मीराबाई का जीवन परिचय – Meerabai History In Hindi.

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भक्तिमती मीराबाई (Meerabai) भगवान कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त मानी जाती हैं ।

वह बचपन से ही बहुत नटखट और चंचल स्वभाव की थी। उनके पिता की तरह वह बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लग गई। राज परिवार में जन्म लेने वाली Meerabai का विवाह मेवाड़ राजवंश में हुआ। विवाह के कुछ समय पश्चात ही इनके पति का देहांत हो गया ।

पति की मृत्यु के साथ मीराबाई को सती प्रथा के अनुसार अपने पति के साथ आग में जलकर स्वयं को नष्ट करने की सलाह दी गई, लेकिन मीराबाई सती प्रथा (पति की मृत्यु होने पर स्वयं को पति के दाह संस्कार के समय आग के हवाले कर देना) के विरुद्ध थी।

वह पूर्णतया कृष्ण भक्ति में लीन हो गई और साधु संतों के साथ रहने लगी। ससुराल वाले उसे विष  देकर मारना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया अंततः Meerabai भगवान कृष्ण की मूर्ति में समा गई।

मीराबाई का इतिहास Meerabai History-

  • पूरा नाम meerabai full name – मीराबाई राठौड़।
  • मीराबाई जन्म तिथि meerabai date of birth – 1498 ईस्वी।
  • मीराबाई का जन्म स्थान meerabai birth place -कुड़की (जोधपुर ).
  • मीराबाई के पिता का नाम meerabai fathers name – रतन सिंह राठौड़।
  • मीराबाई की माता का नाम meerabai mothers name – वीर कुमारी।
  • मीराबाई के दादा का नाम meerabai grandfathers name – राव दूदा।
  • मीराबाई के पति का नाम meerabai husband name – मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ हुआ था।
  • मीराबाई की शादी कब हुई– 1516 ईस्वी में।
  • मीराबाई के ससुर का नाम – महाराणा सांगा।
  • मीराबाई की सास का नाम – रानी कर्णावती।
  • मीराबाई के देवर का नाम meerabai devar ka naam – विक्रमजीत सिंह।
  • मीराबाई की मृत्यु तिथि meerabai died – 1547 ईस्वी।
  • मीराबाई का मृत्यु स्थान meerabai death palce – द्वारका।
  • मृत्यु के समय आयु -49 वर्ष।
  • मीराबाई जयंती – शरद पूर्णिमा (हिन्दू चंद्र कैलेंडर के अनुसार ).

मीराबाई का जन्म स्थान ( Meerabai Birth Place)-

Meerabai के जन्म स्थान को लेकर लोगों में दो तरह की राय है ।

कुछ लोगों का मानना है कि मीराबाई का जन्म कुड़की नामक गांव में हुआ, यह गांव राजस्थान के जोधपुर जिले में है।

यह गांव मीराबाई का ननिहाल है। यह सत्य है कि मीरा का ननिहाल कुड़की गांव ही है ,लेकिन मीरा का जन्म मेड़ता में हुआ था। मीराबाई का जन्म सन 1498 ई.  में हुआ था। आज भी मेड़ता में मीराबाई के दर्शन की झलक देखने को मिलती है।

मीराबाई के माता-पिता (Meerabai Parents)-

मीराबाई की माता का नाम ‘वीर कुमारी’ तथा पिता का नाम रतन सिंह था ।

Meerabai के पिता रतन सिंह एक छोटी राजपूत रियासत के शासक थे। मीराबाई उनकी इकलौती संतान थी। मीराबाई के दादा का नाम ‘दुदा’ था।

मीराबाई का बाल्यकाल (Meerabai Childhood)-

जब मीरा बाई मात्र 3-4 वर्ष की थी ,उनके माता और पिता दोनों का देहांत हो गया।

माता और पिता के देहांत के पश्चात वह अपने दादा ‘दूदा जी’ के साथ रहने लगी। ‘दुदा जी’ भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। ‘दुदाजी’ साधु संतों के साथ रहना भी बहुत पसंद करते थे। बहुत ही चंचल स्वभाव की होने की वजह से मीरा बाई जल्दी ही साधु-संतों में घुल मिल जाती थी।

वह बचपन से ही धार्मिक लोगों के संपर्क में पली बढ़ी थी। कहा जाता है कि बाल्यावस्था में मीरा बाई के गांव में एक बारात आई थी।

वह भी औरतों और बच्चों के साथ बारात देखने गई ,घोड़े पर बैठे दूल्हे को देखकर वह जोर-जोर से रोने लगी और बोली कि मेरा दूल्हा कहां है?

