राणा पूंजा भील – महाराणा प्रताप के मुंह बोले भाई।

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राणा पूंजा भील एक ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने ना सिर्फ महाराणा प्रताप का साथ दिया बल्कि मेवाड़ को मुगलों से आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोरिल्ला युद्ध रणनीति के जनक यही थे और इसी युद्ध नीति के तहत इन्होंने मुगलों को उल्टे पैर वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था।

राणा पूंजा के इतिहास को दबा दिया गया लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए की इनके बलबूते ही महाराणा प्रताप ने मुगलों को पराजित किया और महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह को भी भील गरासिया लोगों ने ही राज गद्दी पर बिठाया था।

राणा पूंजा भील का इतिहास, Rana Punja Bhil History-

राणा पूंजा का जन्म Rana punja ka janm- राणा पूंजा का जन्म 5 अक्टूबर को हुआ था। इनका जन्म मेरपुर (कोटड़ा) के मुखिया दुदा होलंकी के परिवार में हुआ था।

राणा पूंजा के माता पिता Rana punja ke Mata pita- इनके पिता का नाम दूदा होलंकी था जबकि इनकी माता का नाम “केहरि बाई” था। इनके दादा नाना का नाम “राणा हमीर सिंह” था। परदादा-परनाना का नाम अरी सिंह था।

राणा पूंजा के दादा दादी Rana punja ke dada dadi- इनके दादा का नाम राणा हरपाल भील था।

राणा पूंजा की जयंती Rana punja jayanti- प्रतिवर्ष 5 अक्टूबर को वीर राणा पूंजा भील की जयंती बड़ी धूमधाम से सिर्फ मेवाड़ में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में मनाई जाती है।

राणा पूंजा भील के बारे में कुछ भी बताने से पहले यह बताना चाहूंगा कि राजा पूंजा भील का शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान मेवाड़ की धरती ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत की मातृभूमि याद रखेगी।

और जब तक सूरज चांद रहेगा राणा पूंजा भील का नाम इतिहास में अमर रहेगा। इनका जन्म मेरपुर (कोटडा) में हुआ था। यह दुदा होलंकी के परिवार से थे।

इनके जन्म के समय दुदा होलंकी मेरपुर के राजा थे। बचपन से ही राणा पूंजा तीरंदाजी में निपुण थे। जब यह मात्र 15 वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। पिता के देहांत के पश्चात इनको मेरपुर (कोटला) का मुखियाा बनाय गया।

यही वह समय था जब पूंजा को जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया। अल्पायु में ही यह युद्ध विद्या में निपुण हो गए, साथ ही इनमें शानदार नेतृत्व क्षमता थी और प्रजा का भरपूर प्रेम इन्हें मिला।

इसी प्यार और दुलार के चलते वीर राणा पूंजा भील को भोमट का राजा बनाया गया। यह एक ऐसे वीर नायक थे जिनको जनता का पूरा समर्थन था साथ ही धीरे-धीरे इनकी ख्याति पूरे मेवाड़ में फैल गई।

1576 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर की नजर मेवाड़ राज्य पर थी। मुगल सेना बहुत विशाल थी और मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप को अंदेशा था कि यह निश्चित ही मेवाड़ पर आक्रमण करेंगे।

साथ ही भील,गरासिया और गमेती समुदाय के वीर सैनिक राणा बप्पा रावल के समय से ही मेवाड़ की सेवा करते आ रहे थे। ऐसे में महाराणा प्रताप ने राजा पूंजा भील से सहायता मांगी और मेवाड़ मातृभूमि की रक्षा के लिए साथ आने का न्योता दिया।

राणा पूंजा ने खुशी-खुशी महाराणा प्रताप की बात मान ली साथ ही यह आश्वासन दिया कि राणा पूंजा की पूरी बिना अपने प्राणों की चिंता किए सेना महाराणा प्रताप का पूरा सहयोग करेगी।

और किसी भी कीमत पर मेवाड़ पर मुगल अपना अधिकार नहीं जमा पाएंगे। राणा पूंजा ने महाराणा प्रताप को आश्वासन दिया कि “आप सिर्फ आज्ञा दीजिए मैं और मेरी पूरी सेना मेवाड़ के लिए मर मिटने को तैयार हैं”।

महाराणा प्रताप ने पूंजा को गले लगा लिया और यह भी कहा कि आप सिर्फ हमारे साथ ही नहीं बल्कि आप मेरे भाई हो।

उस समय महाराणा प्रताप द्वारा मेवाड़ का एक राज्य चिह्न दिया गया जिसमें एक तरफ राजपूत तो दूसरी तरफ राणा पूंजा का जिक्र है।

