जीवाजीराव सिंधिया की प्रेम कहानी || Jivajirao Scindia Love story

Last updated on May 2nd, 2024 at 11:20 am

जीवाजीराव सिंधिया की प्रेम कहानी बहुत अनूठी है। जीवाजी राव सिंधिया राजवंश से ताल्लुक रखते हैं जबकि उनकी पत्नी विजयाराजे सिंधिया राजपूत परिवार से संबंध रखती है।

इसी वजह से उनकी शादी को लेकर शादी से पहले और शादी के बाद में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। इश्क करना किसी रिस्क से कम नहीं यह बात यह प्रेम कहानी साबित करती है। जीवाजी राव सिंधिया ने अपने प्रेम के लिए रियासत तक को दांव पर लगा दिया था।

जीवाजीराव सिंधिया की प्रेम कहानी की शुरुआत करने से पहले आपके लिए यह जानना जरूरी है कि माधो राव सिंधिया की मृत्यु के पश्चात जीवाजी राव सिंधिया ग्वालियर रियासत के नए महाराजा बने। यह सन 1925 की बात है।

2 नवंबर 1936 को जीवाजी राव सिंधिया को ग्वालियर रियासत के सभी अधिकार मिल गए। अब इस रियासत को जरूरत थी तो एक महारानी की, जिसका इंतजार सिर्फ सिंधिया परिवार ही नहीं बल्कि पूरा मराठा साम्राज्य कर रहा था। ग्वालियर रियासत के महाराजा होने के पश्चात भी मराठी सरदारों का बोलबाला था, उनकी सहमति के बिना कुछ भी काम संभव नहीं था।

सिंधिया परिवार को कमलप्रभा नामक राजकुमारी जोकि त्रिपुरा की रहने वाली थी बहुत पसंद आई और उन्होंने जीवाजी राव सिंधिया के साथ उनकी सगाई पक्की कर दी। लेकिन इस सगाई से मराठा आलाकमान खुश नहीं थी इस वजह से ग्वालियर रियासत के साथ-साथ जीवाजी राव सिंधिया का भी विरोध शुरू हो गया।

मराठों को नाखुश करने से ग्वालियर रियासत को नुकसान होना तय था, इसलिए जीवाजी राव सिंधिया को बड़ा कदम उठाना पड़ा। जीवाजी राव सिंधिया ने ग्वालियर रियासत को महत्व देते हुए और मराठा सरदारों का मान रखते हुए इस सगाई को तोड़ दी।

जब सच्चा प्रेम इंतजार कर रहा होता है तब अक्सर ऐसी घटनाएं देखने को मिलती है। सगाई टूटने के बाद सिंधिया राजवंश और मराठा सरदार चाहते थे कि जीवाजी राव सिंधिया की शादी किसी मराठी लड़की के साथ ही हो।

महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के यहां पर चंदन सिंह नामक एक राजपूत सरदार एडीसी के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने कई बार सागर के नेपाल हाउस में पली-बढ़ी लेखा दिव्येश्वरी देवी के बारे में महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के सामने चर्चा की, उसकी खूबसूरती की भी और उसकी बुद्धिमता की भी। जहाँ प्रेम लिखा होता है वहां कुदरत अपना करिश्मा जरूर करता हैं। कुछ ऐसा ही जीवाजीराव सिंधिया की प्रेम कहानी में भी हुआ।

जिन जोड़ों का मिलना तय होता है उनके बारे में हल्की सी भी बात हो तो दिलों की धड़कन बढ़ जाती है। ऐसा ही शिवाजी महाराज के साथ हुआ उनके मन में तीव्र इच्छा जाग उठी की वह तत्काल लेखा दिव्येश्वरी देवी से मिलना चाहते हैं। उनके मन में सिर्फ एक हिचकिचाहट थी कि वह राजपूत परिवार से ताल्लुक रखती थी। जीवाजी राव सिंधिया जानते थे कि ना तो सिंधिया परिवार खुश होगा ना ही मराठा सरदार।

महाराजा जीवाजीराव सिंधिया किसी काम से मुंबई गए हुए थे। मुंबई की यात्रा के दौरान लेखा दिव्येश्वरी देवी के मामा ने पहले ही जीवाजीराव से मिलवाने के लिए लेखा को वहां पर लेकर आए। महाराजा जीवाजी राव सिंधिया पहली नजर में ही लेखा दिव्येश्वरी देवी को दिल दे बैठे। जब उनके मुंह से लेखा दिव्येश्वरी देवी के लिए पहला शब्द निकला तो वह था राजकुमारी।

