पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय।

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पृथ्वीराज चौहान का इतिहास (Prithviraj Chauhan) और सच्चाई जानकर आपको गर्व होगा बिना आँखों के इन्होंने मोहम्मद गौरी को मौत के घाट उतार दिया। अल्पायु में माता-पिता की मृत्यु से लेकर दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने तक का सफर किया। भगवान श्री राम के पिता राजा दशरथ के पश्चात् पृथ्वीराज चौहान ऐसे राजा हुए जो शब्दभेदी बाण की कला जानते थे। महज 12 वर्ष की आयु में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले पृथ्वीराज चौहान के जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले जिनमें मोहम्मद गौरी के साथ युद्ध ,राजा जयचंद के साथ दुश्मनी और संयोगिता के साथ प्रेम कहानी शामिल हैं।

अंततः अपने बचपन के दोस्त और राजकवि चंदबरदाई की सहायता और शब्दभेदी बाण के विशेष कौशल के दम पर इन्होंने मोहम्मद गौरी को मौत के घाट उतार दिया।

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास Prithviraj Chauhan History In Hindi

  • पूरा नाम- पृथ्वीराज चौहान तृतीय।
  • अन्य नाम- हिन्दू सम्राट,राय पिथौरा, सपादलक्षेश्वर, भारतेश्वरऔर पृथ्वीराज तृतीय के नाम से भी जाना जाता हैं।
  • जन्म तिथि- 1166 ईस्वी।
  • जन्म स्थान- पाटण (गुजरात ).
  • मृत्यु तिथि- 1192 ईस्वी।
  • मृत्यु स्थान– गजनी।
  • पिता का नाम- सोमेश्वर चौहान।
  • माता का नाम- कमला देवी (कर्पूरदेवी).
  • पत्नी का नाम- जंभावती पड़िहारी, पँवारी इच्छनी ,दाहिया ,जालंधरी ,गुजरी ,बड़गूजरी ,यादवी पद्मावती ,यादवी शशिव्रता ,कछवाही ,पुदिरानी ,शशिवृता, इंद्रावती और संयोगिता।
  • पुत्र और पुत्रियाँ- पुत्री का नाम बेला और गोविन्द चौहान, झोड़ा ,लेखा, शेखा, भिरड़ा और तैखा आदि पुत्र थे।
  • पृथ्वीराज जयंती- जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादश के दिन।
  • भाई का नाम- हरिराज।
  • बहिन का नाम- पृथा।
  • राज्याभिषेक- 1178 ईस्वी में।
  • पृथ्वीराज चौहान के घोड़े का नाम- पृथ्वीराज चौहान के घोड़े का नाम नत्यारम्भा था।
  • शासनकाल- 1178 ईस्वी से लेकर 1192 ईस्वी तक।
  • मुख्य युद्ध- तराइन युद्ध।
  • वंश- चौहान वंश।
  • राजधानी- अजमेर और दिल्ली।

एक बालक जिसकी चमक बचपन में ही दिखने लगी ,तेज़ तर्रार और ओजस्वी भाषा, शेर की तरह चाल, चीते के समान लपक और चील के समान आँखें ये सब गुण एक साधारण बालक में नहीं हो सकते हैं।

बचपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया। मात्र 12 वर्ष की आयु में इन्हें अजयमेरु और दिल्ली की सत्ता पर बैठने का सौभाग्य मिला। युद्धकला इन्होंने अल्पायु में ही सीखना प्रारंभ कर दिया, शब्दभेदी बाण इनकी मुख्य विद्या थी।

सन 1149 में इस धरती को पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) के रूप में एक वीर पुत्र की प्राप्ति हुई। इनके माता पिता की शादी के 12 वर्षों के पश्चात् इनका जन्म हुआ, यह खबर राज्य में कई लोगों को बहुत बुरी लगी। पृथ्वीराज चौहान की कहानी की असली शुरुआत यहीं से हुई। इनको मारने के लिए षड़यंत्र शुरू हो गए लेकिन किस्मत के धनी पृथ्वीराज चौहान को महज़ 12 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठने का सौभाग्य मिला लेकिन इस समय कामकाज इनकी माता की देखरेख में होता था।

पृथ्वीराज चौहान राजा कैसे बनें ?

