सदाशिवराव भाऊ का इतिहास जीवन परिचय और 15 मुख्य कार्य

Last updated on May 1st, 2024 at 09:15 am

सदाशिव राव भाऊ ने पेशवा परिवार में जन्म लिया। इनके पिताजी “चिमाजी अप्पा” जोकि “पेशवा बाजीराव” के छोटे भाई थे। सदाशिव राव भाऊ ने पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठी सेना का नेतृत्व किया था।

सदाशिवराव भाऊ जीवन परिचय (sadashivrao bhau history In Hindi)

परिचय बिंदुपरिचय
पूरा नामसदाशिवराव भाऊ पेशवा माहिती
मृत्यु14 जनवरी 1761 (पानीपत के तीसरे युद्ध)
पिता का नामचिमाजी अप्पा
माता का नामराखमबाई
पत्नी का नामपार्वतीबाई पेशवे
पुत्र2
पदसरदार सेनापति
(sadashivrao bhau Biography In Hindi)

सदाशिवराव भाऊ कौन थे? सबसे पहला प्रश्न लोगों के मन में यही उठता है। सदाशिव राव भाऊ ने पेशवा परिवार में जन्म लिया। इनके पिताजी “चिमाजी अप्पा” जोकि “पेशवा बाजीराव” के छोटे भाई थे।

मराठा साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पेशवा परिवार में जन्म लेने की वजह से सदाशिव राव भाऊ बचपन से ही वीर और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे।

सदाशिव राव भाऊ ने पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठी सेना का नेतृत्व किया था। प्रारंभ से ही इनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा जब इनकी आयु मात्र 1 महीना थी तब इनकी माता रुकमा बाई का देहांत हो गया। इतना ही नहीं जब सदाशिव राव भाऊ की आयु मात्र 10 वर्ष थी तब इनके पिता चिमाजी अप्पा की मृत्यु हो गई।

भारतीय इतिहास में सदाशिवराव भाऊ एक महान योद्धा के रूप में जाने जाते हैं। अपने देश की रक्षार्थ इन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया।

सदाशिवराव भाऊ का प्रारंभिक जीवन

योग्य व्यक्तियों का जीवन अपेक्षाकृत अधिक संघर्षपूर्ण होता है कुछ ऐसा ही सदाशिवराव भाऊ के साथ हुआ। जन्म के कुछ समय पश्चात ही इनकी माता का देहांत हो गया जबकि 10 वर्ष की आयु में इनकी पिता की भी मृत्यु हो गई।

बचपन में ही माता और पिता की मृत्यु हो जाने के बाद सदाशिवराव भाऊ को अकेलापन महसूस होने लगा। ऐसे समय में इनका साथ दिया इनकी चाची काशीबाई (पेशवा बाजीराव की प्रथम पत्नी) और इनकी दादी राधाबाई ने।

काशीबाई और राधाबई की देखरेख में ही सदाशिवराव का बचपन बीता। इन दोनों ने कभी भी इनको अपने माता-पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। इन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा महाराष्ट्र के सतारा में प्राप्त की जो कि “रामचंद्र बाबा शेवनी” के सानिध्य में प्राप्त हुई।

इनका साथ देने के लिए इनके चचेरे भाई नानासाहेब/बालाजी बाजीराव थे। 1746 में एक अभियान इनके सानिध्य में शुरू हुआ, लगभग 1 वर्ष चले इस अभियान में जनवरी, 1749 में इन्होंने अजरा में अपने जीवन काल की पहली लड़ाई जीती जोकि कोल्हापुर के दक्षिण क्षेत्र में लड़ी गई थी।

हालांकि यह कार्य पहले बाबूजी नाइक और फतेह सिंह भोंसले को सौंपा गया था लेकिन उनकी असफलता के बाद यह कार्य सदाशिवराव भाऊ ने सफलतापूर्वक किया।

सदाशिवराव भाऊ का योगदान और महत्वपूर्ण कार्य

प्रारंभ में देशी राज्यों के खिलाफ मिली सैनिक सफलताओं के कारण इन्हें असाधारण सेनानी के रूप में ख्याति मिली। लेकिन पानीपत का तीसरा युद्ध जो कि “अब्दुल शाह अब्दाली” के विरुद्ध लड़ा गया था उस युद्ध में हार की जिम्मेदारी का सबसे बड़ा दोषी भी सदाशिव राव भाऊ को ही ठहराया गया जो कि सरासर गलत था।

