बाजीराव पेशवा प्रथम का इतिहास और जीवन परिचय

बाजीराव पेशवा प्रथम (Bajirao Peshwa) को सभी 9 पेशवाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता हैं। प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ के पुत्र थे बाजीराव प्रथम। पेशवा का मतलब होता है प्रधानमंत्री। मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति रहे साहूजी महाराज के समय यह पेशवा रहे।

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बाजीराव पेशवा प्रथम का जीवन परिचय या बाजीराव प्रथम की जीवनी (Bajirao Peshwa History In Hindi)

बाजीराव पेशवा प्रथम का इतिहास सबसे अलग, मराठा और हिंदू साम्राज्य के लिए कुछ करने की ललक और छत्रपति शिवाजी महाराज की जिसमें देखने को मिलती थी झलक, ऐसे थे बाजीराव प्रथम पेशवा। बाजीराव के पिता बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात छत्रपति शाहूजी महाराज ने इन्हें मराठा साम्राज्य का द्वितीय पेशवा नियुक्त किया।

बाजीराव पेशवा प्रथम का पूरा नाम– पंतप्रधान श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी भट्ट।

बाजीराव प्रथम कौन था- प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ के पुत्र थे।

बाजीराव पेशवा प्रथम का जन्म कब हुआ– 18 अगस्त 1700 में इनका जन्म हुआ था। श्रीवर्धन नामक स्थान पर।

बाजीराव प्रथम की मृत्यु– 28 अप्रैल 1740 में। खरगोन में हुआ था।

बाजीराव प्रथम के पिता– इनके पिता का नाम “पेशवा बालाजी विश्वनाथ” था।

बाजीराव की माता का नाम– इनकी माता का नाम राधाबाई था।

Bajirao Peshwa First Height– 5 feet 10.86 Inches

बाजीराव पेशवा पत्नी – मस्तानी और काशीबाई।

बाजीराव पेशवा के वंशज या बाजीराव पेशवा के पुत्र/ Bajirao Peshwa Family Tree – बालाजी बाजी राव, शमशेर बहादुर प्रथम, रघुनाथ राव, जनार्दन राव।

प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ के सानिध्य में पले बढ़े बाजीराव बचपन से ही युद्ध कला के कौशल सीखते रहे। इनके आसपास के वातावरण में इन्हें युद्ध, तीरंदाजी और राजा महाराजाओं की कार्यप्रणाली देखने का अवसर मिलता था।

अपने पिता की भांति बाजीराव पेशवा प्रथम भी बचपन से ही निडर, दूरदर्शी, धैर्यवान और प्रबंधन कला में माहिर थे। बड़े होने के नाते भविष्य के पेशवा माने जाते थे।

जैसा कि बालाजी विश्वनाथ से प्रेरित होकर मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज ने यह नियम बना लिया था कि पेशवा का पद प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ के परिवार के लिए रिजर्व रहेगा।

जब बाजीराव छोटे थे तब इनको घुड़सवारी करना, तीरंदाजी करना, तलवार और भाला चलाना, बनेठी और लाठी का बहुत शौक था।

इनकी आयु जब 10 वर्ष से अधिक हुई तो यह अपने पिता के साथ रहने लगे और प्रत्येक कार्य में उनके साथ आते जाते रहते थे। बचपन में ही इन्होंने दरबारी चालों और रीति-रिवाजों को आत्मसात कर लिया था।

बाजीराव की आयु जब मात्र 20 वर्ष थी तब इनके पिता बालाजी विश्वनाथ का देहांत हो गया। बालाजी विश्वनाथ के देहांत के पश्चात बालाजी प्रथम को साहू जी महाराज ने द्वितीय पेशवा नियुक्त किया।

बाजीराव के पेशवा बनने के साथ ही “पेशवा” पद वंश परंपरा बन गया। पेशवा बनने के बाद बाजीराव ने अद्वितीय योग्यता का प्रदर्शन किया और अगले 20 वर्षों तक पेशवा पद पर बने रहे।

कहते हैं कि इस दौरान चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज का कार्यभार बिल्कुल कम हो गया था। संपूर्ण सैन्य और राज्य की देखरेख बाजीराव पेशवा प्रथम के सानिध्य में ही होती थी। और साहूजी महाराज का जीवन सिर्फ महल तक सीमित रह गया था।

पेशवा बाजीराव ने ना सिर्फ अच्छा नेतृत्व किया बल्कि मराठा साम्राज्य को निरंतर बढ़ाते रहें।
चिमाजी साहिब अप्पा जो कि इनके अनुज थे, के सहयोग से और जन्मजात नेतृत्व शक्ति,अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस,अभूतपूर्व संलग्नता मराठा साम्राज्य को इन्होंने संपूर्ण भारत वर्ष अर्थात हिंदुस्तान में सर्वशक्तिमान बना दिया था।