इन्हें पृथ्वीराज चौहान तृतीय (Prithviraj Chauhan) या राय पिथौरा के नाम से जाना जाता हैं। भाई के समान बचपन में इनका दोस्त था जिसका नाम चंदबरदाई था  जो कि तोमर वंश से सम्बन्ध रखने वाली अनंगपाल की पुत्री का पुत्र था।

अंगपाल की इकलौती पुत्री कपुरीदेवी जो की अजमेर की महारानी थी, इनके पिता के सामने उत्तराधिकारी को लेकर दुविधा थी। अब पुत्री के हाथ में शासन सौंपा जाना भी गलत था तो इन्होंने अपने दोहिते को राज्य सौंपने का मन बनाया और नन्हें से राजकुमार पृथ्वीराज चौहान को राजगद्दी पर बिठाया।

यह 1166 ईस्वी की बात हैं जब अंगपाल की मृत्यु हो गई, मृत्यु के पश्चात राजभार पृथ्वीराज चौहान के कन्धों पर आ गया, महज 11 वर्ष की आयु में दिल्ली को एक शक्तिशाली शासक मिल गया।

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी की लड़ाई

प्रारंभ में पृथ्वीराज चौहान ने पड़ौसी हिन्दू राज्य जीते और अपना दबदबा कायम किया। सबसे पहले इन्होंने चंदेल राजा परमर्दिदेव को हराया। शुरूशुरू में मोहम्मद गौरी छुटपुट के आक्रमण करता था, जिन्हें पृथ्वीराज चौहान आसानी के साथ रोक लेते। मोहम्मद गौरी इनकी ताकत को भली-भाँति जनता था।

पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को लगातार 16 युद्धों में पराजित किया था, लेकिन हर बार उसे माफ़ कर दिया। अब दोनों के बिच में कट्टर दुश्मनी हो गई। इन दोनों के बिच में तराईन के मैदान में 2 मुख्य युद्ध हुए। तराईन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने जीत हासिल की जबकि तराईन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गौरी को राजा जयचंद मिला। आइये विस्तार से जानते हैं पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बिच लड़ी गई लड़ाइयों के बारें में –

तराइन का प्रथम युद्ध (1190-1191)

अपने साम्राज्य विस्तार और महत्वकांक्षा को पूरी करने के लिए मोहम्मद गौरी 1175 ईस्वी में भारत आया।

1186 ईस्वी में गजनवी वंश के अंतिम शासक को पराजित कर मोहम्मद गोरी ने लाहौर पर कब्जा कर लिया। धीरे-धीरे वह हिंदू बाहुल्य क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व जमाने की तैयारी करने लगा। इस समय राजा जयचंद और आसपास के सभी राजपूत राजा एक थे। और यही वजह थी कि कोई भी दुश्मन एकाएक इन पर आक्रमण करने के बारे में सोचता भी नहीं था।

एक कुशल शासक के रूप में पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) हमेशा सुव्यवस्था और साम्राज्य विस्तार को लेकर सतर्क रहते थे। वह अपने साम्राज्य को पंजाब तक विस्तारित करना चाहते थे। यह वह समय था जब मोहम्मद गोरी ने पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में ले लिया। 1190 ईस्वी तक मोहम्मद गोरी ने पंजाब पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया, जिसकी राजधानी भटिंडा थी।

अगर पंजाब पर अधिकार जमाना है तो इसके लिए मोहम्मद गौरी को युद्ध में पराजित करना ही होगा, यह बात दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान बहुत अच्छी तरह से जानते थे। इस विचार के साथ ही पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) मोहम्मद गौरी से लोहा लेने के लिए पंजाब की तरफ एक विशाल सेना के साथ निकल पड़े। पृथ्वीराज चौहान ने 3 किले जीत लिए जिनमें हांसी, सरस्वती और सरहिंद शामिल थे।

