ग्वालियर रियासत का इतिहास (Great Gwalior Riyasat ka Itihas) प्रारंभ से लेकर अब तक।

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ग्वालियर रियासत का इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas) की बात कि जाए तो इसका कुल क्षेत्रफल 64856 वर्ग किलोमीटर या 25041 वर्ग मील था। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान भारत कई अलग-अलग रियासतों में बटा हुआ था जिनमें से “ग्वालियर रियासत” भी एक थी।

रियासत का अर्थ राज्य से है, अर्थात एक ऐसा स्थान जिसकी अपनी शासन व्यवस्था हो। सभी प्रशासनिक कार्य अपने तौर-तरीकों के आधार पर किए जाते हो। वर्तमान भारत की बात की जाए तो “ग्वालियर रियासत” भारत का हृदय कहे जाने वाले राज्य मध्यप्रदेश में स्थित थी।

जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया वैसे वैसे प्राचीन भारत के साम्राज्य में विखंडन होने लगा। जैसे कि मराठा साम्राज्य, मुगल साम्राज्य और दिल्ली पर राज करने वाले राजा महाराजाओं की कमजोर पड़ती शक्तियों ने भारत में कई छोटी-बड़ी रियासतों को जन्म दिया, ग्वालियर रियासत भी इनमें से एक थी।

मराठा राजवंश के अधीनस्थ या सहयोगी सिंधिया राजवंश द्वारा अंग्रेजों के साथ गठबंधन में रहकर “ग्वालियर रियासत” पर शासन चलाया गया था।

ग्वालियर रियासत का इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas)-

  • समयावधि Periods – 1731 से लेकर 1948 तक.
  • ग्वालियर का पुराना नाम Old Nmae Of Gwalior – गोपराष्ट्र.
  • ध्वज Flag – भगवा रंग का झंडा.
  • कुल या वंश चिन्ह Standard – सूर्य के दोनों तरफ बैठे हुए नाग.
  • ग्वालियर रियासत की राजधानी Capital – लश्कर (ग्वालियर).
  • क्षेत्रफल Area – 64856 वर्ग किलोमीटर या 25041 वर्ग मील.

ग्वालियर रियासत के इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas) की बात की जाए तो 10 वीं शताब्दी में इसका उदय हुआ था, लेकिन जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया इसे दिल्ली सल्तनत ने हड़प लिया और लगभग 1398 ईसवी तक इस पर राज किया।

जब भारत में मुगल साम्राज्य का उदय हुआ और मुगल साम्राज्य अपनी शक्ति और अधिकार को धीरे धीरे भारत में बढ़ाना शुरू किया, तब उन्होंने इस रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) को अपने क्षेत्राधिकार में शामिल कर लिया। 1528 ईस्वी से लेकर 17 से 36 ईस्वी तक मुगलों ने इस पर राज किया। बाद में जब मराठा साम्राज्य ज्यादा मजबूत हो गया और लगभग संपूर्ण भारत में अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ा रहा था, तब मराठा साम्राज्य के अधीन ग्वालियर रियासत भी आ गई और उन्होंने इसके ऊपर कब्जा कर लिया था।

ग्वालियर रियासत का इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas) लगभग 300 वर्ष पुराना है। ग्वालियर का पुराना नाम गोपराष्ट्र था जो कि गोपपर्वत या गोपगिरींद्र के आधार पर रखा गया था। महाभारत के पहले भारत का यह गौरवशाली जनपद गोपराष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था। ग्वालियर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) के साथ सिंधिया राजवंश का नाम जुड़ा हुआ है, ग्वालियर में सिंधिया वंश की स्थापना “राणोजी राव सिंधिया” द्वारा की गई थी। ग्वालियर का इतिहास बहुत ही अद्भुत और भारत का मान बढ़ाने वाला रहा है।

ब्रिटिश शासन काल के दौरान भारतवर्ष में 5 ऐस रियासतें थी जिनके राजाओं को “इक्कीस तोपों की सलामी” दी जाती थी।उनमें बड़ौदा रियासत, हैदराबाद रियासत, मैसूर रियासत, जम्मू कश्मीर रियासत और सबसे महत्वपूर्ण ग्वालियर रियासत थी।

