kanhoji angre सरखेल कान्होजी आंग्रे का इतिहास।

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kanhoji angre (कान्होजी आंग्रे) मराठा साम्राज्य की नौसेना के सर्वप्रथम सेनानायक थे। इन्हें समुंद्र के शिवाजी के नाम से भी जाना जाता है।

कान्होजी आंग्रे का संक्षिप्त परिचय who was kanhoji angre-

  • पूरा नाम full name– सकल राजकार्य धुरंधर विश्वासनिधि राजमान्य राजेश्री कान्होजी आंग्रे सरखेल।
  • अन्य नाम other names– सरखेल आंग्रे, समुंद्र के शिवाजी, सरखेल कान्होजी आंग्रे दरियासारंग, conajee Angria.
  • जन्मतिथि kanhoji angre date of birth– 1669
  • जन्म स्थान kanhoji angre birth place-सुवर्नादुर्ग,रत्नागिरी महाराष्ट्र।
  • मृत्यु तिथि kanhoji angre died– 4 जुलाई 1729 ई.
  • मृत्यु स्थान kanhoji angre death place– अलीबाग, महाराष्ट्र।
  • पिता का नाम kanhoji angre father’s name– तुकोजी।
  • माता का नाम kanhoji angre mother’s name– अंबाबाई।
  • पत्नियां kanhoji angre wife’s name– मथुराबाई, लक्ष्मीबाई, गहिनाबाई।
  • बच्चे kanhoji angre family tree– सेखोजी, संभाजी,तुलाजी, मानाजी, यासाजी, धोंडज।
  • पद/उपाधि Rank or title– सरखेल या नौसेना अध्यक्ष, (grand admiral).
  • इनके समय छत्रपति– राजाराम द्वितीय।
  • कार्यकाल Tenure -1689 से 1729 तक।
  • सेवा शाखा Service branch– मराठा साम्राज्य, नेवी।
  • मृत्यु के समय आयु Age at death– 60 वर्ष।

मराठा साम्राज्य की मजबूत और शक्तिशाली सेना में कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre story) को बहुत ही प्रतिष्ठित और दायित्व वाला पद “सरखेल पद” मिला।
सरखेल पद का अर्थ होता है नौसेना अध्यक्ष या एडमिरल।

इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह बहुत ही अच्छे तरीके से किया।
इनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से, “नाविक विद्या” की वजह से और समुद्र में युद्ध कौशल को देखते हुए इन्हें समुद्र के शिवाजी के नाम से भी जाना जाता है।

इन्हें “सरखेल कान्होजी आंग्रे दरियासारंग” के नाम से भी जाना जाता हैं। अंग्रेजों, डच और पुर्तगालियों के खिलाफ इन्होंने भारत के समुद्र तट पर कई लड़ाइयां लड़ी थी।
अंग्रेजों और पुर्तगालियों के भरसक प्रयास के बाद भी आजीवन अपराजित रहे।

कान्होजी आंग्रे का इतिहास (kanhoji angre history in hindi) और प्रारंभिक जीवन

सकल राजकार्य धुरंधर विश्वासनिधि राजमान्य राजेश्री कान्होजी आंग्रे सरखेल का जन्म महाराष्ट्र के एक सामान्य कोली परिवार में हुआ था। इनका जन्म अंगारवाड़ी नमक गांव में हुआ।अंगारवाड़ी गांव महाराष्ट्र के पुणे से 6 मील की दूरी पर मावल की पहाड़ियों में (Maval Hills) में स्थित है।

कान्होजी आंग्रे का सरनेम उनके गांव के नाम के आधार पर angre रखा गया। जबकि इनके परिवार का पारंपरिक सरनेम Sankpals था।
Kanhoji angre (kanhoji angre cast) से पहले इनके परिवार के सभी सदस्यों को Sankpals के नाम से ही जाना जाता था।

कान्होजी आंग्रे का बचपन क्षत्रिय महादेव कोली समाज के नाविकों के बीच में बीता था। इन्हीं के मध्य में रहकर कान्होजी आंग्रे ने तैरना सीखा, नाविक विद्या सीखी और पानी में लड़ाई के तौर तरीके सीखे।
पुर्तगाल इतिहासकारों का मानना है कि कान्होजी आंग्रे ने वर्सोवा के द्वीपों में हिंदुओं के विनम्र सेवक के रूप में अपने जीवन का आरंभ किया था।
अगर पारिवारिक इतिहास देखा जाए तो वो क्षत्रिय मराठी थे।

