Murarbaji Deshpande मुरारबाजी देशपांडे का इतिहास।

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Murarbaji Deshpande 17 वीं शताब्दी के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन के समय मराठा साम्राज्य के पुरंदर किले के सरदार थे। मुरारबाजी दिलेरखान युद्ध प्रसंग को इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

मुरारबाजी देशपांडे का इतिहास Murarbaji Deshpande history-

जैसा कि आप सब जानते हैं मराठा साम्राज्य पूरे भारत में फैला हुआ था फिर भी इतिहास में मराठा साम्राज्य के बारे में कम ही पढ़ाया जाता है।
ऐसा क्यों हुआ या इसके पीछे क्या कारण है इसकी सटीक वजह का पता कर पाना तो मुश्किल है लेकिन हां इतना कहा जा सकता है कि स्वतंत्र भारत में जिस तरह की शिक्षा का प्रचार प्रसार किया गया उसमें मराठा साम्राज्य को अनदेखा किया गया।

और यही वजह रही है कि मुरारबाजी देशपांडे (Murarbaji Deshpande) जैसे वीर पुरुषों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया। मुरारबाजी देशपांडे की जन्म दिनांक का कोई सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इनका जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। इनके पैतृक गांव का नाम किंजलोली (महाड तालुका) हैं।

Murarbaji Deshpande अपने जीवन  के प्रारंभिक दौर में जावली के चंद्रराव मौर्या के लिए काम करते थे। मराठा साम्राज्य के समीप स्थित जावली को छत्रपति शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य में मिलाना चाहते थे। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने जावली पर आक्रमण कर दिया, इस युद्ध में चंद्रराव मौर्या  के साथ मुख्य योद्धा के रूप में मुरारबाजी देशपांडे ने अपना पराक्रम दिखाया।

इसी पराक्रम से प्रभावित होकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुरारबाजी देशपांडे (Murarbaji Deshpande) को अपने साथ काम करने और स्वराज्य की रक्षा करने का न्योता दिया, जिसे मुरारबाजी देशपांडे ने स्वीकार कर लिया।

मुरारबाजी देशपांडे के छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ सम्मिलित होने से छत्रपति शिवाजी महाराज के हाथ और अधिक मजबूत हो गए।

मुरारबाजी दिलेरखान युद्ध प्रसंग क्या हैं? (Murarbaji Deshpande vs dilerkhan , Purandar Fort War)

छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुरंदर के किले की रक्षा करने का जिम्मा मुरारबाजी देशपांडे को सौंपा था क्योंकि यह उनके सबसे विश्वसनीय और पराक्रमी सैनिक थे।

पुरंदर किला मराठा साम्राज्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण किला था इसके लिए को छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1646 में जीता था। इस किले की जीत के साथ ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य को संपूर्ण देश में फैलाने का सपना देखा। यह किला पश्चिमी घाट में स्थित है, जो समुद्र से लगभग 4472 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

पुरंदर किला दो भागों में विभाजित है प्रथम भाग का नाम माची जबकि दूसरे भाग का नाम बाले किला है। पुरंदर किले के प्रवेश द्वार के ऊपर जाते ही माची हैै, जबकि किले के ऊपर पहाड़ पर चढ़कर पुरंदर के “बाले किले” का दरवाजा आता है, जहां पर जाने के लिए एकमात्र रास्ता है।

पुरंदर किले के सामने वज्रगढ़ का है, अगर कोई दुश्मन पुरंदर किले पर आक्रमण करना चाहे तो सबसे पहले उसे वज्रगढ़ का सामना करना पड़ेगा।
जिस काम को हम शिद्दत के साथ करते हैं वही काम हमें विश्व में पहचान दिलाता है। शिद्दत के साथ किए गए काम को ही इतिहास में हमेशा याद किया जाता है और पुरंदर किले की रक्षार्थ कुछ ऐसा ही किया था मुरारबाजी देशपांडे (Murarbaji Deshpande) ने।