छत्रपति शिवाजी महाराज की झलक इनमें देखने को मिलती थी। जिस तरह से छत्रपति शिवाजी महाराज घुड़सवारी में माहिर थे और घोड़े पर बैठे बैठे जिस अंदाज में तीव्र गति से बाला चलाते थे,
वैसे ही बाजीराव भी घुड़सवारी और भाले में इतने माहिर थे कि घोड़े पर सवार होने के बाद इनके भाले का वार इतना तेज होता था कि दुश्मन सेना के सैनिक घोड़े सहित घायल होकर जमीन पर गिर पड़ते थे।

यह वह समय था जब भारत की जनता ना सिर्फ मुगलों से परेशान थी बल्कि अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने भी यहां पर पैर जमाना शुरू कर दिया था और जनता पर अत्याचार बढ़ा दिए थे।
बाजीराव प्रथम पेशवा के लिए यह राह आसान नहीं थी लेकिन उनकी वीरता के सामने यह कठिनाई ज्यादा बड़ी नहीं थी।

मुगलों का मुख्य कार्य हिंदू धर्म स्थलों पर तोड़फोड़ करना, जबरन धर्म परिवर्तन करना, छोटे बच्चों और महिलाओं के साथ अत्याचार करना था।

जबकि अंग्रेज और पुर्तगाली सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के खजाने खाली कर रहे थे। यहां की अपार धन संपदा और संसाधनों पर लगातार एकाधिकार जमाते जा रहे थे और अपने देश ले जा रहे थे।

ऐसे में पेशवा बाजीराव प्रथम ने बीड़ा उठाया और उत्तरी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक विजय पताका फहराया की पूरे भारत में उनके नाम का डंका बजने लगा और मुगलों के मन में डर बैठ गया।

पेशवा बाजीराव प्रथम में लोगों को छत्रपति शिवाजी महाराज की छवि नजर आने लगी। शिवाजी महाराज की तरह है यह अदम्य साहस के धनी थे और एक अपवाद को छोड़कर इनका चरित्र भी छत्रपति शिवाजी महाराज के समान था।

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छत्रपति शिवाजी महाराज का सपना

छत्रपति शिवाजी महाराज का सपना था कि “अटक से लेकर कटक” तक हिंदू साम्राज्य होना चाहिए। इस सपने को साकार करने का संकल्प लेकर और हर हर महादेव के साथ युद्धघोष करने वाले बाजीराव प्रथम ने इनके सपने को साकार कर दिखाया उत्तरी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक हिंदू स्वराज्य की विजय पताका फहराई।

बाजीराव पेशवा प्रथम से मुगल थरथर कहां पर थे इतना ही नहीं उनके मन में इनका इतना खौफ था कि इनसे मिलने से भी वह कतराते थे।

अपने जीवन काल में 41 लड़ाई लड़ने वाले बाजीराव प्रथम एक भी युद्ध में कभी पराजित नहीं हुए।
कहते हैं कि मेवाड़ी वीर महाराणा प्रताप और मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद अगर किसी योद्धा ने मुस्लिम शासकों के अत्याचारों का मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें खदेड़ने में कामयाब रहे तो वह है बाजीराव प्रथम।

बाजीराव प्रथम को “बाजीराव बल्लाल भट” या “थोरले बाजीराव” के नाम से भी जाना जाता है।इन्होंने निजाम, मोहम्मद बंगश के साथ साथ मुगलों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों को कई दफा पराजित किया और बहुत दूर तक खदेड़ दिया।

संपूर्ण भारत वर्ष के 80% हिस्से पर बाजीराव प्रथम का शासन था। कभी भी पराजित नहीं होने वाले बाजीराव प्रथम अर्थात बाजीराव बल्लाल भट अपने जीवन काल में हमेशा एक अपराजित योद्धा के रूप में याद किए जाएंगे।

बाजीराव पेशवा प्रथम की पत्नियां और परिवार

पेशवा बाजीराव बल्लाल भट का जन्म 18 अगस्त 1700 में हुआ था। इनके पिता श्री बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के प्रथम पेशवा थे। इनका संबंध चित्तबन कुल के ब्राह्मण परिवार से था।प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ जब पेशवा बने उस समय मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहूजी महाराज थे। पेशवा बाजीराव प्रथम के एक छोटा भाई भी था जिसका नाम चिमाजी अप्पा था।

पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट ने दो शादियां की थी। इनकी पहली पत्नी का नाम काशीबाई था। बाजीराव और काशीबाई के 4 पुत्र थे। सबसे बड़े पुत्र का नाम बालाजी बाजीराव प्रथम उर्फ नानासाहेब था। नाना साहेब का जन्म 1721 ईस्वी में हुआ था।

जब 1740 ईस्वी में बाजीराव बल्लाल भट की मृत्यु हो गई उसके पश्चात छत्रपति शाहूजी महाराज ने नानासाहेब पेशवा बनाया था। बाजीराव प्रथम के दूसरे बेटे का नाम रामचंद्र था रामचंद्र युवा अवस्था में ही परलोक सिधार गया था।

तीसरे पुत्र का नाम रघुनाथराव था, रघुनाथ राव ने सन 1773 74 में मराठा साम्राज्य के पेशवा पद को संभाला था। बाजीराव प्रथम और काशीबाई के चौथे पुत्र का नाम जनार्दन था जनार्दन की भी जवानी में ही मौत हो गई थी।

बाजीराव प्रथम की दूसरी शादी की कहानी बहुत ही दिलचस्प है। इस शादी को कभी भी मराठा और ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं की थी।बाजीराव ने दूसरी शादी बुंदेलखंड के हिंदू सम्राट छत्रसाल और छत्रसाल की मुस्लिम पत्नी रूहानी की पुत्री, मस्तानी से की थी।

मस्तानी से बेहद प्रेम होने के बाद भी बाजीराव बल्लाल भट के परिवार और वहां के ब्राह्मणों ने कभी भी उसे स्वीकार नहीं किया।बाजीराव प्रथम मस्तानी से बेहद प्रेम करते थे इसीलिए इतिहास में दोनों का नाम साथ में लिया जाता है।

बाजीराव मस्तानी ने अपनी पत्नी की याद में पुणे में “मस्तानी महल” भी बनवाया।सन 1734 ईस्वी में बाजीराव मस्तानी के एक पुत्र हुआ जिसका नाम कृष्ण रखा गया। कृष्ण को ही आगे चलकर शमशेर बहादुर के नाम से जाना गया।

परंपरागत चले आ रहे पेशवा परिवार ने कभी भी मस्तानी को बाजीराव की पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया इसकी मुख्य वजह यह रही कि उसकी माता मुस्लिम थी।

कुछ इतिहासकार यह भी कहते हैं कि बाजीराव प्रथम पेशवा की पहली पत्नी काशीबाई ने मस्तानी का कभी भी विरोध नहीं किया।

काशीबाई मस्तानी को बाजीराव की पत्नी के रूप में स्वीकार कर चुकी थी लेकिन पेशवा बाजीराव प्रथम की माता राधाबाई और पेशवा बाजीराव के छोटे भाई चिमाजी अप्पा ने कभी भी मस्तानी को स्वीकार नहीं किया। इसी वजह से पेशवा परिवार में गृह युद्ध छिड़ गया।

पेशवा परिवार के बाद धीरे-धीरे ब्राह्मण समुदाय भी मस्तानी का विरोध करने लगे। जैसे-जैसे समय बीतता गया बाजीराव को पेशवा पद से हटने के बाद सन 1740 ईस्वी में चिमाजी अप्पा और बालाजी विश्वनाथ अर्थात नानासाहेब जोकि बाजीराव प्रथम के पुत्र थे, ने बल प्रयोग के साथ मस्तानी को इस परिवार से दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया।

1740 ईस्वी में बाजीराव का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। इसी को देखते हुए बाजीराव के भाई चिमाजी अप्पा ने बालाजी विश्वनाथ अर्थात नानासाहेब से प्रार्थना की की मस्तानी को बाजीराव से मिलने दिया जाए लेकिन नानासाहेब ने ऐसा नहीं किया उन्होंने मस्तानी की जगह उनकी माता काशीबाई को बाजीराव के पास भेज दिया।

कहते हैं कि अंतिम दिनों में काशीबाई ने थोरले बाजीराव की बहुत सेवा की थी लेकिन धीरे-धीरे बाजीराव की सेहत बिगड़ती गई और उन्हें दिन प्रतिदिन बुखार और तेज आने लगी। तेज बुखार के चलते 28 अप्रैल 1740 ईस्वी को हिंदू सम्राट, अपराजित योद्धा, भारत की आन, बान और शान पेशवा बाजीराव प्रथम का निधन हो गया।

“हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर” में ज़िक्र और 400 वर्षों पुरानी दिल्ली सल्तनत को हिलाने वाला योद्धा