2009 में डच इतिहासकार रेने बेंडसे ने लिखा कि kanhoji angre cast की कहानी थोड़ी विवादास्पद हैं। रेने बेंडसे ने लिखा कि ज्यादा संभावना तो यह है कि वो एक कोली समाज से थे लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें सिद्दि ( पूर्वी अफ्रीका) वंशज का माना है। जबकि  मराठा साम्राज्य के अनुसार वो क्षत्रिय थे।

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सरखेल पद या दरिया सारंगा ( एडमिरल) पद का दायित्व

1698 ई. में सतारा के राजा “छत्रपती राजाराम द्वितीय” ने योग्यता और कौशलता को देखकर कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre) को सरखेल पद या दरिया सारंगा (एडमिरल) पद प्रदान किया।
इस पद का मुख्य दायित्व था समुद्री सीमा में मराठा साम्राज्य के कार्य को करना और अंग्रेज़ो के व्यापार को ठप करना। सरखेल के अधिकार के तौर पर वह भारत के western Coast के मुखिया थे जो कि मुंबई से लेकर विंगोरिया तक फ़ैला हुआ था।
कान्होजी आंग्रे ने अपने शुरुआती दिनों में “ईस्ट इंडिया कम्पनी” के जहाजों पर हमला किया।

1702 ई. में उन्होंने कालीकट बंदरगाह से एक व्यापारी जहाज का अपहरण किया इस दौरान उनके साथ 6 अंग्रेज़ी नाविक भी थे। इस जहाज को अपहरण के बाद कान्होजी आंग्रे अपने बंदरगाह तक लेकर आए।

कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre) के मुख्य ठिकाने-

  • 1. राजा भोज द्वारा निर्मित किया गया विजयदुर्ग जिसे विक्ट्री फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है, निर्माण के कई वर्षों बाद खंडहर सा हो गया था जिसे मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुनरुत्थान करवाया था। 1698 ई. में इस क़िले को kanhoji angre ने अपने प्रथम ठिकाने के रूप में चुना। जो युद्ध के समय और अन्य सैन्य कार्यवाही के लिए उत्तम था। यह मुंबई से लगभग 485 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • 2. अन्य ऑपरेटिंग बेस बनाने के लिए कान्होजी आंग्रे ने अलीबाग स्थित “कोलाबा” के द्वीपों में से एक को चुना। भारत और मराठा साम्राज्य में बाहर से आए हुए जहाजों जो कि व्यापारिक थे पर कर लगाने के लिए उन्होंने “खंडेरी और अंधेरी” नामक स्थानों को चुना।
  • 3. इतना ही नहीं कान्होजी आंग्रे ने मुंबई में समुद्र के किनारे एक टाउनशिप की स्थापना की थी। इसका नाम उन्होंने अलीबाग रखा। आज इस गांव को रामनाथ के नाम से जाना जाता है। कान्होजी आंग्रे ने स्वयं की मुद्रा प्रचलित करने के लिए चांदी के सिक्के जारी किए, इन सिक्कों को “अलीबागी रुपैया” के नाम से जाना गया।
  • 4.व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए कान्होजी आंग्रे ने रत्नागिरी के पूर्णागढ़ में एक सामरिक बंदरगाह का निर्माण करवाया। इस बंदरगाह में 70 तोपें और 7 बंदूकें मिली थी। इस बंदरगाह का निर्माण आंग्रे द्वारा 1724 ईस्वी में किया गया था।

कान्होजी आंग्रे द्वारा चलाए गए मुख्य अभियान और उनके खिलाफ किए षड्यंत्र-

कान्होजी आंग्रे एक सामान्य नौसेना अध्यक्ष नहीं थे। विशिष्ठ प्रतिभा के साथ-साथ युद्ध कौशलता, दूरदर्शिता, सटीक रणनीति, अपनी मातृभूमि की रक्षा का संकल्प और मराठा साम्राज्य की रक्षा हेतु हमेशा तत्पर रहने वाले कान्होजी आंग्रे बहुत गुस्से वाले थे।