अपने गुप्त चारों के माध्यम से पृथ्वीराज चौहान को एक सूचना मिलेगी अनहिलवाडा में कुछ विद्रोहियों ने विद्रोह कर दिया, जिसे दबाने के लिए पृथ्वीराज चौहान चल पड़े। वहीं दूसरी तरफ जब मोहम्मद गोरी को इस विद्रोह के बारे में पता चला और उसे सूचना मिली कि पृथ्वीराज चौहान विद्रोह को दबाने के लिए गए हैं, तो उन्होंने पुनः आक्रमण करके सरहिंद किले को जीत लिया।

पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) की विशाल सेना के सामने यह विद्रोह कुछ भी नहीं था। अनहिलवाडा के विद्रोह को कुचल दिया गया। जब पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी की करतूत के बारे में पता लगा तो उन्होंने संकल्प लिया कि अब वह मोहम्मद गौरी को पराजित करके ही दम लेंगे। अपनी सेना में जोश, जुनून और जज्बा विकसित कर पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गौरी की तरफ बढ़ने लगे। सरहिंद किले के समीप एक बहुत बड़ा मैदान था, जिसका नाम तराइन था।

सन 1191 ईस्वी की बात है पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) और मोहम्मद गौरी के बीच तराइन के मैदान में एक बहुत भयंकर युद्ध हुआ। एक ऐसा युद्ध जिसने मोहम्मद गौरी को हकीकत से अवगत करवाया। तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की राजपूती सेना ने मोहम्मद गौरी की सेना को खदेड़ दिया।

मोहम्मद गौरी की सेना के वही सैनिक इस युद्ध में जिंदा रह सके जो युद्ध मैदान छोड़कर भाग गए। ऐसा कहा जाता है की गौरी की सेना को गाजर मूली की तरह काट दिया गया। मोहम्मद गौरी बुरी तरह घायल हो गया। वह इस अवस्था में नहीं था कि घोड़े पर बैठकर युद्ध मैदान से दूर जा सके। तभी एक सैनिक ने उन्हें घोड़े पर बिठाया और युद्ध मैदान से बाहर लाकर उसकी जान बचाई।

जिस सेना का बादशाह घायल हो जाए उस सेना में खलबली मचना बहुत ही आम बात है और मोहम्मद गौरी की सेना के साथ भी यही हुआ। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे जान बचाई जाए। पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) का हौसला देखिए उन्होंने 80 मील तक तुर्की सेना का पीछा किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान के खौफ की वजह से वह पीछे मुड़कर देखे तक नहीं और लगातार भागते रहे।

इस तरह तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया। इस युद्ध में विजय के पश्चात पृथ्वीराज चौहान को लगभग 7 करोड रुपए की धन संपदा प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने अपने बहादुर राजपूत सैनिकों में बांट दिया। धन संपदा के साथ साथ पृथ्वीराज चौहान की ख्याति संपूर्ण भारत में फैल गई।

तराइन का दूसरा युद्ध 1192

तराइन के दूसरे युद्ध को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध में मोहम्मद गोरी की जीत हुई जबकि पृथ्वीराज रासो के अनुसार मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) को बंदी बनाकर गजनी ले गया जहां पर पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को मार दिया।

तराइन का दूसरा युद्ध जो कि 1192 ईस्वी में लड़ा गया था। इस युद्ध के पीछे मुख्य कारण पृथ्वीराज चौहान से बदला लेना था। इसके लिए मोहम्मद गोरी ने अपनी सेना का पुनर्गठन किया और पूरी तैयारी के साथ युद्ध मैदान में आया।

दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान के साथ गद्दारी हुई। राजा जयचंद जो कि अब तक पृथ्वीराज चौहान के साथ थे, उन्होंने तराइन के दूसरे युद्ध में मोहम्मद गोरी का साथ दिया। इसकी मुख्य वजह उनकी बेटी संयोगिता थी, जो उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर पृथ्वीराज चौहान के साथ शादी की।