मात्र 20 वर्ष की आयु में पेशवा बने थोरले बाजीराव धीरे-धीरे संपूर्ण भारत पर अपना एकाधिकार कर लिया था। बाजीराव प्रथम महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज से अधिक तीव्र गति के साथ दुश्मनों का सफाया करने में माहिर थे।

इतना ही नहीं अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए जिस तरह से उन्होंने हिंदू साम्राज्य को बचाए रखा और विदेशी ताकतों से मुक्त करवाया वह वाकई में एक बहुत ही अद्भुत कार्य था, जो सिर्फ ईश्वर की कृपा प्राप्त वीर पुरुष ही कर सकता था।

हर हर महादेव के नारे के साथ अपने प्रत्येक कार्य की शुरुआत करने वाले पेशवा बाजीराव प्रथम ने ना सिर्फ अपने साम्राज्य को बढ़ाया बल्कि मारकाट करने वाले, हिंदू धर्म स्थलों को नुकसान पहुंचाने वाले, हिंदू धर्म को कुचलने वाले क्रूर मुगलों को दौड़ा दौड़ा कर मारा था।
बाजीराव प्रथम के कार्यकाल जो कि लगभग 20 वर्षों का था इस दौरान आम लोगों के मन में मुगलों का डर एकदम खत्म हो चुका था।

लेकिन भारतवर्ष की विडंबना यह रही कि प्रारंभ से ही वामपंथी इतिहासकारों ने और यहां बनी सरकार के मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों ने महान पेशवा बाजीराव प्रथम को इतिहास से ही गायब कर दिया था।

कुछ लोगों ने तो थोरले बाजीराव का नाम तक नहीं सुना था। जब बाजीराव पर फिल्म बनी “बाजीराव मस्तानी” तब जाकर लोगों ने यह जाना कि बाजीराव नामक भी कोई पेशवा मराठा साम्राज्य में पैदा हुआ था जिन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष में हिंदुओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

सोचने का विषय यह है कि यहां के इतिहासकारों ने सिर्फ मुगलों का और विदेशी क्रूर आक्रमणकारियों का महिमामंडन किया है जबकि यह सरासर गलत था। “हिंदू पद पादशाही” के सिद्धांत पर चलते हुए पेशवा बाजीराव हर धर्म और समुदाय के प्रति न्याय करने में विश्वास रखते थे। पेशवा बाजीराव की सेना में शामिल मुस्लिम भी हर हर महादेव का नारा बुलंद करते थे।

यह थोरले बाजीराव की ही देन थी कि उनके बाद भारतवर्ष में सिंधिया, होलकर, शिंदे, गायकवाड जैसी देश प्रेमी शक्तियां उभरी और समय-समय पर अपने प्राण न्योछावर करके देश की अखंडता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अपराजित योद्धा की संज्ञा बाजीराव प्रथम को इसलिए दी जाती है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में 41 महत्वपूर्ण लड़ाइयां लड़ी लेकिन एक भी लड़ाई में उनकी हार नहीं हुई। हर बार उन्होंने दुश्मनों को धूल चटाई।और यही वजह है कि छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं के साथ बाजीराव का नाम लिया जाता है।

बाजीराव प्रथम का जिक्र ना सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि विदेशों में भी बहुत गर्व के साथ लिया जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर जनरल मोंटगोमरी ने उनकी किताब “हिस्ट्री ऑफ वारफेयर” में बाजीराव का जिक्र करते हुए कहा है कि बाजीराव प्रथम कभी नहीं हारे थे।

उनकी युद्ध करने की गति बिजली से भी ज्यादा तेज थी और उनकी ताकत का अंदाजा अभी तक कोई नहीं लगा पाया था। इतिहास की इस किताब को आज भी ब्रिटेन की डिफेंस एकेडमी में पढ़ाया जाता है।

पिछले 400 वर्षों से दिल्ली पर विदेशी आक्रमणकारियों ने अधिकार जमाए रखा था जिनमें मुगल भी शामिल थे। किसी भी राजा ने इतनी हिम्मत नहीं की दिल्ली पर आक्रमण किया जाए और उनको खदेड़ा जाए। लेकिन थोरले बाजीराव के हौसले बुलंद थे और सोच बहुत दूरदर्शी थी।

अखंड भारत के निर्माण की तस्वीर अपने दिल और दिमाग में लेकर चलने वाले बाजीराव प्रथम ने दिल्ली पर धावा बोल दिया।
ऐसा कहते हैं कि पेशवा बाजीराव पहले ऐसे मराठा व्यक्ति थे जिन्होंने दिल्ली में जाकर मुगलों को ललकारा।