महाभारत कालीन एक बहुत ही प्राचीन शहर जिसे गोपराष्ट्र के नाम से जाना जाता था, उसी के नाम पर इस रियासत का नाम ग्वालियर (Gwalior Riyasat ka Itihas) रखा गया। 18वीं सदी के प्रारंभ में राणोजी राव सिंधिया द्वारा मराठा परिसंघ के हिस्से के रूप में ग्वालियर रियासत की स्थापना की गई थी। मराठा साम्राज्य के अधीन स्थापित होने वाली ग्वालियर रियासत पर धीरे-धीरे सिंधिया वंश हावी होने लगा। जैसे-जैसे सिंधिया राजवंश का प्रभाव बढ़ता गया इस रियासत पर उनका एकाधिकार हो गया।

भारत के इतिहास में तीन बार आंग्ल-मराठा युद्ध हुए। यह तीनों युद्ध 1775 ईस्वी से लेकर 1819 ईस्वी तक चले। मराठा साम्राज्य में पड़ी फूट का फायदा सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य ने उठाया और धीरे-धीरे मराठा महासंघ पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया। मराठी में जो आपसी मतभेद थे उनका फायदा ब्रिटिश गणराज्य ने उठाया।

इन तीनों युद्ध का यह प्रभाव हुआ कि ग्वालियर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) मराठा साम्राज्य से अलग होकर अंग्रेजों के अधीन आ गई। लेकिन ग्वालियर रियासत पर राज सिंधिया परिवार द्वारा ही किया गया।
इस राज्य से प्राप्त होने वाला कर सीधे ब्रिटिश साम्राज्य की जेब में जाता था। देखते ही देखते ग्वालियर रियासत ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की सबसे बड़ी रियासत बन गई।

राजनीतिक देखरेख और शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अंग्रेजों ने इस रियासत के ऊपर एक रेजिडेंट रखा। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में लगभग 1936 ईस्वी में ग्वालियर रेजीडेंसी को सेंट्रल इंडिया एजेंसी से अलग कर दिया गया। इस रियासत पर भारत के गवर्नर जनरल का सीधा अधिकार आ गया। जब वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तब स्वतंत्रता के पश्चात ग्वालियर के सिंधिया शासकों ने भारत के नए राज्यों में प्रवेश किया और मध्यप्रदेश नामक राज्य में इसे शामिल किया गया।

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ग्वालियर रियासत का भौगोलिक इतिहास (Gwalior riyasat ka bhogolik itihas)-

ग्वालियर रियासत का भौगोलिक इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas) देखा जाए तो यह भारत की कुछ चुनिंदा सबसे बड़ी रियासतों में से एक थी। साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य के लिए व्यावसायिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रियासत थी।

ग्वालियर रियासत का कुल क्षेत्रफल 64856 वर्ग किलोमीटर या फिर 25041 मील था। ग्वालियर रियासत दो मुख्य भागों में विभाजित थी जिनमें ग्वालियर जिसे उत्तरी खंड कहा जाता है और दूसरा मालवा खंड।उत्तरी खंड 44,082 वर्ग किलोमीटर (17020 वर्ग मील) के साथ सबसे बड़ा भूभाग था।

यह खंड उत्तर, उत्तर पूर्व में स्थित था। चंबल नदी के उत्तर पश्चिम में, संयुक्त प्रांत में जालौन और झांसी के ब्रिटिश जिलों के पूर्व में, मध्य प्रांत में सौगौर जिले तक फैला हुआ था।

ग्वालियर रियासत के मुख्य शासक Chief ruler of princely state of Gwalior-

राणोजी राव सिंधिया ग्वालियर के सिंधिया वंश के संस्थापक थे। 1731 से लेकर 19 जुलाई 1745 ईस्वी इन्होंने शासन किया था। इसके अतिरिक्त ग्वालियर रियासत के इतिहास (Gwalior Riyasat ka Itihas) के बाद की जाए तो लगभग 250 वर्षों तक कई राजा महाराजाओं ने इस पर राज किया जिनका संक्षिप्त विवरण इस आर्टिकल के माध्यम से आपको मिलेगा।

