चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर कब और क्यों हुआ?

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चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर राजमाता कर्मावती या कर्णावती के समय हुआ था। चित्तौड़ के प्रथम साका की तरह, चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर  भी विश्व प्रसिद्ध है।

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चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर कब हुआ?

चित्तौड़ का साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर सन जनवरी,1535 ईस्वी में हुआ था। गुजरात के बहादुर शाह ने आक्रमण किया था। राजा विक्रमादित्य की हार की वजह से चित्तौड़ का दूसरा जौहर हुआ था।

चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर की वजह क्या थी?

गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया। जब यह खबर राजमाता कर्मवती या कर्णावती के पास पहुंची तो उन्होंने सभी राजपूत सैनिकों, सामंतों और सेना प्रमुखों को बुलाया और युद्ध के लिए तैयार किया। रावत बाघ सिंह को पाडन पोल पर तैनात किया।

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मार्च, 1535 में बहादुर शाह की सेना ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया। किले के ऊपर तोपों से अंधाधुंध गोले दागे गए, साथ ही दीवारों में सुरंग बनाकर बम से उड़ाया गया। वीर मेवाड़ी सैनिक अपनी वीरता और शौर्यता का परिचय देते रहे लेकिन तोपों के सामने ज्यादा देर तक टिक नहीं पाए और यही वजह रही कि महारानी राजमाता कर्मावती को जौहर करने का निर्णय लेना पड़ा।

चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर उन परिस्थितियों में हुआ जब ज्यादातर सैनिक मौत के घाट उतार दिए गए। राजमाता कर्मावती या कर्णावती के सानिध्य में 13000 वीर हिंदू वीरांगनाओं ने विजय स्तंभ के सामने जौहर करने का निर्णय लिया।

जौहर व्रत संपन्न होने के बाद आग की प्रज्वलित ऊंची ऊंची लपटों की छाया में केसरिया वस्त्र धारण किए वीर वीरांगनाओं ने अपनी देह को अग्नि के हवाले कर दिया। बुजदिल बहादुर शाह से लाखों गुना वीर इन स्त्रियों को कहा जाए तो कम नहीं, जिन्होंने अपनी आन बान और शान की रक्षा के लिए स्वयं को मातृभूमि के चरणों में समर्पित कर दिया।

चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर के बाद चारों तरफ रक्त ही रक्त था। चित्तौड़ विजय के बाद बहादुर शाह मुगल शासक हुमायूं से युद्ध करने के लिए गया। जहां पर वह हार गया, यह खबर मिलते ही 7500 राजपूत सैनिकों ने आक्रमण कर चित्तौड़ दुर्ग पर पुनः कब्जा कर लिया और विक्रमादित्य को पुनः गद्दी पर बिठाया।

चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर विश्व प्रसिद्ध हो गया स्वयं को अग्नि के हवाले कर राजमाता कर्मावती या कर्णावती विश्व प्रसिद्ध हो गई।

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