जब तक इनके सामने दुश्मन होते और यह उन्हें पराजित नहीं कर देते तब तक इन्हें चैन नहीं आता था। इसी क्रम में इन्होंने अंग्रेजों और पुर्तगालियों के खिलाफ कई अभियान चलाए और उन्हें पराजित भी किया।

संख्या में बहुत अधिक होने के बाद भी अंग्रेजी और पुर्तगाली सेना कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre) से भय खाती थी।
1712 ई. से कान्होजी आंग्रे ने दुश्मनों के खिलाफ अपने अभियान और विद्रोह को और प्रभावी बनाया।

4 नवंबर 1712 ब्रिटिश साम्राज्य के लिए काला दिन था।ब्रिटिश राष्ट्रपति विलियम एस्लाबी की व्यक्तिगत सशस्त्र नौका थी जिसका नाम एल्जाइन” था पर कान्होजी आंग्रे  कब्जा कर लिया।”एल्जाइन” की रक्षा का जिम्मा थॉमस चाउन के पास था। थॉमस चाउन को कान्होजी आंग्रे ने मौत के घाट उतार दिया उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया और बंदी बनाकर जेल में डाल दिया।

ब्रिटिश शासन के लोगों से कान्होजी आंग्रे ने फिरौती के रूप में ₹30000 की मांग की। अगर ब्रिटिश शासन इस मांग को पूरी करेगा तो थॉमस चाउन की पत्नी को जेल से रिहा कर दिया जाएगा।हालांकि कान्होजी आंग्रे और उनके साथियों ने थॉमस चाउन की पत्नी को छुआ तक नहीं था।
13 फरवरी 1713 के दिन ब्रिटिश शासन की तरफ से नियुक्त पदाधिकारी पैसे लेकर कान्होजी आंग्रे के पास पहुंचे सरिता अनुसार kanhoji angre ने थॉमस चाउन की वाइफ को बंदी से मुक्त कर दिया।

इतना ही नहीं ब्रिटिश शासन ने जो जमीन अपने कब्जे में ली थी उसे भी वापस कर दी। इस समय कान्होजी आंग्रे इस उम्मीद में थे कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी आगे भी उनके साथ रहेगी और उनकी मदद करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसके विपरीत ईस्ट इंडिया कंपनी अपना क्षेत्र और प्रभाव बढ़ाने के लिए निरंतर मराठा साम्राज्य के खिलाफ साजिश करती रही।
इससे आहत होकर कान्होजी आंग्रे ने बालाजी विश्वनाथ के साथ मिलकर ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई लड़ने का निश्चय किया।

मुंबई से इंग्लैंड को जाने वाली जहाज जो कि गोवा में तैनात थे उनमें ईस्ट इंडियन , सोमरस जहाज और ग्रंथम नामक जहाजों को कान्होजी आंग्रे ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
लगातार हो रही युद्ध और साजिशों को रोकने के लिए कान्होजी आंग्रे ने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष इस्लाबी से एक संधि की जिसके तहत जहाजों की लूटपाट रोकने की बात कही गई।

26 नवंबर 1715 को ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष इस्लाबी का कार्यकाल समाप्त हो गया। इनकी जगह ब्रिटिश शासन नेे “चार्ल्स बुन” अध्यक्ष बनाकर भारत भेजा।
चार्ल्स बुन बहुत चतुर और चालाक था। चार्ल्स बुन ने सबसे पहले योजना बनाई कि कैसे भी करके अगर कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre) को पकड़ लिया जाए और बंदी बना लिया जाए तो उनके खिलाफ विरोध को आसानी के साथ दबाया जा सकता है। इस समय मराठा नौसेना में कान्होजी आंग्रे के बराबर का कोई सेना अध्यक्ष नहीं था।

चार्ल्स बुन के प्रयास असफल रहे, इसके विपरीत ब्रिटिश साम्राज्य को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। कान्होजी आंग्रे ने ईस्ट इंडिया कंपनी के तीन और बड़े जहाजों को अपने कब्जे में कर लिया।
जब अंग्रेजों को लग गया कि वह अब कान्होजी आंग्रे को पराजित नहीं कर सकते हैं तो उन्होंने पुर्तगालियों से मिलकर कान्होजी आंग्रे के खिलाफ लड़ने की योजना बनाई।
वायसराय फ्रांसिस्को जोस डे संप्रियो ई कास्त्रो (पुर्तगाल प्रमुख) और जनरल रॉबर्ट कोवान (ब्रिटिश जनरल) ने संयुक्त रूप से प्रयास प्रारंभ किए। कान्होजी आंग्रे की रणनीति यहां पर भी काम आए और संयुक्त रूप से अंग्रेजों और डाचों को उन्होंने पराजित कर दिया।