तभी वहां पर उसके दादा आते हैं और समीप के कृष्ण मंदिर में ले जाकर भगवान कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि ,तेरा दूल्हा यह है।

उस समय भगवान कृष्ण की मूर्ति को देखकर वह मन ही मन बहुत प्रसन्न होती हैं। रोज छोटे-छोटे बच्चों के साथ उस कृष्ण मंदिर में जाती है और बहुत समय तक अपने दूल्हे को प्रसन्न करने के लिए नाचती और गुनगुनाती रहती है।

इतनी चंचलता और कृष्ण के प्रति भक्ति देखकर साधु संतों ने कहा -कि इसे भगवान श्रीकृष्ण साक्षात दर्शन जरूर देंगे।

जैसे -जैसे बड़ी होती गई मीरा का प्यार कृष्ण के प्रति बढ़ता गया वह सोने से पहले कृष्ण के दर्शन जरूर करती थी और सुबह आंखें उनके सामने खोलती थी।

हर समय Meerabaiअपने  साथ भगवान कृष्ण की मूर्ति रखती थी। वह दिनभर उस मूर्ति से बातें किया करती थी, कृष्ण की मूर्ति से वह खुद ही सवाल करती और खुद ही मुस्कुरा कर जवाब देती थी।

मीराबाई का वैवाहिक जीवन ( Marriage Life Of Meerabai)-

मीराबाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के जेष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। मीराबाई ने शादी के बाद विदाई के समय अपने दादा ‘दूदा ‘ से रोते हुए भगवान कृष्ण को मांग लिया और इन्हें डोली में अपने साथ ससुराल ले आई।

जब वह  चित्तौड़गढ़ पहुंची तो भोजराज की माता ने Meerabai से दुर्गा पूजा करने को कहा ,लेकिन मीराबाई ने उनको साफ मना कर दिया कि वह भगवान कृष्ण के अलावा किसी के समक्ष सर नहीं झुका सकती है।

यह सुनकर Meerabai की सास महारानी कर्णावती गुस्से में आकर राणा के पास शिकायत लेकर पहुंची मगर बात नहीं बनी।

Meerabai अपने पति की सेवा करने के साथ-साथ दिनभर कृष्ण की भक्ति में लीन रहती थी। भगवान कृष्ण के प्रति मीराबाई  का प्यार पागलपन की तरह था।

मीराबाई की शादी को 9- 10 वर्ष ही हुए थे कि उनके पति भोजराज का देहांत हो गया।

भोजराज की मृत्यु के पश्चात Meerabai अकेली रहने लगी। साधु संतों के साथ उनका उठना-बैठना लगा रहता था। भोजराज के छोटे भाई विक्रमजीत को घर पर साधु संतों का आना जाना अच्छा नहीं लगता था। मीराबाई के देवर का नाम विक्रमजीत था।

मीराबाई के देवर विक्रमजीत ने Meerabai की निगरानी रखने के लिए चंपा बाई और चमेली बाई नामक स्त्रियों को भेजा।

Meerabai का भक्ति भाव और कृष्ण के प्रति आस्था देखकर चंपाबाई और चमेली बाई दोनों ही मीराबाई के संग भक्ति के रंग में रंग गई। यह सब देखकर मीराबाई के देवर विक्रमजीत बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए और अपनी बहन उदाबाई को मीरा को समझाने के लिए भेजा।

उदाबाई ने मीरा से आग्रह किया कि भाभी आप साधु संतों का साथ छोड़ दो और शान से राजमहल में रहो,और कहा कि राजघराने की बहू बेटियों को यह सब शोभा नहीं देता है।

लेकिन मीरा बाई पर इसका कुछ भी असर नहीं हुआ। मीराबाई के देवर विक्रमजीत सिंह ने धैर्य खो दिया और मीरा बाई को जान से मारने का उपाय करने लगा।

मीराबाई के देवर विक्रमजीत ने अपनी बहन उदाबाई को बुलाया और बहुत कड़वे विष का प्याला हाथ में थमा कर कहा इसे मीराबाई को पिला दो और कहना कि यह अमृत है।

मीरा बाई ने वैसा ही किया लेकिन अपनी भाभी पर दया आ गई।

उदाबाई ने मीरा से कहा यह विष का प्याला है और मेरे भाई विक्रमजीत ने आप को मारने के लिए इसे भेजा है यह सुनकर मीराबाई मन ही मन मुस्कुराई और भगवान श्री कृष्ण का प्रसाद समझकर विष का पूरा प्याला पी गई।

