Narayan Rao Peshwa, नारायणराव पेशवा का इतिहास।

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Narayan Rao Peshwa बालाजी बाजीराव अर्थात नाना साहेब के तीसरे पुत्र थे।

बालाजी बाजीराव के पहले पुत्र विश्वास राय की मृत्यु पानीपत के तीसरे युद्ध में हो गई थी जबकि दूसरे पुत्र माधवराव पेशवा बने।

माधव राव की मृत्यु के पश्चात पेशवा पद इन के सबसे छोटे पुत्र नारायण राव के पास आया। नारायण राव मराठा साम्राज्य के दसवें पेशवा बने।

Narayan rao peshwa history in hindi/नारायण राव पेशवा का जीवन परिचय –

जन्म, Narayan Rao Peshwa date of birth- 10 अगस्त 1755.

मृत्यु, narayanrao Peshwa died- 30 अगस्त 1773.

मृत्यु स्थान Narayan Rao Peshwa died place- शनिवार वाड़ा।

पत्नी का नाम narayanrao Peshwa wife name- गंगा बाई।

पुत्र और बच्चे narayanrao Peshwa son name- सवाई माधवराव।

भाई brothers- विश्वास राय और माधवराव पेशवा

माता का नाम Narayan Rao Peshwa mother’s name- गोपीकाबाई।

पिता का नाम Narayan Rao Peshwa father’s name- बालाजी बाजीराव

पेशवा के रूप में कार्यकाल- 13 दिसंबर 1772 से 30 अगस्त 1773 तक।

इनके समय मराठा साम्राज्य के छत्रपति- राजाराम द्वितीय।

इनसे पहले पेशवा- माधवराव पेशवा।

उनके बाद पेशवा- रघुनाथ राव।

धर्म religion- हिंदू सनातन।

रिश्तेदार Narayan Rao Peshwa relatives- विश्वास राव (बड़ा भाई), माधवराव (बड़ा भाई), सदाशिव राव भाऊ (काका, चाचा), रघुनाथ राव (चाचा),शमशेर बहादुर प्रथम (चाचा),पेशवा बाजीराव (दादाजी), काशीबाई (दादी जी)।

Early life of Narayan Rao Peshwa, प्रारंभिक जीवन-

तीन भाइयों में सबसे छोटे नारायण राव बहुत ही सरल स्वभाव के थे। इनका बचपन इनकी माता गोपीकाबाई की देखरेख में बीता।

पिता बालाजी बाजीराव राजकार्य में ज्यादातर समय व्यस्त रहते थे। जब इनकी उम्र मात्र 6 वर्ष थी, तब इनके सबसे बड़े भाई विश्वास राव की मृत्यु पानीपत के तीसरे युद्ध में, सन 1761 में हो गई।

नारायणराव पेशवा बहुत जल्दी हर किसी पर विश्वास कर लेते थे। यही वजह थी कि जब इनको मारने की साजिश इनके चाचा रघुनाथ राव द्वारा की जा रही थी, तब ये सहायता के लिए भी उन्हीं के पास पहुंचे थे।

मराठा साम्राज्य के सभी पेशवाओं में इनका कार्यकाल सबसे कम था।

नारायण राव कब और कैसे पेशवा बने-

Narayan Rao Peshwa के पिता बालाजी बाजीराव की मृत्यु के पश्चात उनका पुत्र माधवराव प्रथम पेशवा बने।माधवराव पेशवा आखिरी समय में तपेदिक अर्थात क्षय रोग से ग्रसित थे जिनकी वजह से 1771 में उनकी मृत्यु हो गई।

नियमानुसार बड़े भाई माधव राव की मृत्यु के पश्चात 13 दिसंबर 1772 के दिन नारायण राव को पेशवा बनाया गया।इस समय मराठा साम्राज्य के छत्रपति “राजाराम द्वितीय” थे।

मराठा साम्राज्य की स्थिति-

Narayan Rao Peshwa के पेशवा बनने के समय मराठा साम्राज्य बहुत मजबूत स्थिति में था।

पानीपत के तीसरे युद्ध में मिली हार के बाद मराठों ने संघर्ष जारी रखा और बालाजी बाजीराव और माधव राव के नेतृत्व में पुनः मराठा साम्राज्य ने संपूर्ण भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।

नाना फडणवीस और महादजी शिंदे नए मराठा साम्राज्य पर अपना प्रभुत्व कायम कर रखा था।नारायण राव ने उनके चाचा रघुनाथ राव (जो कि जेल में बंद थे) को मुक्त कर दिया।

Narayan Rao Peshwa यह मानते थे कि पेशवा पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार वह खुद हैं लेकिन उन्हें यह भी पता था कि नारायण राव के जिंदा रहते उन्हें कभी भी पेशवा पद नहीं मिल सकता है।