“पल्खेद की लड़ाई” और निजाम का अंत

थोरले बाजीराव दिमाग से काम लेने वाले व्यक्ति थे उन्होंने सबसे पहले 4 जनवरी 1721 में निजाम उल मुल्क असफ जाह से मुलाकात की और समझौते के लिए बात की। एक बार समझौता हो जाने के बाद भी मराठों के अधीन “डेक्कन” से लगातार कर वसूली जारी रही।

1 वर्ष पश्चात सन 1722 ईस्वी में निजाम को मुगल शासक का मुख्य वजीर बना दिया गया। मोहम्मद शाह को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने सन 1723 ईस्वी में निजाम को डेक्कन से दूर अवध भेज दिया।

निजाम को यह बात बुरी लगी और निजाम ने फैसला किया कि अब वह वजीर का पद छोड़ देगा और ऐसा ही हुआ। उन्होंने वजीर का पद छोड़ दिया और पुनः डेक्कन चले गए।
सन 1725 ईस्वी में डेक्कन से कर वसूलने वाले मराठा साम्राज्य के लोगों को निजाम ने वहां से खदेड़ दिया और डेक्कन को अपने अधिपत्य में ले लिया।

27 अगस्त सन 1727 की बात है पेशवा बाजीराव पूरी तैयारी के साथ निजाम से डेक्कन को मुक्त कराने का संकल्प लेकर अपनी सेना के साथ बढ़े। जालना, बुरहानपुर और खानदेश को अपने कब्जे में करते हुए पेशवा बाजीराव ने निजाम को धूल चटा दी। और इन तीनों पर मराठों का एकाअधिकार हो गया।

28 फरवरी 1728 ईस्वी में “पल्खेद की लड़ाई” की लड़ाई हुई जिसमें बाजीराव ने निजाम को पराजित कर दिया।

मालवा विजय

एक समय में एक साथ कई कार्य करने वाले पेशवा बाजीराव ने सन 1723 ईस्वी में मालवा का अभियान भी शुरू किया। इस अभियान में मराठों की ओर से रनोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर, उदाजी राव पवार, तुकोजी राव पवार और जीवाजी राव पवार शामिल थे।

इन चारों का काम सिर्फ चौथ वसूली का था जो इन्होंने दक्षिणी मालवा में बखूबी किया। 1728 ईस्वी में अक्टूबर माह में पेशवा बाजीराव चाहते थे कि इस क्षेत्र के मुगलों को खदेड़ा जाए। पेशवा बाजीराव ने अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा को सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व करने का मौका दिया।

चिमाजी अप्पा के साथ इस सेना में मुख्य नेतृत्वकर्ता पवार, होल्कर और शिंदे लोग थे।वह दिन भी बहुत जल्दी आ गया जब पेशवा बाजीराव का मालवा विजय का सपना पूरा हो गया।

29 नवंबर 1728 ईस्वी में चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठी सैनिकों ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए अमझेरा नामक स्थान पर मुगलों को पराजित कर दिया। इस क्षेत्र में मुगलों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि फिर उन्होंने पुनः मालवा क्षेत्र की तरफ झांक कर देखा तक नहीं।

बुंदेलखंड में राजा “छत्रसाल” की वापसी

बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल पेशवा बाजीराव के ससुर भी थे। इनको पराजित करके मुगलों ने बुंदेलखंड पर अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश की थी। इसी बात को लेकर बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल ने मुगलों के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ दिया।

दिसंबर 1728 ईस्वी में परेशान होकर मुगलों ने बुंदेलखंड पर धावा बोल दिया। मुगलों की ओर से इस युद्ध में नेतृत्व मोहम्मद खान बंगश कर रहा था।मुगलों ने बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल के परिवार के कुछ सदस्यों को बंदी बना लिया और उनको नजर बंद कर दिया।

छत्रसाल के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था उन्होंने तत्काल ही पेशवा बाजीराव से मदद मांगी।यह वह समय था जब पेशवा बाजीराव मराठी साम्राज्य के विस्तार और हिंदू साम्राज्य के विस्तार के लिए कार्य कर रहे थे।

इस वजह से उनको ज्यादा समय नहीं मिल पाता था।बार-बार मदद का प्रस्ताव भेज रहे राजा छत्रसाल की शर्त बाजीराव ने मंजूर कर ली और मार्च 1729 ईस्वी में अपनी सेना के साथ बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया।

बाजीराव के आक्रमण के सामने मुगल नहीं टिक सके और बुंदेलखंड छोड़कर भाग गए। इस तरह से बाजीराव ने अपने ससुर राजा छत्रसाल को उनका सम्मान वापस लौटाया। इसी युद्ध के पश्चात राजा छत्रसाल पेशवा बाजीराव से बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने अपनी पुत्री मस्तानी का विवाह पेशवा बाजीराव के साथ कर दिया था।