यह चिन्ह आज भी सिटी पैलेस के सबसे ऊपरी भाग में शोभायमान है। इस समय मेवाड़ की राजमाता जयवंता बाई ने राजा पूंजा भील को राखी बांधी थी।

तब से लेकर संपूर्ण राजपूत समुदाय आज भी बिल समुदाय के लोगों को मामा कह कर संबोधित करते हैं।

हल्दीघाटी के युद्ध में राणा पूंजा का योगदान ( Rana Punja Ka Yogdaan)

मेवाड़ मातृभूमि की रक्षा के लिए राणा जी के योगदान को शब्दों में बयां करना आसान नहीं है।

मुगल सेना बहुत बड़ी थी, उनके सामने मेवाड़ और महाराणा प्रताप की सेना बहुत ही छोटी लग रही थी और कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह छोटी सी सेना मुगल सोना से लोहा ले पाएगी।

मुगल सेना और मेवाड़ की सेना के बीच में युद्ध शुरू हो गया इस युद्ध के दौरान राणा पूंजा ने युद्ध करने की एक नई तकनीक निकाली और इसका नाम था गुरिल्ला युद्ध प्रणाली

इस युद्ध प्रणाली काहे करिश्मा था कि मामूली सी मेवाड़ की सेना ने मुगल सेना के दांत खट्टे कर दिए और उल्टे पैर उन्हें वापस भागना पड़ा।

ऐसा कहा जाता है कि मुगल सेना पांच भागों में बंटी हुई थी। जिनमें से तीन टुकड़ियों को बिल्कुल खत्म कर दिया गया। मेवाड़ की सेना में 9000 सैनिक थे जबकि मुगल सेना में 86000 सैनिक थे।

इतना ही नहीं मुगल सेना के पास हाथी,घोड़े और तोप भी थी। जबकि महाराणा प्रताप की सेना के पास तीर, तलवार और भाले थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में मेवाड़ के सैनिक पहाड़ों में और चट्टानों के पीछे छिपकर तीर चलाते थे जिसका अंदेशा तनिक भी मुगल सेना को नहीं होता था और इसी वजह से उन्होंने विशाल मुगल सेना पर काबू कर लिया था।

मुगल सेना की 5 टुकड़ियों में से सिर्फ दो टुकड़ियों जिनका नेतृत्व माधव सिंह और सैयद हाशिम बरारह कर रहे थे ही बची।

इस हार से अकबर बुरी तरह से बौखला गया और अरावली पर्वतमाला में छुपकर आक्रमण करने का प्लान बनाया।

मेवाड़ की सेना ने यह समझा कि मुगल आक्रमणकारी पुनः दिल्ली की तरफ लौट गए हैं और अब कुछ समय तक आक्रमण नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तुरंत ही उन्होंने धावा बोल दिया।

इस युद्ध में सिर्फ राणा पूंजा ही नहीं झाला मन्नाहकीम खां सूरी जैसे महान सेनापति महाराणा प्रताप की सेना में शामिल थे और उन्होंने अपना बलिदान देकर मेवाड़ के भविष्य को देखते हुए महाराणा प्रताप की जान बचाई थी।

महाराणा प्रताप ने ही इनको “राणा की उपाधि” दी थी, साथ ही इन्हें भीलू राजा कहकर बुलाया था।

हालांकि इस युद्ध में राणा पूंजा की मृत्यु नहीं हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि महाराणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात उनके बेटे अमर सिंह को राजगद्दी पर बैठाने का काम राणा पूंजा ने ही किया था।  इस समय अमर सिंह की आयु मात्र 17 वर्ष थी।

राणा पूंजा की वजह से ही जब भी पगड़ी धारण की जाती है तो उसके ऊपर प्रतीक के रूप में राणा पूंजा का चिन्ह लगाया जाता है।

और यही वजह है कि इनकी वीरता और त्याग के कारण इनको हमेशा सम्मान दिया जाता है मेवाड़ ही एकमात्र ऐसा राज्य था जिसने भील समुदाय के लोगों को इतना सम्मान दिया और कभी भी जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया ऐसा उदाहरण पूरे भारत में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।

राणा पूंजा की प्रतिमा (Rana Punja Ki Murti)

उदयपुर में रैती स्टैण्ड चौराहे पर पूंजा भील की प्रतिमा की स्थापना की गई हैं। इस प्रतिमा की विशेषता की बात की जाए तो इसका वजन लगभग 15 टन है। इसकी ऊंचाई 13 फीट है।

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2 thoughts on “राणा पूंजा भील – महाराणा प्रताप के मुंह बोले भाई।”

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