पहली मुलाकात में ही लेखा दिव्येश्वरी देवी ने महाराजा जीवाजी राव सिंधिया का मन चुरा लिया। और यहीं से महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की प्रेम कहानी की शुरुआत हुई।

लेखा दिव्येश्वरी देवी से बात करते करते जीवाजीराव उनकी सुंदरता, सौम्यता, सरलता और बुद्धिमता पर मंत्रमुग्ध हो गए।

पहली मुलाकात में ही महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह लेखा दिव्येश्वरी देवी से ही शादी करेंगे। मुंबई में सिंधिया परिवार का समुंदर महल था जहां पर उन्होंने लेखा दिव्येश्वरी देवी को सपरिवार आमंत्रित किया।

लेखा दिव्येश्वरी देवी जब समुद्र महल में पहुंची तो एक महारानी की तरह उनका भव्य स्वागत हुआ। इस स्वागत की भव्यता को देखते ही उनके मामा कुंजर समझ गए कि महाराजा जीवाजी राव सिंधिया उनकी भांजी के साथ ही शादी करने वाले हैं।

कुछ ही समय बिता था कि महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने लेखा दिव्येश्वरी देवी के मौसा चंदन सिंह के जरिए नेपाल हाउस में उनकी पसंद और शादी का प्रस्ताव भेजा। जिसे स्वीकार कर लिया गया। इतना सब हो जाने के बाद भी जीवाजी राव सिंधिया जानते थे कि यह विवाह इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि सिंधिया परिवार और मराठा सरदार जीवाजीराव की शादी किसी मराठी लड़की से ही करना चाहते थे, जो किसी राज परिवार से संबंध रखती हो.

लेकिन लेखा के प्रेम में पड़ चुके महाराजा जीवाजीराव किसी भी कीमत पर अब लेखा को नहीं खोना चाहते थे। लेखा का ना तो किसी शाही परिवार से ताल्लुक था ना ही वह मराठी थी। यही उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा था। लेकिन जब महाराजा जीवाजी राव ने ठान लिया तो मराठा सरदारों को भी उनके सामने झुकना पड़ा।

भारी विरोध के बाद भी जीवाजी राव सिंधिया और लेखा दिव्येश्वरी देवी की शादी हिंदू रिती रिवाज के साथ बहुत धूमधाम से हुई। इस शादी के साथ ही लेखा दिव्येश्वरी देवी ग्वालियर के शाही परिवार की राजकुमारी बन चुकी थी।

यह बात मराठा सरदार अब भी नहीं पचा पा रहे थे इसी वजह से लगातार विरोध करते रहे। जीवाजी राव सिंधिया के मौसा और ग्वालियर रियासत के बड़े सरदार आंग्रे से मिलवाने के लिए जीवाजीराव उनकी पत्नी लेखा दिव्येश्वरी देवी को उनके घर लेकर गए। लेकिन वहां पर उनका स्वागत नहीं किया गया, यहां तक कि उनसे बातचीत भी नहीं की।

मराठा सरदारों के विरोध के बाद उन को खुश करने के लिए मराठा साम्राज्य के अनुसार लेखा दिव्येश्वरी देवी का नाम बदलकर विजयाराजे सिंधिया कर दिया गया। विजयाराजे सिंधिया एकदम सौम्य और निष्ठावान थी, इसी वजह से लगातार वह मराठों और सिंधिया परिवार के बीच में अपनी पैठ बनाती जा रही थी।

धीरे-धीरे विजयाराजे सिंधिया ने सभी का दिल जीत लिया और जो सरदार उनका पुरजोर विरोध कर रहे थे वही सरदार दिल खोल कर उनकी तारीफ करने लगे। महारानी विजयाराजे सिंधिया पूरी तरह सिंधिया राजवंश में ढल गई जिनके सम्मान में सिंधिया परिवार और मराठा सरदार तारीफों के कसीदे कसने लगे।

इस तरह महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की प्रेम कहानी एक विरोध के साथ शुरू हुई थी, लेकिन कहते हैं कि प्रेम जिनकी किस्मत में लिखा होता है उन्हें मिलकर रहता है। इस तरह मराठा परिवार से संबंध नहीं रखने के बाद भी महाराजा जीवाजी राव सिंधिया और महारानी विजय राजे सिंधिया की प्रेम कहानी इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गई।

मूमल और महेंद्र की प्रेम कहानी।