इतना ही नहीं इन्होंने बड़ी-बड़ी जागीरे बाजीराव के नाम कर दी और मरने से पहले इनके एकाधिकार का बड़ा हिस्सा बाजीराव के हवाले कर दिया।सन 1731 ईस्वी में बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल का निधन हो गया।

गुजरात विजय

लगातार पेशवा बाजीराव के संपर्क में रहकर उनके छोटे भाई चिमाजी अप्पा युद्ध कौशल में निपुण हो चुके थे। बाजीराव लगातार अपने छोटे भाई की मदद लेकर अपने राज्य विस्तार में लगे हुए थे क्योंकि इनके पास समय कम था और अकेले सब काम करने में असमर्थ थे।

मुगलों का डर देखिए कि जब 1730 ईस्वी में चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठी सैनिक गुजरात की सीमा में प्रवेश किया तो वहां के मुगल शासक सरबुलंद खान ने पहले ही अधीनता स्वीकार कर ली और “चौथ और सरदेशमुखी” नामक कर इकट्ठा करके मराठों की झोली में डाल दिया।

1 अप्रैल 1731 ईस्वी में पेशवा बाजीराव ने कदम बंदे, दाभाडे और गायकवाड की सेनाओं को पराजित कर दिया।

रानी पद्मावती का इतिहास और जीवन परिचय

27 दिसंबर 1732 ईस्वी में मुगलों ने कसम खाई कि वह पेशवा बाजीराव का रास्ता कभी भी नहीं रोकेंगे। क्योंकि इस दिन पेशवा बाजीराव की मुलाकात निजाम से रोहे रमेशराम नामक स्थान पर हुई थी।

सिद्दियों से लड़ाई

कोंकण के आसपास का क्षेत्र जोकि जंजीरा के नाम से जाना जाता है, पर सिद्दी मुस्लिम राजा का राज्य था। छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के पश्चात इन्होंने कोंकण और आसपास के क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश की और एक हद तक कामयाब भी रहे।

मुगलों की आपस में बहुत जल्दी लड़ाई हो जाती थी कुछ ऐसा ही जंजीरा में हुआ। इस वंश के याकूब खान की मृत्यु के पश्चात उनके बेटे आपस में लड़ने लगे।1733 ईस्वी में याकूब खान के पुत्र अब्दुल रहमान ने पेशवा बाजीराव से मदद मांगी।

बाजीराव पेशवा ने मदद के लिए हां बोल दी और सेखोजी अंगरे  के नेतृत्व में सेना की एक छोटी सी टुकड़ी भेजी।मराठी सेना की इस छोटी सी टुकड़ी के दम पर जंजीरा, कोंकण और रायगढ़ पर भी मराठों का अधिकार हो गया।

19 अप्रैल 1736 ईस्वी की बात है चिमाजी अप्पा ने सिद्दियों को भारी नुकसान पहुंचाते हुए लगभग 1500 सिद्दियों को मौत के घाट उतार दिया और पूरे क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया।

इतिहास में पहली बार दिल्ली मुगलों पर आक्रमण

12 मार्च 1736 में बाजीराव ने पहली बार दिल्ली की तरफ कूच करना शुरू किया।उस समय मुगल बादशाह ने सादात खान को मराठी सेना से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी। मराठों की ओर से सेना का नेतृत्व कर रहे मल्हार राव होलकर और पिलाजी जाधव की सेनाएं पूरे जोश और जुनून के साथ आगे बढ़ रही थी।

मराठी सेना ने यमुना नदी को पार किया और दोआब तक आ गए। जब यह बात सादात खान को पता लगी तो वह डर गया। मराठी सेना से सामना करने के लिए उसने आनन-फानन में सैनिक जुटाने शुरू किए और करीब करीब डेढ़ लाख की सेना तैयार की जो कि मराठों से लोहा ले सके।

इतनी भारी मात्रा में सैनिकों की संख्या देख मराठी सेनापति मल्हार राव होलकर ने अपनी रणनीति बदल दी। रणनीति के अनुसार मल्हार राव होलकर युद्ध मैदान छोड़कर निकल गए।

इस रणनीति को सादात खान समझ नहीं पाया और उसने यह मान लिया कि मराठी से ना डर गई है और डर के मारे पीछे हट गई है। इस घटना को सादात खान ने अपनी जीत मान लिया और जीत का समाचार मुगल बादशाह तक पहुंचा दिया। खुद जीत का जश्न मनाने लगा, और संपूर्ण सेना के साथ मथुरा की ओर लौट आया।