16 मई 1665 का दिन था, आषाढ़ माह चल रहा था पूरा आसमान बादलों से घिरा हुआ था। एक ऐसा दिन जो इतिहास लिखने वाला था और ऐसा इतिहास जो युगों-युगों तक इतिहास के पन्नों से नहीं मिटाया जा सकता।

इस दिन एक ऐसा युद्ध हुआ जिसने मुरारबाजी देशपांडे के प्राण ले लिए लेकिन इतिहास में सदा के लिए उन्हें अमर कर दिया।
मिर्जा राजे जयसिंह मराठा स्वराज्य पर आक्रमण करने के लिए आया। पुरंदर किले पर आक्रमण के लिए जयसिंह ने दिलेरखान को मुख्य सेनापति बना कर 30000 सैनिकों की विशाल फौज के साथ युद्ध के लिए भेजा।

जिस “मुरारबाजी दिलेरखान युद्ध प्रसंग” ( Purandar Fort War ) का जिक्र इतिहास में किया जाता है वह यही युद्ध था। बादलों की गड़गड़ाहट के साथ दिलेरखान ने पुरंदर किले को चारों तरफ से घेर लिया लेकिन उस किले के अंदर कैसे प्रवेश किया जाए? यह उसे समझ में नहीं आया।

पुरंदर किले की मजबूती देखकर दिलेरखान आश्चर्यचकित रह गया और उसने पता किया कि अगर पुरंदर किले को जीतना है तो सबसे पहले वज्रगढ़ को जीतना होगा। वज्रगढ़ की सुरक्षा में लगाए गए सैनिकों को मावल के नाम से जाना जाता था उस किले पर मात्र 300 मावल मौजूद थे।

Murarbaji Deshpande के पास महज 700 सैनिकों की एक टुकड़ी थी, जो पुरंदर किले की सुरक्षा में तैनात थी। वैसे तो मुरारबाजी देशपांडे ने मराठा साम्राज्य के लिए कई लड़ाइयां लड़ी और छत्रपति शिवाजी महाराज का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया लेकिन इतिहास में “मुरारबाजी दिलेरखान युद्ध प्रसंग” (Purandar Fort War) का बहुत अधिक जिक्र किया जाता है।

औरंगजेब द्वारा भेजे गए मिर्जा राजे जयसिंह दिलेरखान के साथ मोर्चा संभाल रहे थे। पुरंदर किले की सुरक्षा में तैनात किलेदार मुरारबाजी देशपांडे को पता था कि यदि मुगल सैनिकों द्वारा इस किले के एक भी माची या बुरुज को ढहा दिया गया तो फिर इस किले की रक्षा कर पाना कठिन हो जाएगा।

वज्रगढ पर जाकर मुगल तोपों की सहायता से पुरंदर किले पर हमला करना चाहते थे। सभी मराठे सैनिक इकट्ठे हुए और वज्रगड़ जाकर मुगलों को मौत के घाट उतार दिया और तोपों को निष्क्रिय करके पुनः पुरंदर लौट आए।

जब मुगलों की तोपों को निष्क्रिय करके मराठी सैनिक वापस पुरंदर किले की तरफ लौट रहे थे, तब सो रहे मुगल सैनिक जाग गए और 4 मराठी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।
Murarbaji Deshpande लगातार अपनी सेना की कमान संभाले हुए थे लेकिन संख्या में अधिक होने की वजह से मुगल सेना भारी पड़ रही थी।

मुगलों ने लगभग पुरंदर किले को जीतने की तैयारी कर ही ली थी। मुगल सैनिक पुरंदर किले को जीतने से महज एक कदम दूर थे उन्हें केवल बालेकिल्ला हासिल करना था। मराठी सैनिक ज्यादा समय तक लड़ने के लिए इस वजह से भी सहज नहीं थे कि उनका राशन पानी और गोले बारूद धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर थे।

