बाजीराव पेशवा द्वितीय (Bajirao peshwa II) का इतिहास

Last updated on April 29th, 2024 at 05:43 am

श्रीमंत पेशवा बाजीराव II (Bajirao peshwa II) या पेशवा बाजीराव द्वितीय कौन था? तो आपको बता दे की मराठा साम्राज्य के 13वें और अंतिम पेशवा थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने लगभग 23 वर्ष शासन किया। सन 1795 से लेकर 1818 तक यह मराठा साम्राज्य के पेशवा रहे। पेशवा बाजीराव बड़े लोगों अर्थात रईस लोगों के इशारों पर काम करने वाला शासक था।

Bajirao Peshwa II जीवन परिचय

  • पूरा नाम full name of Bajirao II- श्रीमंत पेशवा महाराजाधिराज बाजीराव द्वितीय.
  • जन्म Bajirao peshwa II Date of Birth-10 जनवरी 1775, धार मराठा साम्राज्य।
  • मृत्यु Bajirao peshwa II Death- 28 जनवरी 1851.
  • माता का नाम Bajirao II mother’s name- आनंदी बाई।
  • पेशवा कार्यकाल– 6 दिसंबर 1796 से लेकर 3 जून 1818 तक।
  • पत्नी का नाम Bajirao II wife’s name(bajirao second wife)- सरस्वती बाई।
  • बाजीराव द्वितीय का पुत्र, Bajirao II son- नाना साहिब (दत्तक पुत्र).
  • इनसे पहले पेशवापेशवा माधवराव द्वितीय

मराठा साम्राज्य के अंतिम पेशवा के रूप में “पेशवा बाजीराव द्वितीय का इतिहास” मराठों के लिए अच्छा नहीं माना जाता हैं। मराठा साम्राज्य के तहरवें पेशवा के रूप में इन्होंने पदभार ग्रहण किया था।

अब तक के पेशवाओं में सबसे अधिक कमजोर साबित हुए। Bajirao peshwa II के कार्यकाल में ही मराठा साम्राज्य की एकता, अखंडता और प्रभुता को चोट लगी और इस विशाल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ। इनके पिता रघुनाथ राव अर्थात राघोबा अंग्रेजों से जाकर मिल गए थे इसी वजह से अंग्रेजों के साथ मराठों का संघर्ष लगातार बढ़ता गया।

इनके कार्यकाल में यह संघर्ष और बढ़ गया और धीरे-धीरे विराट स्वरूप लेने लगा। इस समय प्रधानमंत्री के रूप में कार्यरत नाना फडणवीस से Bajirao peshwa II बहुत नफरत करते थे। नाना फडणवीस समस्त कार्य को देख रहे थे और ज्यादातर शक्तियां इनके हाथ में होने की वजह से बाजीराव द्वितीय मन में घृणा लेकर चल रहा था। महत्वकांक्षी व्यक्तित्व की वजह से नाना फडणवीस के खिलाफ कार्य करता था।

Bajirao peshwa II को कायर पुरुष माना जाता था साथ ही वह विश्वासघात करने वाला भी था। जब प्रधानमंत्री नाना फडणवीस की 13 मार्च 1800 के दिन मृत्यु हो गई, तब वह अंग्रेजों से जाकर मिला और पेशवा पद को हासिल किया। इतना ही नहीं पेशवा पद प्राप्त करने की एवज में उन्होंने अंग्रेजों को मराठा साम्राज्य का एक विशाल भूभाग दान में दे दिया।

राजाराम द्वितीय का मानना था कि जीत हासिल करने के लिए युद्ध कला और शक्ति का होना ही काफी नहीं है। इन्होंने अपने जीवन में छल कपट को मुख्य हथियार बनाया। इसी वजह से इन्हें अयोग्य और कायर शासक के रूप में जाना जाता है।

नाना फडणवीस की मृत्यु के बाद

13 मार्च 1800 के दिन नाना फडणवीस की मृत्यु के बाद अंग्रेजों के साथ मिलकर Bajirao peshwa II ने समस्त शक्तियां अपने हाथ में ले ली और स्वयं को सर्वे सर्वा घोषित कर दिया। नाना फडणवीस के पद के दो मुख्य उम्मीदवारों में जसवंतराव होल्कर और दौलतराव शिंदे का नाम शामिल था। इस समय मराठा साम्राज्य का माहौल बिगड़ा हुआ होने की वजह से यह दोनों आपस में प्रतिद्वंदिता करने लगे।

छल कपट को अपना हथियार समझने वाले बाजीराव द्वितीय ने दोनों को अपनी और मिलाने के लिए षड्यंत्र रचा। लेकिन बाजीराव द्वितीय के लिए यह उल्टा पड़ गया। जसवंत राव होल्कर और दौलतराव शिंदे के बीच युद्ध छिड़ गया। पेशवा को अपने दायरे में लेने के लिए पुणे में एक भीषण युद्ध हुआ। Bajirao peshwa II ने दौलतराव शिंदे का साथ दिया।