कान्होजी आंग्रे की लूटपाट चलती रही। मेंढाजी भाटकर की सहायता लेकर कान्होजी आंग्रे और अधिक शक्तिशाली बन गए।
कमांडर थॉमस मैथ्यू एक ऐसी जहाजी बेड़े का नेतृत्व कर रहे थे जो आकार में विशालकाय होने के साथ-साथ, 6000 हथियारबंद सैनिकों से लैस था।

एक साथ लड़ने वाले मराठी होता कभी भी पराजित होने की स्थिति में नहीं थे यह देखकर कमांडर थॉमस मैथ्यू पुनः ब्रिटेन लौट गए। 1723 ईस्वी में ब्रिटिश शासन ने थॉमस मैथ्यू पर आरोप लगाया कि उन्होंने जानबूझकर कान्होजी आंग्रे (kanhoji angre) को नहीं मारा, ये भी साजिश में शामिल थे।1729 तक चार्ल्स बुन भी चले गए।

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कान्होजी आंग्रे के नेतृत्व में लड़े गए मुख्य युद्ध (kanhoji angre yogdan)

(1). 1702 ई. में छह अंग्रेजों का सामना करते हुए एक छोटे जहाज को इन्होंने जप्त कर लिया यह इनके द्वारा किया गया पहला कार्य था।

(2). 1706 जंजीरा के सद्दियों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें पराजित कर दिया।

(3). 1710 ईस्वी में “गोडोल्फिन” नामक ब्रिटिश पोत से लड़ाई लड़ते रहे और मुम्बई के समीप स्थित केनेरी जिसको वर्तमान में खंडेरी के नाम से जाना जाता हैं, को अपने कब्जे में ले लिया।

(4). 1712 ईस्वी में मुंबई के ब्रिटिश राष्ट्रपति विलियम एस्लाबी की सशस्त्र नौका एल्जाइन पर कब्जा कर लिया और गिरफ्तार थॉमस चाउन को पत्नी को तीस हजार रुपए की फिरौती के बाद ही छोड़ा गया था।

(5). 1713 ईस्वी में अंग्रेजों ने ब्रिटिश शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीनस्थ 10 किल्ले (10 Forts) कान्होजी आंग्रे को सौंप दिए।

(6). 1718 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे और साथियों मुंबई बंदरगाह पर अपना डेरा डाला तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों को यहां पर आने से रोक दिया जिस से आहत होकर ब्रिटिश शासन ने एक बहुत बड़ी रकम फिरौती के रूप में कान्होजी आंग्रे को अदा की। तत्कालीन गवर्नर बुम की देखरेख में अंग्रेजी सेना ने विजयगढ़ किले पर आक्रमण किया लेकिन यहां पर भी उन्हें हार मिली।

(7).1720 में घेरिया में स्थित विजयदुर्ग पर अंग्रेजी सेना द्वारा हमला किया गया लेकिन इस हमले के प्रतिफल के रूप में अंग्रेजों को हार हाथ लगी।

(8). 1721 ई. में जब अंग्रेजो को लगा कि वह कान्होजी आंग्रे का अकेले सामना नहीं कर सकते हैं, तो उन्होंने रणनीति के तहत पुर्तगालियों से हाथ मिलाया। जब ब्रिटिश बेड़ा मुंबई पहुंचा और पुर्तगाली भी साथ आ गए तब उन्होंने अलीबाग पर आक्रमण कर दिया लेकिन इस बार भी अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी।

(9). 1722 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे ने अंग्रेजों की चार सशस्त्र नौकाओं सहित 20 जंगी जहाजों पर हमला कर दिया।

(10). 1723 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे ने ईस्ट इंडिया कंपनी के दो महत्वपूर्ण जहाजों “ईगल और हंटर” पर हमला कर दिया लूटपाट की और बड़ा नुकसान पहुंचाया।

(11). 1724 ईस्वी में पुर्तगालियों ने कान्होजी आंग्रे के सामने संधि का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। लेकिन इस बीच विजयदुर्ग पर डचों ने हमला भी कर दिया जिसे बड़ी ही सहजता के साथ कान्होजी आंग्रे ने जीत लिया।

