महाराणा रतन सिंह द्वितीय का इतिहास || History Of Maharana Ratan Singh II

Last updated on June 19th, 2024 at 09:35 am

महाराणा रतन सिंह द्वितीय, महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) के पुत्र थे। महाराणा सांगा के 7 पुत्र थे जिनमें से तीन पुत्रों की मृत्यु महाराणा सांगा के जीवित रहते ही हो गई।

30 January 1528 ईस्वी को महाराणा सांगा के पुत्र महाराणा रतन सिंह द्वितीय मेवाड़ के महाराणा बने क्योंकि जीवित बचे तीन भाइयों विक्रमादित्य, उदय सिंह और रतन सिंह में यह सबसे बड़े थे।

महाराणा रतन सिंह द्वितीय के मेवाड़ का राजा बनने के बाद इनके दोनों छोटे भाई विक्रमादित्य और उदय सिंह को रणथंबोर का राजा नियुक्त किया गया।

महाराणा रतन सिंह द्वितीय का इतिहास और जीवन परिचय (History Of Maharana Ratan Singh II)

महाराणा रतन सिंह द्वितीय के मेवाड़ का शासक बनने के पश्चात उनके दोनों छोटे भाइयों विक्रमादित्य और उदय सिंह को रणथंबोर की बागडोर मिलने के पीछे मुख्य वजह यह थी कि महारानी हाड़ी ( कर्मवातीबाई) ने महाराणा सांगा से पहले ही यह जागीर अपने दोनों पुत्रों के लिए मांग ली थी, क्योंकि महारानी को शक था कि महाराणा सांगा की मृत्यु के पश्चात हो सकता है रतन सिंह इन्हें राज्य से दूर कर दे।

महाराणा सांगा से रणथंबोर राज्य की मांग स्वीकृत करवा कर रानी हाड़ी ने अपने दोनों पुत्रों विक्रमादित्य और उदय सिंह को उनके भाई सूर्यमल (सूरजमल) को सौंप दिए।

रानी हाड़ी की बात सुनकर उनके भाई सूरजमल ने कहा कि मुझे आपकी आज्ञा का पालन करना चाहिए, लेकिन इससे पहले मेवाड़ के राजा महाराणा रतन सिंह द्वितीय से भी इस विषय पर सलाह लेना उचित रहेगा क्योंकि हो सकता है भविष्य में महाराणा रतन सिंह द्वितीय इस बात को लेकर मुझसे लड़ाई या नाराजगी जाहिर कर सकता हैं।

सूर्यमल (सूरजमल) महाराणा रतन सिंह द्वितीय की आज्ञा लेने के लिए मेवाड़ पहुंचे और सारी बात महाराणा रतन सिंह को बताई। हालांकि महाराणा रतन सिंह द्वितीय उनकी बात से संतुष्ट नहीं थे, लेकिन फिर भी ऊपरी मन से उन्होंने सूर्यमल की बात मान ली और अपनी सहमति जताई।

महमूद खिलजी (मांडू) का मेवाड़ की ओर रुख

महाराणा सांगा की मृत्यु का समाचार सुनकर मांडू का बादशाह महमूद खिलजी बहुत खुश हुआ और बदला लेने के लिए अपनी सेना को मेवाड़ की तरफ भेजा जिसकी कमान शर्जा खां के हाथ में सौंपी। शर्जा खां महमूद खिलजी की सेना का नेतृत्व करते हुए मेवाड़ में पहुंचा और लूटपाट शुरू कर दी। जब इस बात की खबर महाराणा रतन सिंह द्वितीय को भूमि तो वह भी अपनी सेना सहित मालवा पर चढ़ाई करने के लिए निकल पड़े।

दूसरी तरफ महमूद खिलजी भी महाराणा रतन सिंह द्वितीय का सामना करने के लिए अपनी सेना के साथ निकला और उज्जैन होता हुआ सारंगपुर आ गया। अपने आप को और अधिक मजबूत करने के लिए महमूद खिलजी ने एक चाल चली मोइन खान (देवास) और सलहदी पुरबिये को बड़ी उपाधि और परगने दिए ताकि वह उनको अपने साथ मिला सके।

लेकिन दोनों को महमूद खिलजी पर विश्वास नहीं था इसलिए दोनों ने महाराणा रतन सिंह द्वितीय के साथ संधि कर ली और गुजरात के बादशाह बहादुर शाह के पास चले गए। जब यह बात महमूद खिलजी को पता चली तो वह डर गया और बिना युद्ध लड़े पुनः मांडू लौट गया। मांडू प्रदेश को महाराणा रतन सिंह द्वितीय ने लूटा और मोइन खान और सलहदी प्रदान किए।

दूसरी तरफ जब महाराणा रतन सिंह पुनः चित्तौड़ लौट आए तब गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने मालवा पर आक्रमण करते हुए अपने राज्य में मिला लिया।