जब राजा जयचंद को यह बात पता चली कि मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) से अपनी पराजय का बदला लेना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मन की मुराद मिल गई। उन्होंने मोहम्मद गोरी का साथ पाकर पृथ्वीराज चौहान को कुचलने की योजना बनाई क्योंकि अकेले वह पृथ्वीराज चौहान का सामना नहीं कर सकते थे

जब पृथ्वीराज चौहान को इस बात की खबर मिली कि मोहम्मद गोरी बदला लेने के लिए आतुर है, तो इस बात से पृथ्वीराज चौहान को कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन सबसे बड़ी बात देखने को मिली, वह यह थी कि संयोगिता का हरण करने की वजह से बहुत से राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान का साथ नहीं दे रहे थे। 1192 ईस्वी का वह भीषण युद्ध जिसे इतिहास के पन्नों से कभी नहीं मिटाया जा सकता। एक ऐसा युद्ध जिसमें अपने ही अपनों के खिलाफ खड़े थे।

तराइन के मैदान में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी की सेनाएं आमने-सामने थी। पृथ्वीराज चौहान की कल्पना के विपरीत मोहम्मद गोरी बहुत ही सुसंगठित सेना के साथ ही युद्ध मैदान में आया , दूसरा उसे राजा जयचंद का साथ मिल गया।

पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) की सेना में 3,00,000 सैनिक शामिल थे। जबकि मोहम्मद गोरी की सेना में 1,20,000 सैनिक थे लेकिन कहते हैं कि घुड़सवार जोकि तीरंदाजी में माहिर थे, वह मोहम्मद गौरी की सेना में अधिक थे। दूसरी तरफ उन्हें राजा जयचंद का साथ मिल गया और उनकी पूरी सेना मोहम्मद गौरी की तरफ से लड़ रही थी। इसी वजह से पृथ्वीराज चौहान की सेना का आक्रमण थोड़ा कमजोर हो गया और उन्हें इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा।

राजा जयचंद की बात की जाए तो इसी गद्दारी की वजह से उन्हें इतिहास में एक गद्दार के तौर पर याद किया जाता है। राजा जयचंद का साथ पाकर मोहम्मद गोरी और अधिक मजबूत हो गया। इस भीषण युद्ध में दोनों तरफ से बहुत मारकाट हुई। अंततः पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया गया। मोहम्मद गौरी के अधीन उसे अजमेर का राजा बनाया लेकिन कुछ समय बाद ही मोहम्मद गोरी ने विद्रोह कर दिया, जिसके बाद मोहम्मद गोरी ने उन्हें बंदी बनाकर गजनी ले गए।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार एक कैदी के रूप में पृथ्वीराज चौहान को जब गजनी ले जाया गया। तब वहां जाकर उनकी दोनों आंखें फोड़ दी और तरह-तरह की यातनाएं दी गई जो कि बहुत ही अमानवीय थी।

राजा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान की दुश्मनी ?

पन्नाराय नामक एक बहुत बड़े और मशहूर चित्रकार देश के नामी-गिरामी राजा महाराजाओं के चित्र लेकर कन्नौज पहुंचे। वहां पर इन्होंने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई, इन चित्रों में पृथ्वीराज चौहान का चित्र भी शामिल था। राज्य की स्त्रियों और पुरुषों की लाइन लगी हुई थी, सभी को पृथ्वीराज चौहान बहुत ही आकर्षक और खूबसूरत लगे।

हर कोई पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) के चित्र की तारीफ कर रहा था। जब सहेलियों के द्वारा यह खबर कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता तक पहुंची, तो वह भी उस चित्र को देखने के लिए लालायित हो उठी। संयोगिता अपनी सहेलियों के साथ उस चित्र को देखने के लिए पहुंची, जब उसने उस चित्र को देखा तो देखती ही रह गई और उसमें खो गई।संयोगिता की नजर नहीं हट रही थी, उसके दिल की धड़कन बढ़ गई।

