Kanhoji Jedhe कान्होजी जेधे का इतिहास और कहानी।

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कान्होजी नाईक जेधे देशमुख (Kanhoji Jedhe Naik Deshmukh) 17 वीं शताब्दी में मराठा सेना में सरदार थे। इतना ही नहीं शाहजी और उनके पुत्र शिवाजी के सबसे विश्वसनीय सहयोगीयों में से एक थे। जिन्हें 1674 ईस्वी में मराठा साम्राज्य की कमान सौंपी गई थी।

कान्होजी जेधे का इतिहास or Kanhoji Jedhe Naik Deshmukh History In Hindi-

kanhoji jedhe history in marathi में उपलब्ध हैं, लेकिन हिन्दी पाठकों के लिए यह आर्टिकल उपयोगी साबित हो सकता हैं। कान्होजी नाईक जेधे देशमुख के स्वामित्व में पुरा “रोहिद खोरा” था। जिसमें पुणे (महाराष्ट्र) के पास स्थित रायेश्वर का किला और रोहिडेश्वर का क़िला शामिल था जो वर्तमान में भोर तालुका में स्थित है। कान्होजी जेधे भगवान् भोलेनाथ के बहुत बड़े भक्त थे।

kanhoji jedhe history की बात की जाए तो इनका परिवार शुरू से ही राष्ट्र भक्त और देश सेवा में तत्पर था। एक छोटे से भूभाग पर देशमुखों द्वारा राज किया जा रहा हैं।
कान्होजी जेधे द्वारा सभी प्राशसनिक कार्यों को उनके मूल स्थान कारी ( Kaari) से नियंत्रित किया जाता था। इतना ही नहीं कान्होजी जेधे सभी देशमुख महानुभावों के बीच विश्वसनीय और सम्मानित थे।

कान्होजी नाईक जेधे देशमुख की आयु “शाहजी” के बराबर थी। यही वजह थी कि कान्होजी जेधे और शाहज के बीच अच्छी मित्रता भी थी। इतना ही नहीं कान्होजी जेधे का बड़ा पुत्र “बाजी सरजीराव जेधे ” शाह जी के बड़े पुत्र (शिवाजी) से 2 महीने बड़े थे।

शाहजी ने उनके पुत्र शिवाजी को कान्होजी जेधे के साथ पुणे भेज दिया। Kanhoji jedhe का पुणे के जमींदारों के साथ बहुत अच्छे व्यक्तिगत संबंध थे और जमीदार उनकी बात मानते थे।
इसलिए kanhoji jedhe ने शिवाजी को अपने सानिध्य में हर कार्य और योजना में शामिल किया ताकि उन्हें अनुभव मिल सके और प्रशासनिक के कार्यों को अच्छे तरीके से करने की योग्यता हासिल हो सके।

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kanhoji jedhe  की योग्यता और क्षमता परीक्षण का समय तब आया जब बीजापुर दरबार द्वारा अफजल खान को शाहजी के पुत्र शिवाजी पर हमला करने के लिए भेजा।
कान्होजी जेधे की वीरता और कौशलता से आदिलशाह भलीभांति परिचित था। इसलिए आदिलशाह ने पहले ही देशमुख समुदाय को धमकी दी कि अगर कोई अफजल खान या आदिलशाह के रास्ते में आया तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा।

शाहजी के पुत्र शिवाजी के आदेश पर कान्होजी जेधे ने उन सभी देशमुख सरदारों को एकत्रित किया और “वाड़ा”में जो कि कारी (Kaari) के समीप था,पर एक बहुत ही गुप्त मीटिंग बुलाई।
सभी देशमुखों को प्रेरित करते हुए बोले कि स्वराज की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। किसी की धमकी से डरने की बजाए एकजूट होकर दुश्मनों का सामना करना चाहिए। सभी देशमुख सरदारों ने एक साथ आकर कान्होजी जेधे का साथ देने और आदिलशाह का सामना करने की ठान।

प्रतापगढ़ की लड़ाई शुरू हुई जिसमें अफजल खान और आदिलशाह का सामना देशमुख सरदारों से हुआ। आपसी एकजुटता से इस भयंकर युद्ध में kanhoji jedhe की जीत हुई। अफजल खान की भारी भरकम और विशाल सेना को हार का सामना करना पड़ा।

प्रतापगढ़ की इस लड़ाई में कान्होजी जेधे का पराक्रम, वीरता, युद्ध प्रणाली, आक्रामक रूप और तेज़ देखकर शिवाजी की आंखें खुल रह गई। उन्होंने इतनी वीरता से लड़ते हुए किसी को नहीं देखा था।

शिवाजी ने पुरुस्कार स्वरूप kanhoji jedhe को  “Talwarichya Pahilya Panache Maankari” तलवार भेंट की और सम्मान किया।
जब शिवाजी को अपने ही घर में नजरबंद कर लिया गया था तब कान्होजी जेधे ने ही उनको मुक्त करवाया था।

जेधे वंश का योगदान-

महाराष्ट्र राज्य की स्थापना में जेधे वंश (kanhoji jedhe vanshaj ) अर्थात् देशमुख परिवार का बड़ा योगदान रहा। 20वीं सदी में कान्होजी जेधे के वंशजों में केशवराव जेधेे द्वारा स्थापित “संयुक्त महाराष्ट्र समिति” ने मराठी भाषा को राज्य भाषा का दर्ज़ा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। “महाराष्ट्र दिवस” भी इस परिवार की देन हैं।

कान्होजी जेधे की समाधी स्थल (kanhoji jedhe Samadhi)

kanhoji jedhe की Samadhi अंबावडे, महाराष्ट्र में स्थित है। Kanhoji Jedhe museum located in ambawade Maharashtra.

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