इस वक्त मुगल सेना ज्यादातर आगरा और मथुरा की ओर लगी हुई थी। यह एक ऐसा समय था जब दिल्ली पर आक्रमण करने की बात तो दूर बड़े-बड़े राजा इस बात को लेकर खौफ खाते थे कि अगर दिल्ली पर आक्रमण किया तो जान जा सकती है।किसी को को मिटाने के लिए बाजीराव ने चाल चली।

क्योंकि बाजीराव पेशवा जानते थे कि जब तक दिल्ली पर आक्रमण नहीं किया जाएगा लोगों में यह डर बरकरार रहेगा। साथ ही मुग़ल अपने आपको सर्वेसर्वा समझते रहेंगे।दिल्ली स्थित लाल कटोरा स्टेडियम में बाजीराव ने अपना डेरा डाल दिया और मुगलों को स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब दिल्ली तुम्हारी नहीं है।

500 घोड़ों के साथ पेशवा बाजीराव प्रथम ने 10 दिन की दूरी को मात्र 2 दिन में तय कर लिया और दिल्ली पहुंच गए क्योंकि यह सुनहरा मौका था मुगलों को पराजित करने का।यह देखकर उस समय मुगल बादशाह हंसा बहादुर के पैरों तले जमीन खिसक गई।उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कोई भी इतनी हिम्मत कैसे कर सकता था।

लेकिन जब बहादुर साहब को यह पता लगा कि आक्रमण खुद बाजीराव ने किया है तो वह घबरा गया और अपने महल में जाकर छुप गया।यहीं से उसने रणनीति बनाई और अपने सैनिकों को बाजीराव से लड़ने के लिए भेजा। अमीर हसन कोका के नेतृत्व में 10000 सैनिकों की एक टुकड़ी बहादुर शाह ने बाजीराव पेशवा को खदेड़ने के लिए भेजी।

18 मार्च 1737 भारतवर्ष और मराठों के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। जब मुगल सेना ने मराठी सेना पर आक्रमण किया तो मात्र 500 लड़ाकों के दम पर बाजीराव ने मुगलों को खदेड़ दिया। इस युद्ध में ज्यादातर मुगल सैनिक मारे गए।

इस युद्ध को इतिहास के सबसे तेज युद्धों में से एक माना जाता है। बहादुर शाह को डर सताने लगा और वह गुप्त रास्ते से अवध जाना चाहता था। लेकिन पंतप्रधान श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी भट्ट के मंशा लाल किले पर राज करने की नहीं थी क्योंकि वह पुणे को ही अपने लिए सब कुछ मानते थे।

सदियों से उनका परिवार पुणे से जुड़ा हुआ था।3 दिन तक पेशवा बाजीराव ने दिल्ली में डेरा डाले रखा और उसके बाद पुनः पुणे की तरफ लौट आए।

अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती देखकर मुगल बादशाह शाह बहादुर उर्फ रंगीला ने पंतप्रधान श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी भट्ट से बदला लेने के लिए निजाम से मदद मांगी।निजाम मराठों की शक्ति को अच्छी तरह से जानता था क्योंकि पेशवा बाजीराव ने उन्हें कई बार धूल चटाई थी।

निजाम मुगल बादशाह शाह भादुर की मदद के लिए दक्कन से निकला लेकिन जैसा कि उसको डर था रास्ते में उसकी मुठभेड़ पेशवा बाजीराव से हो गई डर के मारे उसके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे।

निजाम पेशवा बाजीराव के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला कि मैं सिर्फ मिलने के उद्देश्य से दिल्ली जा रहा हूं। यह बात सुनकर मराठों ने निजाम को रास्ता दे दिया।जैसे ही निजाम दिल्ली पहुंचा बहादुर शाह के साथ मिलकर मराठों को पराजित करने के लिए रणनीति बनाने लगे।

बाजीराव बल्लाल भट्ट ना सिर्फ एक वीर योद्धा थे बल्कि उनमें गजब की दूरदर्शिता थी। उन्हें पता था कि निजाम और बहादुर शाह मिलकर युद्ध लड़ने की कोशिश करेंगे।इसी के चलते पेशवा बाजीराव प्रथम ने 10000 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा को दक्कन की सुरक्षा में लगा दिया और खुद 80000 सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर निकल पड़े।

विजय संकल्प लेकर निकले बाजीराव पेशवा ने इस बार ठान लिया था कि कैसे भी करके मुगलों का सर को चलना ही पड़ेगा ताकि वह भविष्य में कभी सर नहीं उठा सके।