केवल चित्र देखकर संयोगिता ने अपना दिल पृथ्वीराज चौहान को दे दिया। इन्होंने मन बना लिया की वह अब शादी तो पृथ्वीराज चौहान से ही करेंगी। लेकिन यह कैसे संभव होगा किसी को पता नहीं था। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कन्नौज के राजा जयचंद पृथ्वीराज चौहान से नफरत करते थे। एक दूसरे के चिर प्रतिद्वंदी होने की वजह से शायद यह प्रेम पूरा ना हो पाए ऐसा विचार संयोगिता के मन में भी था।

लेकिन कहते हैं कि जब हम किसी को दिलों जान से चाहते हैं तो पूरी कायनात उसे मिलाने में लग जाती है। जल्द ही संयोगिता के मन में एक विचार आया और उन्होंने चित्रकार पन्नाराय को बुलाया और स्वयं का चित्र बनाकर पृथ्वीराज चौहान के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही।
सुंदर चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध चित्रकार ने राजकुमारी संयोगिता का एक बहुत ही सुंदर चित्र बनाया और दिल्ली जाकर पृथ्वीराज चौहान को दिखाया।

पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) राजकुमारी संयोगिता की खूबसूरती और यौवन को देखकर मोहित हो गए। जिस तरह राजकुमारी संयोगिता ने पहली ही नजर में पृथ्वीराज चौहान को दिल दे दिया, वैसे ही पृथ्वीराज चौहान भी दिल हार बैठे। राजकुमारी संयोगिता द्वारा चलाया गया तीर निशाने पर जा लगा, जो आग संयोगिता के दिल में थी वही आग अब पृथ्वीराज चौहान के दिल में भी लग गई। एक दूसरे को देखने के लिए तड़प उठे।

परवान चढ रहे प्रेम के बारे में जब कन्नौज के राजा जयचंद को पता चला तो वह आगबबूला हो उठे। उन्हें पृथ्वीराज चौहान कतई पसंद नहीं था और तो और वह पृथ्वीराज चौहान को अपना दुश्मन मानते थे। उन्होंने राजकुमारी संयोगिता को बुलाया और कहा कि पृथ्वीराज चौहान के साथ तुम्हारी शादी नहीं हो सकती है। राजकुमारी संयोगिता ने अपने पिता से प्रार्थना की कि वह पृथ्वीराज चौहान को बहुत पसंद करती हैं और उसी से शादी करेगी।

राजा जयचंद को यह बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी के रंग में भंग डालने के लिए उन्होंने एक योजना बनाई। इस योजना के अनुसार राजकुमारी संयोगिता के स्वयंवर की घोषणा की। आसपास और दूरदराज के सभी राजा महाराजाओं को इस स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया गया लेकिन पृथ्वीराज चौहान को सूचना नहीं दी।

धीरे-धीरे यह खबर पुरे देश में फैल गई। जब यह बात पृथ्वीराज चौहान के कानों में पड़ी तो वह अपने सैनिकों के साथ कन्नौज की तरफ निकल पड़े। स्वयंवर का दिन था राजकुमारी संयोगिता ने किसी दूसरे राजकुमार की तरफ देखा तक नहीं और वहां पर लगी हुई पृथ्वीराज चौहान की तस्वीर को वरमाला पहना दी।

यह देख कर सभी राजा बहुत क्रोधित हुए, संयोगिता के पिता राजा जयचंद को बहुत गुस्सा आया लेकिन तभी वहां पर पृथ्वीराज चौहान आ पहुंचे। राजकुमारी संयोगिता ने वरमाला पृथ्वीराज चौहान के गले में डाल दी। पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को अपने साथ लेकर दिल्ली आ गए।
दिल्ली आने के पश्चात हिंदू रिती रिवाज एवं संस्कृति के अनुसार इन्होंने विवाह किया।

इस प्रेम कहानी की वजह से पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचन्द के बिच दुश्मनी हुई थी।

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई ?