दिलेरखान ने सभी मुगल सैनिकों को अंतिम और निर्णायक हमला करने का आदेश दिया, इस सैनिक टुकड़ी में लगभग 5000 सैनिक शामिल थे।बाले किले की ओर से किलेदार मुरारबाजी देशपांडे ने भी अंतिम और निर्णायक युद्ध की तैयारी पूरी कर ली।

5000 मुगल सैनिकों का सामना करना मराठों के लिए आसान नहीं था लेकिन मौत का कफन सर पर बांध कर मराठी सेना तन मन धन से युद्ध मैदान में पहुंच गई। दिलेरखान के आदेशानुसार मुगल सैनिक अचानक हमला करके मराठों को मौत के घाट उतारने की फिराक में थे, दूसरी तरफ मराठी सैनिक भी पूरे होशो हवास में थे।

मुरारबाजी ने एक लक्ष्य बना रखा था कि कैसे भी करके दिलेरखान को मौत के घाट उतारा जाए। मुरारबाजी (Murarbaji Deshpande) लड़ाई करते हुए दिलेरखान की तरफ बढ़ रहे थे जिन जिन मुगल सैनिकों ने मुरारबाजी का रास्ता रोकने की कोशिश की वह मौत के घाट उतार दिए गए। मुरारबाजी देशपांडे का शौर्य और पराक्रम देखकर दिलेरखान दांतो तले उंगली दबाने लगा।

मुरार बाजी देशपांडे की मृत्यु कैसे हुई? मुरारबाजी देशपांडे समाधि।( Murarbaji Deshpande samadhi )-

पुरंदर किले पर लड़े गए युद्ध में दोनों तरफ से वार-प्रतिवार हो रहे थे। इसी बीच दिलेरखान ने एक तीर छोड़ा जो सीधा मुरारबाजी देशपांडे (Murarbaji Deshpande) की गर्दन के पार हो गया। ऐसा लगा जैसे समय रुक गया हो, आसमान में बिजलियां कड़कने लगी और इसी बीच महान देशभक्त वीर और शौर्य साली मुरारबाजी देशपांडे वीरगति को प्राप्त हो गए.

इस युद्ध में लगभग 300 वीर और पराक्रमी मराठी सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुए। मराठों से ज्यादा नुकसान इस युद्ध में मुगलों को हुआ उनके 500 से अधिक सैनिक मारे गए। Murarbaji Deshpande के शव को लेकर मराठी सैनिक पुरंदर किले की तरफ भाग गए।

मुरारबाजी देशपांडे (Murarbaji Deshpande) की मृत्यु के पश्चात दिलेरखान ने बड़े ही आश्चर्य के साथ कहा था की “है भगवान आपने ऐसा शोर्य साली और पराक्रमी सैनिक कैसे पैदा किया”। मुरारबाजी देशपांडे की मृत्यु के बाद भी लगभग 2 महीने तक यह युद्ध चलता रहा लेकिन मुगल जीत नहीं सके।

दिलेरखान अपनी सेना में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए सैनिकों के सामने शपथ ली कि “जब तक आप इस किले पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते मैं अपने सर पर रखी इस पगड़ी को धारण नहीं करूंगा”। मुरारबाजी दिलेरखान युद्ध प्रसंग यहीं पर खत्म हुआ. छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेशानुसार पुरंदर की लड़ाई को समाप्त करना पड़ा। इस युद्ध की समाप्ति मिर्जा राजे जयसिंह और छत्रपति शिवाजी के बीच हुई एक संधि के तहत हुई थी। मिर्जा राजे जयसिंह ने भी दिलेरखान को आदेश दिया कि इस युद्ध को यहीं पर रोक दिया जाए।

Murarbaji Deshpande samadhi पिंपल दोह नामक गाँव में सोमेश्वर मंदिर के सामने स्थित हैं। प्रतिवर्ष 16 को मुरारबाजी देशपांडे की पुण्यतिथि मनाई जाती है।

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