14 दिसंबर 1737 की बात है दिल्ली से निकली मुगल सेना और दक्कन से निकली मराठी सेना की मुठभेड़ मध्य प्रदेश के भोपाल में हुई। इस भीषण युद्ध में मराठी सैनिकों ने मुगलों को दौड़ा दौड़ा कर मारा।अपनी पराजय होती देखकर बहादुर शाह ने पेशवा बाजीराव से संधि कर ली।

7 जनवरी 1738 ईस्वी में हुई इस संधि में मुगलों ने संपूर्ण मालवा मराठा को सौंप दिया इसके साथ ही हर्जाने के तौर पर 50 लाख रुपए की भारी-भरकम रकम प्रथम पेशवा बाजीराव को देनी पड़ी।

पुर्तगालियों पर भारी पड़े पंतप्रधान श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी भट्ट

पुर्तगालियों ने भारत में धर्मांतरण के कार्य को बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। इसको रोकने और पुर्तगालियों को कुचलने के लिए बाजीराव ने ठान ली। अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारने वाले पेशवा बाजीराव के जीवन का यह अंतिम युद्ध भी माना जाता है।

सालसेट नामक द्वीप पर पुर्तगालियों ने अवैध रूप से फैक्ट्रियों का निर्माण करना शुरू कर दिया था इतना ही नहीं उन्होंने कई पश्चिमी तटों पर अपना अधिकार जमा लिया था। 1737 ईस्वी में बाजीराव ने अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में एक सेना की टुकड़ी भेजी और पुर्तगालियों को बुरी तरह से पराजित कर दिया।

इस युद्ध के बाद बाजीराव ने थाना किला और बेसिन पर कब्जा कर लिया।धीरे-धीर पुर्तगालियों ने उन संपूर्ण क्षेत्र को छोड़ दिया जहां पर बाजीराव का प्रभुत्व था।

बाजीराव पेशवा की मृत्यु कैसे हुई

पेशवा बाजीराव की मृत्यु को लेकर इतिहासकार दो तरह की बात करते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पेशवा बाजीराव प्रथम की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी जबकि कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि तेज बुखार और लू लगने की वजह से उनकी मौत हुई थी।

मात्र 39 वर्ष की आयु में, 28 अप्रैल 1740 ईस्वी में महान पेशवा बाजीराव प्रथम ने देह त्याग दी थी। यह ना सिर्फ मराठों के लिए बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष के लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी।

हर समय पेशवा बाजीराव की मृत्यु नहीं होती तो मुगल वापस कभी सर नहीं उठा सकते थे ना ही पुर्तगाली और ना ही अंग्रेज अपने आप को भारत में स्थापित कर पाते। इनकी मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 200 वर्षों तक राज किया था।

इसकी मुख्य वजह यह रही कि पेशवा बाजीराव के बाद कोई भी ऐसा ही योद्धा पैदा नहीं हुआ जो संपूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में बांध सके। देश की आन ,बान ,शान और मान मर्यादा को बनाए रख सकें। साथ ही संपूर्ण सनातन धर्म की रक्षा का जिम्मा उठा सकें।

बाजीराव पेशवा प्रथम की यादें

काशी बनारस में गंगा किनारे पेशवा बाजीराव के नाम से घाट बना हुआ है जो उन्होंने स्वयं 1735 ईस्वी में बनाया था। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी मस्तानी के नाम पर उन्हें में “मस्तानी महल” बनवाया था।

इसके अलावा इन्होंने आईना महल और शनिवार वाड़ा भी इनकी ही देन है। इनके समय में पुणे एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था लेकिन इन्होंने सातारा और आसपास के क्षेत्रों से अमीर लोगों को लाकर पुणे में बसाया जिसके चलते पुणे एक छोटे से कस्बे से महानगर बन गया। इसका पूरा श्रेय पेशवा बाजीराव को जाता है।इतना ही नहीं दिल्ली के बिरला मंदिर में बाजीराव की मूर्ति भी हैं।

बाजीराव पेशवा की समाधी / बाजीराव पेशवा जयंती

बाजीराव पेशवा की समाधी रावेरखेड़ी में स्थित हैं। कहते हैं की उत्तर भारत के एक अभियान के दौरान तेज बुखार के चलते बाजीराव पेशवा प्रथम की मृत्यु हो गई थी। यह समाधी नर्मदा के किनारे बानी हुई हैं। यह स्थान पश्चिम निमाड़ ,मध्यप्रदेश में स्थित हैं। बाजीराव पेशवा जयंती 18 अगस्त को मनाई जाती हैं। साथ ही बाजीराव पेशवा की पुण्यतिथि 28 अप्रैल को पुरे भारत में मनाई जाती हैं।

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