राधाबाई का इतिहास और जीवन परिचय

Last updated on April 19th, 2024 at 09:47 am

राधाबाई (Radhabai barve) प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ की पत्नी थी। इन्होंने बाजीराव पेशवा प्रथम जैसे वीर पुत्र को जन्म दिया जो आगे चलकर मराठा साम्राज्य में पेशवा बने।

राधाबाई (Radhabai Barve History In Hindi)

  • पूरा नाम- राधाबाई बर्वे।
  • पिता का नाम- डूबेरकर अंताजी मल्हार बर्वे।
  • मृत्यु – 20 मार्च 1753 .

त्याग, दृढ़ता, कार्यकुशलता, उदारता के साथ साथ व्यवहार कुशलता जैसे अभूतपूर्व गुण राधाबाई में मौजूद थे। इनके पुत्र बाजीराव पेशवा को यह प्रेरित भी करती थी और कई कार्यों में मदद भी करती थी।

बाजीराव और मस्तानी को लेकर शुरू से ही इन्होंने विरोध किया। ताराबाई चाहती थी कि पेशवा परिवार की इज्जत भी बनी रहे और परिवार में फूट भी ना पड़े। बाजीराव पेशवा की द्वितीय पत्नी मस्तानी की माता मुस्लिम थी और मस्तानी भी मुस्लिम धर्म को मानती थी, इसलिए पेशवा परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहता था।

मस्तानी के विरोध में खुद राधाबाई, बाजीराव पेशवा के छोटे भाई चिमाजी अप्पा और बाजीराव पेशवा के पुत्र नानासाहेब मुख्य थे। प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ सिद्दियों के अधीन श्रीवर्धन नामक गांव के देशमुख थे।

भारत के पश्चिमी सिद्दियों के साथ दरार होनेे की वजह से विश्वनाथ और बालाजी ने श्रीवर्धन गांव छोड़ दिया। श्रीवर्धन गांव से पलायन के बाद यह बेला नामक स्थान पर आ गए, यहां पर इनका साथ भानु भाइयों ने दिया। राधाबाई इस समय छोटी थी अतः वह भी परिवार के साथ  बेला आ गई और यहीं पर रहने लगी।

बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु

सन 1720 बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो गई। इस घटना से Radhabai barve को बहुत दुख हुआ और वह पूरी तरह से टूट गई।

मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहूजी महाराज ने बालाजी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र बाजीराव पेशवा प्रथम को नया पेशवा नियुक्त किया। बाजीराव के पेशवा बनाने से राधाबाई बहुत प्रसन्न हुई। हर राजनीतिक कार्य में राधाबाई पेशवा बाजीराव की मदद करती थी।

राधाबाई की तीर्थ यात्रा

1735 ईस्वी में राधाबाई ने तीर्थ यात्रा करने की इच्छा जताई। राधाबाई के दूसरे नंबर के पुत्र चिमाजी अप्पा ने इनकी यात्रा के लिए प्रबंध किया। 14 फरवरी 1735 के दिन Radhabai barve पुणे से यात्रा के लिए निकली और 8 मार्च को बुरहानपुर पहुंच गई।

6 मई को राधाबाई उदयपुर पहुंची, यहां पर इन्हें बहुत बड़ा राजकीय सम्मान मिला। 21 मई के दिन इन्होंने नाथद्वारा स्थित भगवान श्रीनाथजी के दर्शन किए।

यहां से राधाबाई सीधी जयपुर के लिए निकल गई जहां पर जयपुर के राजा जयसिंह ने इनका बहुत ही आदर और सत्कार किया, राधाबाई जयपुर लगभग 3 महीने तक रुकी।जब राधाबाई जयपुर से निकली तब सितंबर माह चल रहा था।

यहां से प्रस्थान करने के बाद मथुरा, वृंदावन, कुरुक्षेत्र और प्रयागराज होते हुए 17 अक्टूबर को काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंच गई। राधाबाई की यह यात्रा 1 जून 1736 ईस्वी में समाप्त हुई और वह पुनः पूना आ गई।

पारिवारिक अन-बन और विरोधी

यात्रा पूर्ण करके जब Radhabai barve पुणे पहुंची तब तक बाजीराव पेशवा और मस्तानी का विरोध जोर शोर से होने लगा। स्थानीय सरदारों के साथ-साथ ब्राह्मण समुदाय ने भी दोनों का विरोध करना प्रारंभ कर दिया।

राधाबाई के लिए भी मस्तानी नाक का नासूर बन चुकी थी। जब रघुनाथ राव का उपनयन और सदाशिवराव का विवाह होने वाला था तब बाजीराव पेशवा के आलोचकों का बर्ताव बहुत तेज हो गया।

इन सभी परिस्थितियों पर नियंत्रण करने का जिम्मा राधा बाई का था। Radhabai barve ने जिम्मेदारी लेते हुए सदाशिव राव का विवाह संपन्न करवाया और बाजीराव पेशवा को इनसे दूर रखा।

दोनों पुत्रों की मृत्यु

1740 राधाबाई के लिए बुरा वर्ष था। इस साल Radhabai barve ने अपने दोनों पुत्र बाजीराव पेशवा और चिमाजी अप्पा को मात्र 5 महीने के अंतराल में खो दिया।

इस वर्ष अप्रैल माह में बाजीराव पेशवा का निधन हो गया। इस घटना के मात्र 5 महीने बाद चिमाजी अप्पा भी परलोक सिधार गए। इनकी मृत्यु के पश्चात भी राधा बाई पेशवा और मराठा हितों के लिए कार्य करती रही।

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1752 ईस्वी में जब पेशवा किसी काम से पुणे से बाहर गए हुए थे तब इन्होंने राधाबाई और उमा बाई की सेना का सामने किया और पुणे पर आक्रमण से रोका। इतना ही नहीं बाबूजी नाईक पेशवा के खिलाफ अनशन करने वाले थे लेकिन राधाबाई ने उन्हें रोक लिया।

राधा बाई की मृत्यु

20 मार्च 1753 में राधा बाई की मृत्यु हुई थी। Radhabai barve ने अपने सामान्य परिवार से पेशवा परिवार बनने तक का सफर तय किया। राधाबाई अपने आप में बहुत इतिहास समेटे हुए हैं, इसके साथ ही इन्होंने पेशवा बाजीराव जैसे वीर पुरुष को जन्म दिया। प्रतिवर्ष 20 मार्च को राधाबाई की पुण्यतिथि मनाई जाती है।

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