सदाशिवराव भाऊ ने मराठी सेना को फ़्रेंच तरीक़ से ढालने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।निज़ाम की सेना में तोपखाने के अध्यक्ष Marquiess de bussy को भाऊ ने अपनी ओर मिलान का भरसक प्रयास किया। जब इस कार्य में वो असफल रहे तो उन्होंने तोपखाने को संभालने वाले एक अन्य व्यक्ति इब्राहिम गदी को अपनी ओर मिला लिया।

1. सदाशिव राव महत्वाकांक्षी और स्पष्टवादी थे, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शासन प्रबंध का महत्वपूर्ण कार्य दिया गया। इस कार्य में ये पूर्ण रूप से सक्षम भी थे।

2. इनका पहला और सबसे महत्वपूर्ण कार्य पश्चिम कर्नाटक में मराठा साम्राज्य की स्थापना करना था जो इन्होंने सन 1746 ईस्वी में किया था।

3. सदाशिव राव ने मराठा साम्राज्य में वैधानिक क्रांति पैदा की और शुरू से ही देशद्रोही रहे यामाजी शिवदेव को पराजित कर इन्होंने संगोला किला अपने कब्जे में ले लिया।

4. इनके पिता के पास शासन संचालन का पूर्ण अधिकार था। यही पद इन्होंने भी पेशवा से मांगा लेकिन पेशवा ने इनकी इस मांग को अस्वीकृत कर दिया। महत्वकांक्षी स्वभाव की वजह से इन्होंने पेशवा को धमकी दी कि यदि उन्हें यह पद नहीं मिला तो वह “कोल्हापुर” के राजा के पेशवा पद को स्वीकार कर लेंगे।

5. इस समय शासन संचालन का पूर्ण अधिकार महादोवा पुरंदरेे के पास था। सदाशिव राव बाबू की वजह से महाराष्ट्र और मराठा में गृह युद्ध की आशंका लगातार बढ़ती जा रही थी। ऐसे में महादोवा पुरंदरेे ने अपने पद का त्याग कर दिया, शासन संचालन का पूर्ण अधिकार सदाशिव के हाथ में आ गया।

6. सन 1751 से लेकर 1759 तक सदाशिव राव भाऊ का मुख्य कार्य शासन प्रबंध व्यवस्था को देखना ही था हालांकि इस दौरान उन्होंने कई सैन्य अभियानों में भाग लिया और अपनी वीरता का परिचय भी दिया।

7. सन 1760 की बात है सदाशिवराव अपने नाम का डंका संपूर्ण मराठा साम्राज्य और आसपास के क्षेत्रों में बजा चुके थे। बच्चा-बच्चा इनकी वीरता और प्रबंध व्यवस्था प्रणाली के बारे में परिचित था।

8. मराठा साम्राज्य की सीमा में विस्तार करने के लिए इन्होंने “ऊदगिर के युद्ध” में वहां के निजाम को धूल चटाई।

9. इस समय मराठा साम्राज्य को एक बहुत बड़ा झटका लगा। बरारघाट में दत्ताजी सिंधिया की मृत्यु का समाचार मिला, यह मराठा साम्राज्य के लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी। अहमदशाह दुर्रानी/अब्दाली ने दत्ताजी सिंधिया को मौत के घाट उतारा था।

10. तब पेसवानी अपने भाई रघुनाथ राव की बजाए “अब्दुलशाह दुर्रानी/अब्दाली” का सामना करने के लिए सदाशिवराव भाऊ को योग्य समझा और प्राथमिकता दी।

11. 2 अगस्त 1760 में सदाशिव राव ने दिल्ली पर आक्रमण किया और अधिकार कर लिया। इन्होंने शाह आलम को दिल्ली का सम्राट घोषित किया।

12. 17 अक्टूबर 1760 इसवी में कुंजपुर पर विजय प्राप्त करके 31 अक्टूबर को सदाशिवराव पानीपत के मैदान में पहुंचे। 4 नवंबर 1760 का दिन था पानीपत के मैदान में सदाशिव राव भाऊ और विपक्षी सेना युद्ध के लिए तैयार थी।

13. 14 जनवरी 1761 के दिन को भारतीय “इतिहास का सबसे काला दिन” कहा जाता है। इसी दिन अब्दुलशाह अब्दाली और मराठा सैनिकों के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध लड़ा गया था।

14. इनकी मृत्यु के पश्चात अब्दुल शाह अब्दाली इनका सिर काटकर अफगानिस्तान अपने साथ लेकर गया।

15. अंत में अब्दुल शाह अब्दाली भी इनकी वीरता का दीवाना हो गया और उन्होंने भरी सभा में सदाशिवराव की तारीफ की और कहा कि इनके जैसा वीर योद्धा मैंने अपने जीवन काल में नहीं देखा है।

क्या पानीपत के तीसरे युद्ध में हार की वजह सदाशिवराव भाऊ थे?