Prithviraj Chauhan की मृत्यु को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद हैं। एक पक्ष मानता हैं कि पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी ने मारा जबकि दूसरे पक्ष का कहना हैं कि Prithviraj Chauhan के राजकवि चंदबरदाई ने उनको मारा था लेकिन हम दोनों पक्षों को ध्यान में रख कर चलेंगे। प्रथम पक्ष कहता हैं की तराइन के द्वितीय युद्ध में पराजय के पश्चात मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई को बंदी बना लिया था और Prithviraj Chauhan द्वारा पुनः गौरी के खिलाफ षड़यंत्र रचने की वजह से गौरी ने दोनों को मौत के घाट उतार दिया।

पहली बात तो ये की अगर दोनों को बंदी बना रखा था, तो षड़यंत्र कैसे कर सकते थे ? यह बात गले नहीं उतरती हैं। इस तरह पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु को मान लेना अप्रासंगिक होगा।

अगर दूसरे पक्ष पर ग़ौर करे तो तह सत्य के करीब प्रतीत होता हैं क्योंकि अफगानिस्तान में पृथ्वीराज चौहान का स्मारक बना हुआ हैं।

इससे यह तो साफ होता हैं की Prithviraj Chauhan को गौरी वहां लेकर गया था। इतिहासकार लिखते हैं कि मोहम्मद गौरी ने Prithviraj Chauhan की दोनों आँखे फोड़ दी थी। मोहम्मद गौरी के साथ उनका राज दरबारी चंदबरदाई भी था। मोहम्मद गौरी ने जीत की ख़ुशी में तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया। यह बात चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को बताई तो उन्होंने भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की इच्छा जताई।

मोहम्मद गौरी की हाँ पर पृथ्वीराज को भी भाग लेने का मौका मिला। प्रतियोगिता समय चंदबरदाई ने  मोहम्मद गौरी से आज्ञा मांगी की पृथ्वीराज चौहान देख नहीं सकते है इसलिए मुझे उनको निशाना लगाने की जगह बोलकर बतानी पड़ेगी ,इस पर मोहम्मद गौरी ने हामी भर दी।

जैसे ही चंदबरदाई Prithviraj Chauhan के करीब जाता हैं ,चौहान कहते हैं मुझे आप यह बताओ को सुल्तान गौरी किस जगह पर बैठे हैं। जैसे ही में उन पर तीर चलाऊंगा आप मेरी गर्दन उड़ा देना क्योंकि में हिन्दू के हाथों मरना चाहता हूँ। राजकवि चंदबरदाई बोले –

चार बांस चौबीस गज,अंगुल अष्ट प्रमाण।

ता ऊपर सुल्तान हैं, मत चुको चौहान।।

राजकवि चंदबरदाई

यह सुनते ही पृथ्वीराज चौहान ने तीर छोड़ा जो सीधा मोहम्मद गौरी के शरीर को भेद गया और गौरी निचे गिर पड़ा। चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने एक दूसरे को मार डाला क्योंकि वो नहीं चाहते थे उनको कोई दूसरा मारे। इस तरह मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान ने मारा था। पृथ्वीराज की मृत्यु उनके ही राजकवि द्वारा हुई। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज और चंदबरदाई दोनों की मृत्यु गजनी में हुए थी।

पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे या राजपूत

पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर और राजपूत होने के प्रमाण मिलते हैं। हम दोनों का विश्लेषण करके के बाद स्वविवेक से जान सकेंगे की वाकई में वह राजपूत थे या गुर्जर –

पृथ्वीराज चौहान के राजपूत होने के प्रमाण/सबूत-

अगर इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड की माने तो पृथ्वीराज चौहान क्षत्रिय राजपूत थे। जबकि गुर्जर समाज का कहना की वो गुर्जर थे। ऐसी बात नहीं हैं कि दोनों के दावों को ख़ारिज किया जा सके लेकिन बहुत अध्यन करने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है की पृथ्वीराज क्षत्रिय ही थे।

पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने के प्रमाण/सबूत

गुर्जरों का मानना हैं कि प्रतिहार,परमार, सोलंकी और चौहान ये चारों वंश एक ही थे।अजमेर के चौहान वंश से ही बगड़ावत कथा का सम्बन्ध होने के  साथ ही पृथ्वीराज विजय ,पृथ्वीराज रासा में इसका उल्लेख हैं।