1. राणोजी राव सिंधिया ( 1731 से लेकर 19 जुलाई 1745 तक) से ग्वालियर रियासत पर सिंधिया राजवंश द्वारा राज कार्य की शुरुआत हुई थी

2. जयप्पाराव सिंधिया (19 जुलाई 1745 से लेकर 25 जुलाई 1755 ईस्वी तक) ने तृतीय शासक के रूप में ग्वालियर रियासत पर राज किया था।

3. जानकोजीराव सिंधिया ( 25 जुलाई 1755 से लेकर 15 जनवरी 1761 तक) तृतीय शासक के रूप में ग्वालियर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) पर राज किया।

4. कादरजी राव सिंधिया (1763 से लेकर 1764 तक) चौथे शासक के रूप में राज किया।

5. मानाजी राव सिंधिया या मानाजी फकड़े ( 1764 से लेकर 1768 तक) पांचवे महाराजा के रूप में इन्होंने ग्वालियर रियासत पर राज किया था।

6. महादजी शिंदे या महादजी सिंधिया (1768 से लेकर 1794 तक) छठे महाराजा के रूप में इन्होंने ग्वालियर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) की सेवा की थी।

7. श्रीमंत दौलतराव सिंधिया ( 1794 से लेकर 1827 तक) ग्वालियर रियासत के सातवें महाराजा के रूप में इन्होंने कार्य किया था।

8.बैजाबाई महारानी ( Baiza Bai ) ने 1827 ईस्वी में ग्वालियर रियासत का कार्यभार संभाला था।

9. जानकोजी राव सिंधिया द्वितीय जिन्हें महाराजाधिराज महाराजा श्रीमंत जानकोजी राव सिंधिया द्वितीय बहादुर के नाम से भी जाना जाता है इन्होंने नौवें महाराजा के रूप में 1827 से लेकर 1843 तक राज किया।

10. महारानी ताराबाई 1843 से लेकर 1844 तक.

11. जयाजीराव सिंधिया ( shrimant jayaji Rao sindhiya) 1843 से लेकर 1886 तक इन्होंन 11वें महाराजा के रूप में राज किया था।

12. साख्याबाई 1886 से लेकर 1894 तक।

13. माधोराव सिंधिया (महाराजा सर माधवराव सिंधिया) ने ग्वालियर रियासत के पहले राजा के रूप में कार्य किया था।

14. चिंकूबाई 1925 से लेकर 1931तक।

15. गजरा राजेबाई 1931 से लेकर 1936 तक।

16. जिवाजीराव सिंधिया ( 1925 से लेकर 1948 तक) ने सोलहवें महाराजा के रूप में इन्होंने ग्वालियर रियासत के लिए योगदान दिया था।

ग्वालियर रियासत कि शासन प्रबंध व्यवस्था Government Management System of Gwalior State –

ग्वालियर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) को प्राचीन समय में प्रशासनिक कार्यों को सुचारू और व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए मुख्यतः दो प्रांतों में बांटा गया था। पहला भाग जो सबसे बड़ा और विस्तृत था उसका नाम “उत्तरी ग्वालियर” जिसमें ग्वालियर गीर, भिंड, श्योपुर, टोनवरघर, ईसागढ़, भिलसा और नरवर और दूसरे भाग का नाम “मालवा” क्षेत्र था।

जिसमें उज्जैन, मन्दसौर, शाजापुर एवं अमझेरा आदि जिलों में विभाजित था। इन जिलों को भी परगना और परगना को गांवों और हलकों में बांटा गया था, प्रत्येक गांव एक पटवारी के अधीन था।

ग्वालियर रियासत के महाराजाओं का मानक या चिन्ह The standard or emblem of the princely state of Gwalior –

प्राचीन समय में हर रियासत (Gwalior Riyasat ka Itihas) और राज्य के राजा, महाराजाओं का एक ध्वज और विशेष चिन्ह होते थे जो उन्हें विशेष पहचान दिलाते थे। ग्वालियर रियासत की बात की जाए तो इनका ध्वज भगवा रंग का था जो आगे से त्रिकोण रूप में था। वही ग्वालियर के महाराजा का मानक या चिन्ह की बात की जाए तो सूर्य के दोनों तरफ मंडराते हुए सांप थे। यही इनकी विशेष पहचान थी।

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