यह सब देखकर उदाबाई का सिर चकरा गया और वह बेहोश होकर गिर गई।

जब उसे होश आया तो उसने देखा कि मीरा बाई मंद मंद मुस्कान के साथ कृष्ण भजन कर रही हैं और विष का उस पर कोई असर नहीं हुआ है।

भगवान कि यह लीला देखकर उसने स्वयं को कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया।

जब मीरा बाई ने विष का प्याला पिया तो कहते हैं कि-

द्वारका में प्रभु श्री कृष्ण की मूर्ति के मुंह से झाग निकल आए थे। यह चमत्कार देखकर राजघराने के लोग मीराबाई को साक्षात भगवान समान मानने लगे।

यह सब देख कर मीराबाई के देवर विक्रमजीत सिंह के स्वाभिमान को ठेस पर ठेस लगती गई। इस घटना के पश्चात विक्रमजीत ने मीराबाई से माफी मांगने का नाटक करते हुए दासियों के साथ एक पिटारे में सांप और फूल भेजें मीराबाई ने प्रसन्न होकर उपहार को स्वीकार कर लिया।

जब मीरा बाई ने पिटारा खोला तो उसमें से शालिग्राम की मूर्ति और बहुत ही सुंदर सुंदर सुगंधित पुष्पों के हार निकले।

कुछ ही समय में Meera Bai को लगा कि अब यहां पर रहना है ठीक नहीं है। मीराबाई का मन विरक्त हो गया और वह चित्तौड़गढ़  छोड़कर वृंदावन भगवान श्री कृष्ण के शरण में चली गई। मीराबाई के जाते ही मेवाड़ राज्य में अकाल व सूखा जैसी भयानक विपत्तिया आने लगी।

मेवाड़ वासियों के साथ साथ वहां के साधु संतों ने भी मीरा बाई से आग्रह किया कि वह पुनः  लौट आये। मीराबाई ने यह कह कर बात टाल दी कि मेरा वृंदावन नगरी में आना भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा से हो पाया हैं, और मैं यह सौभाग्य खोना नहीं चाहती हूँ।

उस समय मीरा बाई ने भगवा रंग की साड़ी पहन रखी थी। कुछ समय पश्चात Meerabai की साड़ी से भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति ढकी हुई मिली और इस घटना के पश्चात मीराबाई कहां चली गई यह किसी को पता ना लगा।

कहा जाता है कि मीराबाई सन 1560 ईस्वी में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति में लीन हो गई।

मीराबाई के गुरु (Meerabai Guru)-

मीराबाई के गुरु का नाम रैदास जी महाराज था। मीराबाई के गुरु रैदास जी कवी, संत ,सामाजिक सुधारक और आध्यात्मिक गुरु थे।

21वी सदी में इनको “रविदासिया” धर्म के संस्थापक माना जाता है।

“रैदास संत मिले मोहि सतगुरु, दीन्ही सुरत  सहदानी।।

गुरु मिलिया रैदास जी,दीनी ज्ञान की गुटकी”।।

मीरा ने गोविंद मिलिया जी,गुरु मिलिया रैदास।।

संत श्री तुलसीदास जी से मीराबाई का पत्र व्यवहार था, इनकी भक्ति की प्रशंसा सुनकर अकबर भी तानसेन के साथ मीराबाई के दर्शन करने आया था।

मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ –

मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की थी-

अगर कृष्णभक्त मीराबाई कि प्रमुख रचनाएँ की बात की जाए तो उनमें मुख्यतया –

(1) नरसी जी का मायरा।

(2) राम गोविंद ।

(3) राग सोरठ ।

(4) गीत गोविंद।

मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ के अलावा मीरा बाई द्वारा रचित गीतों का संकलन “मीराबाई की पदावली” नामक ग्रंथ में किया गया है यह एकमात्र प्रमाणभूत काव्य कृति है।

“पायो जी मैंने रामरतन धन पायो” यह मीराबाई की प्रसिद्ध रचना है ।

मीराबाई की भाषा शैली राजस्थानी ,ब्रिज और गुजराती का मिश्रण है।

मीरबाई की समाधी –

मीराबाई 1516 ईस्वी में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में लीन हो गई। यही पर मीरबाई की समाधी बनी हुई हैं।

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