रणथंबोर को लेकर महाराणा रतन सिंह द्वितीय की मंशा

रणथंबोर एक ऐसा राज्य था जो धन-धान्य से परिपूर्ण था जिसकी कीमत लगभग 50-60 लाख रुपए से भी अधिक थी। इतना बड़ा राज्य और मजबूत किले वाला प्रदेश महाराणा रतन सिंह द्वितीय के दोनों भाइयों उदय सिंह और विक्रमादित्य के हाथ में था, जो महाराणा रतन सिंह द्वितीय को अच्छा नहीं लगता था वह इसे हथियाना चाहते थे।
इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए महाराणा रतन सिंह ने कोठारिया के पूरणमल चौहान को रणथंबोर भेजा।

जब पूरणमल रणथंबोर पहुंचे तो उन्होंने रानी हाड़ी को बताया की उदय सिंह और विक्रमादित्य महाराणा रतन सिंह द्वितीय के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। आप और आपके दोनों पुत्रों का चित्तौड़ में हार्दिक स्वागत है। सारा वृतांत सुनने के बाद रानी हाड़ी को लगा कि महाराणा रतन सिंह द्वितीय के मन में कुछ तो कपट हैं। पूरणमल को जवाब देते हुए रानी हाड़ी ने कहा कि विक्रमादित्य और उदयसिंह अभी छोटे हैं, मैं इन्हें अभी नहीं भेज सकती हूं।

पूरणमल चित्तौड़ पहुंचा और सभी बातें महाराणा रतन सिंह द्वितीय को बताई। यह सुनकर महाराणा रतन सिंह द्वितीय सूर्यमल से बहुत नाराज हुए। यहीं से दोनों के बिच में दरार बढ़ती गई।

यह नाराजगी इतनी बढ़ गई कि महाराणा रतन सिंह द्वितीय के गद्दी पर बैठते समय टिके की रस्म में जो घोड़ा और हाथी रणथंभोर से रायमल की ओर से भेजा गया था उसे वापस लौटा दिया साथ यह संदेश भी भेजा कि महाराणा सांगा द्वारा रायमल को टिके के समय दिए गए “लाल लश्कर घोड़ा और मेघनाद नामक हाथी” को पुनः मेवाड़ भेजने का आग्रह किया।

रायमल ने महाराणा रतन सिंह द्वितीय के आदेश को खारिज कर दिया। जब यह जानकारी महाराणा रतन सिंह द्वितीय को हुई तो वह बहुत क्रोधित हुए। साथ ही रायमल को भी लगने लग गया था कि अब कभी भी कुछ भी बड़ी घटना हो सकती है।

रायमल को महाराणा रतन सिंह द्वितीय का डर सताने लगा। रायमल को एक बड़े सहारे की जरूरत थी जो मेवाड़ के शासक महाराणा रतन सिंह द्वितीय का सामना कर सके। इसी को ध्यान में रखते हुए रायमल ने अपनी बहन रानी हाड़ी (कर्मावती) से विचार विमर्श करने के पश्चात कर्मावती द्वारा हुमायूं को राखी भिजवाई और मदद का आश्वासन मांगा।

इसके बाद महाराणा रतन सिंह द्वितीय ने अपने भाई सूर्यमल को मेवाड़ में बुलाया। तभी सूर्यमल समझ गया कि महाराणा रतन सिंह उन्हें धोखे से वहां बुलाकर मारना चाहता है लेकिन सूर्यमल की माता ने कहा कि हमने महाराणा रतन सिंह द्वितीय का कोई बुरा नहीं किया है। हमेशा उनके परिवार के सदस्य बन कर रहे हैं, अतः सूर्यमल तुमको मेवाड़ जाना चाहिए।

महाराणा रतन सिंह द्वितीय और सूर्यमल के बीच लड़ाई

यह उन दिनों की बात है जब महाराणा रतन सिंह बूंदी में थे दूसरी तरफ अपनी माता की आज्ञा का पालन करते हुए सूर्यमल रणथंबोर से मेवाड़ की तरफ आ रहा था। बूंदी के समीप दोनों की मुलाकात हुई। महाराणा रतन सिंह द्वितीय हाथी पर सवार थे जबकि उन का छोटा भाई सूर्यमल घोड़े पर था। मौका देखकर महाराणा रतन सिंह ने सूर्यमल पर वार कर दिया लेकिन वह बच गया।

महाराणा रतन सिंह द्वितीय ने स्वयं को सही साबित करने के लिए सूर्यमल को बताया कि यह उनकी गलती से नहीं बल्कि हाथी की गलती से हुआ है और उन्होंने सूर्यमल के सामने शपथ ली थी अब वह इस हाथी पर कभी भी सवारी नहीं करेंगे।

कुछ ही दिनों में सूर्यमल और महाराणा रतन सिंह द्वितीय के बीच में लड़ाई हुई सूर्यमल ने महाराणा रतन सिंह द्वितीय के साथी पूरणमल को कटार से मार गिराया महाराणा रतन सिंह द्वितीय पूरणमल को बचाने के लिए दौड़े लेकिन कटार का एक हिस्सा महाराणा रतन सिंह द्वितीय की छाती में घुस गया।

इस तरह महाराणा सांगा के बाद मेवाड़ के शासक बने महाराणा रतन सिंह द्वितीय की मृत्यु हो गई। जब यह खबर उनकी पत्नी महारानी पंवार के पास पहुंची तो वह भी सती हो गई।

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