्ध शुरू हो गया।  युद्ध के प्रारंभ में मुगल सैनिक भारी पड़ रहे थे।

ऐसे में अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए तानाजी जोर-जोर से वीरता के गाने गाने लगे, इस वजह से सभी मराठा सैनिकों में जोश और उत्साह की लहर दौड़ गई और उन्होंने 5000 मुगल सैनिकों को मार गिराया।

इतना ही नहीं युद्ध के दौरान तानाजी की ढाल टूट गई ऐसे समय में उन्होंने अपने सिर पर रखी पगड़ी को हाथ पर बांधा और इसे ही ढाल बना लिया। किलेदार उदयभान सिंह राठौड़ भी मारा गया।

अंततः तानाजी माळुसरे ने यह युद्ध जीत लिया और कोंढाणा के किले पर भगवा फहरा दिया। लेकिन इस युद्ध में तानाजी महाराज वीरगति को प्राप्त हुए। जब यह समाचार छत्रपति शिवाजी महाराज को मिला तो छत्रपति शिवाजी महाराज उनकी बहादुरी पर बहुत ही प्रसन्न हुए और दुखी भी हुए क्योंकि तानाजी अपने प्राण नहीं बचा सके।

तानाजी की मृत्यु का समाचार सुनकर छत्रपति शिवाजी महाराज के मुख से निकला “गढ़ आला पण सिंह गेला” इसका अर्थ था कि किला तो हमने जीत लिया लेकिन एक शेर को खो दिया। कोंढाणा किले का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिंहगढ़ रख लिया। यह नाम तानाजी माळुसरे महाराज को दिए गए उपनाम “सिंह” के आधार पर रखा गया।

 छत्रपति शिवाजी महाराज को और अधिक दुख तब हुआ जब उनको यह जानकारी प्राप्त हुई कि जब तानाजी युद्ध करने गए उस समय उनके पुत्र का विवाह चल रहा था। तानाजी की इच्छा अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज ने उनके पुत्र रायबा का विवाह संपन्न करवाया।

बन चुकी हैं बॉलीवुड फिल्म(Bollywood Film Tanhaji The Unsung Worrior)

तानाजी माळुसरे की वीरता से प्रभावित होकर हाल ही में अजय देवगन ने इनके ऊपर एक फ़िल्म का निर्माण किया था। इस फिल्म का नाम “तन्हाजी: द अनसंग वॉरियर” था।

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