(12). 1725 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे और मुगल शासन के अधीनस्थ सिद्धियों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए।

(13). 1729 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे ने पालगढ़ का किला जो कि उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीनस्थ आ गया था पर धावा बोल दिया और जीत हासिल करते हुए अपने अधीनस्थ कर लिया।

कान्होजी आंग्रे की मुद्राएं (मोहरें, seals of kanhoji angre )-

कान्होजी आंग्रे ने अपने शासनकाल के दौरान तीन तरह की मुद्राएं भी प्रचलित की थी। जब उन्होंने पहली बार मुद्रा जारी की तब मराठा साम्राज्य के छत्रपति राजाराम थे। इसलिए उन्होंने छत्रपति राजाराम का जिक्र भी इस मुद्रा पर अंकित किया है। जबकि उनके द्वारा जारी की गई अन्य दो मुद्राएं छत्रपति शाहूजी के समय जारी की गई थी इसलिए छत्रपति साहूजी से संबंधित संदेश भी इस पर अंकित किया गया है।

पहली मुद्रा-
कान्होजी आंग्रे द्वारा पहली मुद्रा छत्रपति राजाराम के समय जारी की गई। इस मुद्रा पर अंकित सुचना यह थी- IIश्रीII राजाराम चरणी, सादर तुकोजी सुत, कान्होजी आंगरे निरंतर।इस संदेश का मतलब था तुकोजी पुत्र कान्होजी आंग्रे सदैव राजाराम की सेवा में तत्पर है।

दूसरी मुद्रा-
दूसरी मुद्रा जारी करने के समय मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहूजी महाराज थे। इसलिए इस मुद्रा पर अंकित संदेश में साहू जी का जिक्र किया गया है।इस मुद्रा पर अंकित सूचना- श्री राजा साहू चरणी तत्पर तुकोजी सूत कान्होजी आंग्रे सरखेल निरंतर।इसका अर्थ था कि तूको जी के पुत्र कान्होजी आंग्रे हमेशा छत्रपति शाहू जी के चरणों में तत्पर हैं।

तीसरी मुद्रा– 
कान्होजी आंग्रे द्वारा जारी गई की तीसरी मुद्रा छत्रपति शाहूजी महाराज के समय थी। इसीलिए इस मुद्रा पर छत्रपति शाहूजी महाराज का उल्लेख किया गया है।
इस मुद्रा पर अंकित संदेश- श्री शाहू नृपती प्रित्या तुकोजी तनुजन्म ना कान्होजी सरखे लस्यमुद्राजय तीसर्वदा।इस संदेश का मतलब था श्री राजा साहू की प्रीति से तूको जी के पुत्र सरखेल कान्होजी आंग्रे की मुद्रा सदैव विजयी है।

कान्होजी आंग्रे की मृत्यु kanhoji angre died  

4 जुलाई 1729 के दिन मराठा साम्राज्य के नौसेना अध्यक्ष सकल राजकार्य धुरंधर विश्वासनिधि राजमान्य राजेश्री कान्होजी आंग्रे सरखेल का निधन हुआ था।कान्होजी आंग्रे की समाधी शिवाजी चौक, अलीबाग महाराष्ट्र में स्थित है।

कान्होजी आंग्रे की मृत्यु के पश्चात क्या हुआ

कान्होजी आंग्रे की मृत्यु के बाद उनके पुत्र सेखोजी को सेना अध्यक्ष बनाया। सेखोजी ने 1733 तक राज किया। 1733 ईस्वी में से खोजी की मृत्यु हो गई, सेखोजी की मृत्यु के पश्चात परिवार में फूट पड़ गई और संपत्ति का विभाजन करना पड़ा।

संभाजी और मानाजी को आधा आधा हिस्सा मिला। परिवार में फूट पड़ने की वजह से मराठों ने इन्हें नजरअंदाज करना शुरू कर दिया, अब ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम आसान हो गया।1756 ईस्वी में कान्होजी आंग्रे के पुत्र तूलाजी विजयदुर्ग पर हुए हमले में मारे गए। यह हमला अंग्रेजों और मराठों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।इसके साथ ही आंग्रे परिवार का राज खत्म हुआ।

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