विदेशी लेखक ए.एफ़.जारले के अनुसार तथा जेकसन द्वारा लिखी पुस्तक में पृथ्वीराज के गुर्जर होने के प्रमाण मिलते हैं। इस कश्मीरी कवी ने पृथ्वीराज विजय में बार बार गुर्जर शब्द का प्रयोग पृथ्वीराज के साथ किया है। अलबेरुनी नामक इतिहासकार बताते है कि गुजरात्रा का अर्थ गुर्जरों द्वारा आरक्षित राज्य।

कन्नौज ,अफगानिस्तान और पंजाब तक पृथ्वीराज का राज्य था लेकिन कर्नल टॉड ने इसे बदल दिया।

पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता का क्या हुआ?

पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) की मृत्यु की खबर सुनते ही पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता का क्या हाल हुआ यह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। वह पूरी तरह टूट गई क्योंकि उसके पिता भी उसके पक्ष में नहीं थे। ऐसे में संयोगिता को उसकी ननद प्रथा का साथ मिला। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी संयोगिता और प्रथा ने किले में जौहर करने का निर्णय लिया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद संयोगिता के पास निर्णय पर अमल करने के लिए ज्यादा समय नहीं था।

दूसरी तरफ मोहम्मद गौरी का सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक रानी संयोगिता और अन्य हिंदू औरतों को अपने हरम में लेने के लिए उतावला हो रहा था। सशस्त्र सेना के साथ कुतुबुद्दीन ऐबक लाल किले के बाहर डेरा डाल कर बैठ गया। लाल किले के चारों तरफ यमुना नदी का बहता पानी और किले की विशाल दीवारें एबक को हताश कर रही थी। वहीं दूसरी तरफ संयोगिता और साथियों ने मिलकर लाल किले में विशाल चिता की तैयारियां करने लगे। इससे पहले रानी संयोगिता ने किले में प्रवेश करने के लिए बने पुल को तूड़वा दिया था।

किले के बाहर जो खाई थी उसे भरने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि, हिंदुओं को इसके अंदर डाला जाए और उनकी लाशों के ऊपर चढ़कर दीवार को पार किया जाए। जिन हिंदुओं ने अपना धर्म और संस्कृति का साथ नहीं छोड़ा और तरह-तरह की यातनाएं सहते रहे, उन्हें उस खाई में डाला गया। जब खाई जिंदा शरीरों से भर गई तब, उन शरीर के ऊपर हाथियों को निकाला गया और दरवाजे तक पहुंचने का प्रयास किया गया।

वहां पहुंचने के बाद भी हाथियों से वह दरवाजा नहीं टूट रहा था क्योंकि दरवाजे के बाहर की तरफ मोटी मोटी और नुकीली किले लगी हुई थी, जिन्हें तोड़ना हाथीयों के बस का रोग नहीं लग रहा था। अंत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने आदेश दिया कि राजा जयचंद के पुत्र धीरचंद्र को दरवाजे के सामने खड़ा किया जाए और उसके शरीर पर हाथीयों से वार करवाया जाए।

इनका दोगलापन देखिए राजा जयचंद ने मोहम्मद गौरी का साथ दिया लेकिन मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनके ही पुत्र धीरचंद्र को मौत के घाट उतार दिया। दरवाजा तोड़ने के बाद जैसे तैसे कुतुबुद्दीन ऐबक दुर्ग के अंदर पहुंचा लेकिन वहां का दृश्य देखकर वह छटपटा गया।

धक-धक ज्वाला धधक रही थी, महारानी संयोगिता उनकी ननद प्रथा और उनके साथ हजारों हिंदू वीरांगनाओं ने आन बान और शान के लिए अपने शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के पश्चात पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता ने जौहर कर लिया।

दोस्तों अगर पृथ्वीराज चौहान के इतिहास पर आधरित यह लेख आपको अच्छा लगा हो तो कमेंट करके बताए और अपने दोस्तों के साथ शेयर करें ,धन्यवाद।

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