शमशेर बहादुर प्रथम:- बाजीराव मस्तानी की मृत्यु के बाद क्या हुआ?

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शमशेर बहादुर का इतिहास/Shamsher Bahadur History-

  • पूरा नाम- शमशेर बहादुर उर्फ कृष्णा राव।
  • जन्म- सन 1734 .
  • स्थान- शनिवार वाड़ा पुणे।
  • मृत्यु- 14 जनवरी 1761, पानीपत में।
  • पत्नी का नाम- मेहरम बाई।
  • संतान- अली बहादुर प्रथम।

1734 ईस्वी में शमशेर बहादुर के जन्म से लेकर 1740 तक बाजीराव पेशवा और मस्तानी की मृत्यु तक इन्होंने अपनी माता और स्वयं का विद्रोह होते हुए देखा था।

इनकी आंखों के सामने इनकी माता मस्तानी को बंदी बनाया गया लेकिन फिर भी मराठों के लिए यह आजीवन लड़े और साम्राज्य की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। सन 1740 ईसवी की बात है जब शमशेर बहादुर प्रथम की आयु मात्र 6 वर्ष थी।

इनके पिता बाजीराव पेशवा युद्ध में घायल होने के बाद बीमार पड़ गए और तेज बुखार के चलते नर्मदा के किनारे उन्होंने दम तोड़ दिया। यह खबर सुनकर इनके माता मस्तानी भी ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह सकी और बाजीराव पेशवा की मृत्यु के कुछ समय पश्चात ही इनकी माता का भी देहांत हो गया।

शमशेर बहादुर उर्फ कृष्ण राव को कई बार मारने की कोशिश की गई और तरह-तरह की यातनाएं देना शुरू किया। मगर ऐसे समय में बाजीराव पेशवा की अंतिम निशानी मानकर उनकी पहली पत्नी काशीबाई ने शमशेर बहादुर को अपना पुत्र मान लिया। हालाकी काशीबाई मस्तानी से नाराज थी।

बाजीराव पेशवा की पहली पत्नी काशीबाई ने शमशेर बहादुर को अपनाया और अपने बेटों के साथ ही इनका भी पालन पोषण किया। इतना ही नहीं काशीबाई ने इनको युद्ध कला में निपुण बनाया।

शमशेर बहादुर की शिक्षा दीक्षा काशीबाई के पुत्रों के साथ ही हुई। काशीबाई ने शमशेर बहादुर को पेशवा का बेटा मान कर बुंदेलखंड की कालपी और बांदा की जागीरें इनके नाम कर दी। बचपन में हुए घनघोर तिरस्कार के बाद भी शमशेर बहादुर ने विद्रोह करने की नहीं सोची।

शमशेर बहादुर ही एकमात्र ऐसा योद्धा था जो मराठों की तरफ से 1761 में अंतिम समय तक लड़ता रहा। पानीपत में हुए तीसरे युद्ध में शमशेर ने अब्दाली और शुजाऊद्दौला अंतिम समय तक छकाते रहे।
यह भी पढ़ें- काशीबाई का इतिहास- बाजीराव पेशवा की पहली पत्नी।

पानीपत का तीसरा युद्ध-

आज से लगभग 255 साल पहले भारत और मराठा साम्राज्य के लिए काला दिन था। वैसे तो 14 जनवरी को भारत में बहुत हर्षोल्लास के साथ मकर सक्रांति मनाई जाती है लेकिन इस दिन मराठों ने खून की होली खेली थी।

18 वीं शताब्दी की यह घटना सदियों तक याद रखी जाएगी। 14 जनवरी 1761 विश्व इतिहास में एक ऐसा दिन था जब एक ही दिन में कई वीर मराठी सरदारों के साथ 40 हजार से भी अधिक सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।

एक ऐसा दिन जिसने लगातार जीतों के बाद मराठों के दंभ को चकनाचूर कर दिया। एक बार फिर यह कहावत सत्य साबित हुई कि “घर का भेदी लंका ढाए”।

अहमद शाह अब्दाली के साथ रोहिल्ला अफगानी और अवध के नवाबों ने हाथ मिला लिया। इतना ही नहीं कई छोटे-छोटे हिंदू राजाओं ने इस लड़ाई से अपने आप को दूर रखा या फिर मराठों का समर्थन करने से मना कर दिया।

शुजाऊद्दौला की मां ने बताया कि रोहिल्ला तुम्हारे पिताजी की मदद की थी। तुम्हें मराठों की मदद करनी चाहिए लेकिन वह नहीं माना और इस बात की मराठों को उम्मीद भी नहीं थी कि वह इनकी मदद नहीं करेगा।

इतना ही नहीं मराठों ने यह भी उम्मीद नहीं की थी कि जाट राजा सूरजमल मराठी सदाशिव राव से नाराज होकर मराठों की मदद नहीं करेगा। इसका असर यह हुआ है कि आसपास के जाटों ने भी सूरजमल का साथ दिया और मराठों का साथ छोड़ दिया।

इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि अधिकतर मराठों को बंदी बना लिया गया और बाद में उन्हें काट दिया गया ज्यादातर मराठी सैनिक और सरदार इस युद्ध में मारे गए।

शमशेर बहादुर का पराक्रम-

मात्र 5000 सैनिकों की छोटी सी टुकड़ी लेकर शमशेर बहादुर मराठों की ओर से लड़ रहे थे। इनकी रगों में पेशवा बाजीराव का खून जो दौड़ रहा था और यही वजह थी कि इन्होंने पानीपत के तीसरे युद्ध में विपक्षी सेना के नाक में दम कर दिया।

शमशेर बहादुर ने अपने पिता बाजीराव की युद्ध पद्धति को अपनाते हुए घोड़ों की छोटी सी टुकड़ी के साथ रह रह कर हमले कर रहा था। इससे अब्दाली काफी परेशान हो गया,इतना ही नहीं बड़ी मात्रा में उनके सैनिक भी मारे गए।

बाजीराव मस्तानी का बेटा बड़ी ही वीरता के साथ इस युद्ध में लड़ा। जब कृष्ण राव अर्थात शमशेर बहादुर युद्ध में घायल हो गया तब वह युद्ध मैदान से अपने कुछ साथियों के साथ निकल गया।

यहां से निकलने के बाद सूरजमल ने इनकी मदद की और इनके घाव पर मरहम लगाई।

कृष्णाराव उर्फ शमशेर की मृत्यु-

पानीपत के तीसरे युद्ध में गायल होने के पश्चात कुछ दिनों तक सूरजमल ने उनकी देखभाल की लेकिन घाव ज्यादा होने की वजह से मात्र 27 वर्ष की आयु में शमशेर बहादुर ने प्राण त्याग दिए।

इन के 1 पुत्र भी हुआ जिसका नाम अली बहादुर था। अली बहादुर भी अपने पिता की तरह ही कई वर्षों तक बड़ी वफादारी के साथ मराठों की सेवा करता रहा।

मराठों के प्रति वफादारी अपनी वीरता, त्याग और स्नेह के लिए वीर शमशेर बहादुर को सदियों तक याद रखा जाएगा।

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