यह भी पढ़ें – Raghunath Rao Peshwa, रघुनाथ राव पेशवा का इतिहास हिंदी में।

रघुनाथ राव कि साजिश और नारायण राव की हत्या-

Narayan Rao Peshwa जगह-जगह नारायण राव को नीचा दिखाने की कोशिश करने लगे और यह साबित करने में लग गए कि उन्हें पेशवा पद सौंपा जाए।

जब उन्हें लगा कि यह संभव नहीं है तो उन्होंने नारायण राव के साथ गलत बर्ताव करना शुरू कर दिया। नारायणराव पेशवा अपने चाचा रघुनाथ राव से परेशान हो गए।

Narayan Rao Peshwa ने रघुनाथराव को सहायक के पद से मुक्त कर दिया।इस बात से रघुनाथराव बहुत आहत हुए और उन्होंने ठान लिया कि कैसे भी करके नारायण राव को मौत के घाट उतारा जाना चाहिए।
“सुमेर सिंह गर्दी”(Sumer Singh gardi) नामक गार्ड जोकि भीलों के एक शिकारी काबिले का मुखिया था, रघुनाथ राव ने एक पत्र लिखा और उसमें लिखा कि “नारायन राव ला धारा” इसका अर्थ होता है नारायण राव को बंदी बना लो.

यह पत्र सुमेर सिंह गर्दी तक पहुंचने से पहले नारायण राव कीपत्नी आनंदीबाई के हाथ लग गया। आनंदी भाई ने इस पत्र में थोड़ा सा बदलाव कर दिया और लिखा कि “नारायणराव ला मारा” इसका अर्थ था कि नारायणराव को खत्म कर दो।

 सुमेर सिंह गर्दी के साथ मिलकर रघुनाथ राव ने नारायण राव पेशवा को मारने के लिए जो साजिश रची गई उसको अंजाम देने का दिन 30 अगस्त 1773 अर्थात गणेश चतुर्थी का दिन था।

Narayan Rao Peshwa भगवान श्री गणेश की पूजा करने के बाद पुनः अपने महल की तरफ लौट रहे थे। तभी अचानक रघुनाथ राव के साथियों अर्थात गर्दियों के एक समूह ने जो की घात लगाकर बैठे थे, उन पर जानलेवा हमला कर दिया। हालांकि नारायण राव के साथ उनके कई गार्ड्स भी थे लेकिन उन्हें भी मार दिया गया।

खुद पर हमला होते देख कर नारायणराव चाचा रघुनाथ राव के कमरे की तरफ दौड़े और उनसे सहायता मांगी लेकिन रघुनाथराव ने उनकी कोई मदद नहीं की।इस साजिश में रघुनाथ राव के साथ उनकी पत्नी आनंदीबाई भी शामिल थी।

नारायण राव की मृत्यु के पश्चात उनके मृत शरीर को रघुनाथराव और आनंदी बाई ने मिलकर नदी में फ़ेंक दिया। रघुनाथ राव अर्थात राघोबा पेशवा बन गया। लेकिन रघुनाथराव की किस्मत में भी पेशवा पद ज्यादा समय के लिए नहीं था।


इस समय मराठा साम्राज्य और मराठी सेना पर महादजी सिंधिया और नाना फडणवीस का प्रभाव अधिक होने की वजह से उन्होंने मिलकर निर्णय लिया कि Narayan Rao Peshwa के एकमात्र पुत्र माधवराव द्वितीय को पेशवा पद पर आसीन किया जाए और ऐसा ही हुआ उन्होंने मिलकर रघुनाथराव को पेशवा पद से हटा दिया।


रघुनाथ राव फिर भी बाज नहीं आया और अंग्रेजों से जाकर मिल गया। इसी वजह से मराठों और अंग्रेजों के बीच में भी युद्ध हुआ जिसे मराठों ने जीता।

इस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भी माधवराव द्वितीय को मराठा साम्राज्य का पेशवा मान लिया।

नारायणराव पेशवा की आत्मा-

कहते हैं कि शनिवारवाडा के जिस महल में नारायणराव पेशवा की हत्या की गई वहां पर आज भी उनकी आवाज “काका माला वचाव”  सुनाई देती है।

Narayan Rao Peshwa के पुत्र बाजीराव द्वितीय ने भी यह आवाज सुनी थी और उसने माना कि इस महल में भूत निवास करता है।इसी दोष को दूर करने के लिए बाजीराव द्वितीय ने आमों के कई वृक्षों को ब्राह्मणों को दान किया।

अंततः बाजीराव द्वितीय ने ठीक ढंग से पूजा-पाठ और कर्मकांड करवा कर उस आत्मा को वहां से मुक्त करवा दिया था।

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