कई इतिहासकारों का मानना है कि पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों की हुई हार की मुख्य वजह सदाशिव राव भाऊ थे। मराठों के पास सैनिकों की संख्या अब्दुल शाह अब्दाली के मुकाबले बहुत कम थी। लेकिन फिर भी इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सदाशिवराव अडिग रहे।

भाऊ के साथ साथ इस युद्ध में जानकोजी शिंदे,महाद की शिंदे, नाना फडणवीस, पेशवा के पुत्र विश्वास राव शामिल थे। इस युद्ध के समय पेशवा रहे नाना साहेब के पुत्र विश्वास राव और भाऊ के साथ साथ कई वीर मराठी सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध में लगभग एक लाख से अधिक मराठा सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए पानीपत के मैदान की धरती रक्त से रंजीत हो गई।

पानीपत के युद्ध में हार की वजह सदाशिवराव भाऊ को ठहराते हुए इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि विश्वास राव की मौत 14 जनवरी 1761 को दिन में लगभग 1:00 बजे से लेकर 2:00 बजे के बीच में हुई थी। विश्वास राव को ढूंढने के लिए सदाशिव राव भाऊ अपने हाथों से नीचे उतर गए और उनको ढूंढने लगे।

जब वह दूर सेना के बीच चले गए तब मराठी सेना को लगा कि उनका सेनापति मारा गया है। अपने आप को नेतृत्वहीन पाकर मराठी सेना में अफरा-तफरी मच गई। सैनिकों में बड़ी घबराहट की वजह से वह पूर्ण योग्यता के साथ युद्ध में वीरता नहीं दिखा सके।

क्योंकि किसी भी युद्ध में केंद्रीय संचालन की मुख्य भूमिका होती है उसी की आज्ञा के अनुसार युद्ध को आगे बढ़ाया जाता है। मराठी सेना में अफरा-तफरी देखकर अब्दुल शाह अब्दाली बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रिजर्व में रखे 15000 सैनिकों को भी मराठों पर आक्रमण का हुक्म दिया।

इस भयंकर युद्ध में सदाशिव राव भाऊ वीरगति को प्राप्त हो गए और यह खबर जब मराठी सैनिकों को लगी तो वहां से भागने लगे।

इतना ही नहीं इस युद्ध में लगभग 40000 तीर्थयात्री मराठा सैनिकों के साथ यात्रा के लिए निकले थे अब्दुल शाह अब्दाली ने उन सभी के सिर कलम कर दिए। छोटे बच्चों माताओं और बहनों को मौत के घाट उतार दिया गया।

अब्दुल शाह अब्दाली का बालाजी बाजीराव को पत्र

जब बालाजी बाजीराव में सदाशिव राव भाऊ की मृत्यु की खबर सुनी तो वह सैनिकों के साथ उत्तर की ओर बढ़ने लगे। तभी उन्हें अब्दुल शाह अब्दाली का एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें लिखा हुआ था “अब्दाली पुनः अफगानिस्तान जा रहे हैं और दिल्ली बालाजी बाजीराव के कब्जे में है।

साथ ही अब्दुल शाह अब्दाली ने लिखा कि मैं युद्ध नहीं करना चाहता था लेकिन सदाशिव राव भाऊ ने मुझे इसके लिए प्रेरित किया और उसी का खामियाजा मराठी सैनिकों को भुगतना पड़ा। प्रारंभ में सदाशिवराव भाऊ माहिती ने मेरी सेना को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया था।

सदाशिव राव भाऊ के जीवित होने का ढोंग

सदाशिवराव भाऊ पेशवे की मृत्यु के पश्चात एक अनजान व्यक्ति ने ढोंग किया कि वही सदाशिवराव भाऊ हैं। यह खबर फैलाई की पानीपत के तीसरे युद्ध में उसकी मृत्यु नहीं हुई।

लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चला लोगों ने पहचान लिया कि यह व्यक्ति ढोंग कर रहा है। उसका अपराध साबित हो जाने के बाद उसको मृत्यु दण्ड दिया गया।

पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद क्या हुआ?

मराठी सेना पूरी तरह क्षत-विक्षत हो गई। हजारों सैनिकों के साथ कई मुख्य सरदार भी इस युद्ध में मारे गए। पानीपत के तीसरे युद्ध को 18 वीं शताब्दी का सबसे भयंकर युद्ध माना जाता है।

मुख्य सेनापति और सरदारों में से अधिकतर वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन “महादजी सिंधिया” और “नानाजी फडणवीस” युद्ध मैदान से बचकर भाग निकले।

महाराजा छत्रसाल का जीवन परिचय और इतिहास