यशवंतराव होल्कर और दौलतराव शिंदे की सेनाओं के बीच हुए युद्ध में यशवंतराव होल्कर ने दौलत राव शिंदे का साथ दे रहे बाजीराव द्वितीय की सेना को भी पराजित कर दिया।

बसई की सन्धि (Treaty of Bassein)

यशवंत राव होलर के साथ युद्ध में पराजित होने के पश्चात Bajirao peshwa II डर गया और भयभीत होकर पुणे छोड़कर बसई भाग गया। बसई जाने के बाद वह अंग्रेजों के साथ मिल गया। अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय की सहायता करने से पहले एक संधि पर हस्ताक्षर करवाए जिसे बसई की संधि के नाम से जाना जाता है।

सन 1801 ईस्वी में बसई नामक स्थान पर एक अंग्रेजी जहाज में बैठकर अंग्रेजों और बाजीराव द्वितीय के मध्य एक समझौता हुआ। इस समझौते में यह तय किया गया कि Bajirao peshwa II “ईस्ट इंडिया कंपनी” की अधीनता ग्रहण करेगा।

इतना ही नहीं अंग्रेजों के साथ यह भी समझौता किया गया कि मराठा साम्राज्य का बहुत बड़ा भूभाग अंग्रेजी सेना को दिया जाएगा, जिससे कि उनका खर्चा और राशन पानी आसानी के साथ चल जाए।

अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय से वादा किया कि वह उसको पेशवा पद पर पुनः आसीन करेंगे। साथ ही Bajirao peshwa II ने अंग्रेजों से वादा किया कि ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों से बैर रखने वाले अन्य विदेशी लोगों को मराठा राज्य में नौकरी पर नहीं रखा जाएगा।

ऐसा कहा जाता है कि बाजीराव द्वितीय खुद की रक्षा और स्वार्थ के लिए मराठा साम्राज्य को अंग्रेजों के हवाले कर दिया और राज्य की स्वतंत्रता को दी। जब मुख्य मराठा सरदारों को बसई की संधि के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया। इसी विरोध के परिणाम स्वरूप सन 1803 से लेकर 1806 के बीच मराठों और अंग्रेजों के बीच में दूसरा (द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध) युद्ध हुआ।

इस युद्ध में अंग्रेजों ने मराठों को पराजित कर दिया। बसई की संधि के परिणाम स्वरूप बाजीराव द्वितीय को लगा कि अंग्रेजों के अधीन कार्य करना पड़ेगा। मराठी सरदार पहले ही अंग्रेजो के खिलाफ थे ऐसे में Bajirao peshwa II ने इनकी नाराजगी का फायदा उठाया और सभी मराठा सरदारों को अंग्रेजो के खिलाफ एकजुट करने में सफलता हासिल की।

बाजीराव द्वितीय की मृत्यु और पेशवा पद की समाप्ति

बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में पुनः संगठित हुई मराठी सेना ने ठान लिया कि अब अंग्रेजों को कैसे भी करके मराठों के क्षेत्र से उखाड़ फेंकना होगा। “पेशवा बाजीराव द्वितीय युद्ध” की बात करें तो इन्होंने मुख्य रूप से 3 युद्ध में भाग लिया था।

इसी दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए नवंबर 1817 में पुणे स्थित “अंग्रेजी रेजीडेंसी” पर आक्रमण कर दिया। सबसे पहले इन्होंने अंग्रेजी रेजीडेंसी को लूटा और उसमें आग लगाकर तहस-नहस कर दिया।खड़की में अंग्रेजों की विशाल सेना लगी हुई थी जिस पर Bajirao peshwa II के नेतृत्व में मराठों ने आक्रमण किया, लेकिन यहां पर अंग्रेजी सेना पहले से ही मुस्तैद थी इस वजह से बाजीराव द्वितीय को उल्टे पैर लौटना पड़ा।

इस हार के साथ बाजीराव द्वितीय ने 1 जनवरी 1818 में (भीमा कोरेगांव की लड़ाई) भी अंग्रेजी सेना के सामने आया।इस युद्ध में अंग्रेजी सेना हालांकि मराठी सेना से संख्या में काफी कम थी लेकिन मराठों को पराजित कर दिया। इस युद्ध के करीब 1 महीने बाद फरवरी माह में आष्टी नामक स्थान पर मराठी और अंग्रेजी सेना आमने-सामने हुई इस युद्ध में भी बाजीराव द्वितीय की हार हुई।

Bajirao peshwa II इस युद्ध के बाद पुणे छोड़कर भागना चाहता था लेकिन इस बार वह सफल नहीं हुआ। 3 जून 1818 के दिन Bajirao peshwa II ने अंग्रेजों के सामने समर्पण कर दिया। इस आत्मसमर्पण के बाद भी बाजीराव द्वितीय की मृत्यु 18 जनवरी 1851 को हुई। अंततः बाजीराव द्वितीय ने 76 वर्ष की आयु के बाद बिठूर में उन्होंने अंतिम सांस ली।

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