History Of Raja jaichand || राजा जयचंद का इतिहास ||

Last updated on April 25th, 2024 at 07:56 am

राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history In Hindi) यह था की इन्हें आज भी गद्दार कहा जाता हैं। भारत में धोखेबाज, देशद्रोही या फिर गद्दारी करने वाले व्यक्ति को जयचन्द कहकर पुकारा जाता हैं। किसी भी राजा के लिए इससे बड़ा कलंक क्या हो सकता हैं।

भारतीय इतिहास बहुत ही रोचक और रहस्यमयी रहा है जिसमें राजा जयचंद का इतिहास भी शामिल हैं। भारत के इतिहास (Raja jaichand history) के पन्नों में ऐसे कई नाम दबे पड़े हैं जिनके कुछ काले कारनामों के कारण कलंकित हैं।

राजा जयचंद ऐसे ही नामों में से एक था। भारतीय इतिहास में इन्हें गद्दार तक कहा जाता हैं। इसकी वजह आपको इस आर्टिकल के माध्यम से मिल जाएगी।

राजा जयचंद का इतिहास और कहानी

परिचय बिंदुपरिचय
पूरा नामराजा जयचंद्र राठौड़ (raja jaichand), गहड़वाल वंश
जन्म स्थानकन्नौज
पिता का नामविजयचंद्र
दादा जी का नामगोविंदचंद्र
वंशगहडवाल वंश
पुत्र-पुत्रीहरिश्चन्द्र और संयोगिता
राजगद्दी21 जून 1170 ईस्वी
शासनावधि1170 ईस्वी से 1194 ईस्वी तक
उत्तराधिकारीहरिश्चंद्र
घरगढ़वाल
History Of Raja jaichand

जयचंद्र के पिता विजयचंद्र ने अपने जीवित रहते ही उनके पुत्र को कन्नौज का राज-काज सौंप दिया। यह साल 1170 की बात है,जब विजयचंद्र की मृत्यु हो गई और जयचंद्र/जयचंद ( Raja jaichand ) को विधिवत् रूप से राजा घोषित किया गया और यही से शुरू हुआ राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history)।

राजा जयचंद विद्वानों का बहुत सम्मान और सत्कार करने वाले थे। इतना ही नहीं वीरता के साथ साथ ये बहुत प्रतापी राजा थे। वीरता, साहस, कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता जैसे गुणों के चलते राजा जयचंद ने कन्नौज राज्य का काफी विस्तार किया। “पृथ्वीराज रासो” का अध्यन करने से पता चलता है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल की पुत्री ने राजा जयचंद को जन्म दिया था।

कई लोग यह जानने की कोशिस करते हैं कि राजा जयचन्द के कितने पुत्र थे तो बता दें कि राजा जयचंद के एक मात्र पुत्र था जिसका नाम हरिश्चंद्र था। एक पुत्र के अलावा राजा जयचंद के एकलौती पुत्री भी थी जिसका नाम संयोगिता था। संयोगिता की वजह से ही पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद का युद्ध हुआ था। पृथ्वीराज चौहान ने राजा जयचंद की मर्जी के खिलाफ जाकर संयोगिता से प्रेम विवाह किया था।

राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history) देखा जाए तो वह एक उम्दा लेखक भी थे उन्होंने “रंभामंजरी नाटिका” नामक लेख लिखा था। इसके अनुसार राजा जयचंद ने चंदेल राजा मदनवर्मदेव को हराया था।

इतना ही नहीं इस नाटिका अथवा रासो से यह भी ज्ञात होता है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांता शहाबुद्दीन गोरी को राजा जयचंद ने कई बार युद्ध में हराया और भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।
कई इतिहासकारों का मानना है कि राजा जयचंद के समय में गहडवाल साम्राज्य बहुत अधिक फैल गया था। इतिहासकार “ईब्र असीर” राजा जयचंद के साम्राज्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि उनका साम्राज्य मालवा से लेकर चीन तक फैला हुआ था इस वजह से भी राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history) में नाम हैं।

बंगाल के सेन राजाओं में लक्ष्मण सेन ने युद्ध में राजा जयचंद को पराजित किया था इसके अलावा दिल्ली पर अधिकार करने को लेकर हुए युद्ध में चौहान वंश के शासकों ने भी राजा जयचंद को पराजित किया था।

भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन स्थानों में से एक पुष्कर तीर्थ में (जो कि अजमेर में स्थित है) राजा जयचंद ने वाराह मंदिर का निर्माण करवाया था जो राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history) में नाम दर्ज करवाता हैं।

राजा जयचंद द्वारा साम्राज्य विस्तार

राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history) उठाकर देखा जाए तो वीर, शक्तिशाली और दूरदर्शी कन्नौज के अंतिम और महान शासक राजा जयचंद्र अथवा राजा जयचंद के शासनकाल में कन्नौज साम्राज्य उन्नत स्थिति में था तथा साम्राज्य विस्तार भी बहुत तेजी के साथ हुआ। कन्नौज के साथ-साथ बनारस का नाम भी इसमें शामिल है।

कन्नौज बनारस और असनी नामक स्थानों पर राजा जयचंद के द्वारा किलो का निर्माण किया गया था। राजा जयचंद ने अपनी सेना की संख्या भी बढ़ा दी थी।

अपने दादा गोविंदचंद्र की तरह राजा जयचंद भी विद्वानों का स्थान अपने महल में रखता था।

भारतीय इतिहास (Raja jaichand history) का विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य ” नैषधमहाकाव्य” की रचना करने वाले लेखक श्रीहर्ष राजा जयचंद की राज्यसभा में निवास करते थे।

राजा जयचंद की मृत्यु कैसे हुई

राजा जयचंद की मृत्यु कैसे हुई जानने से पहले यह जानना होगा कि राजा जयचंद जब मोहम्मद गोरी से जाकर मिल गया और षडयंत्रपूर्वक पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ खड़ा हो गया (राजा जयचंद का इतिहास (Raja jaichand history) यहीं पर कलंकित हुआ था ) और युद्ध लड़ा, ऐसी स्थिति में पृथ्वीराज चौहान पराजित हो गए। मोहम्मद गौरी की हार के साथ ही मुस्लिम शासक पंजाब से दिल्ली तक बढ़ गए।

साम्राज्य बढ़ जाने की वजह से मोहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सेनानायक बनाया और एक भूभाग पर शासन करने का मौका दिया।

इस समय कन्नौज का राजा जयचंद बहुत ही शक्तिशाली था, लेकिन बंगाल के सेन राजाओं से निरंतर युद्ध करने की वजह से वह कमजोर पड़ गया था और इसी का फायदा मुस्लिम शासक मोहम्मद गोरी ने उठाया और इस युद्ध में राजा जयचंद की हार हुई और ईसी युद्ध में राजा जयचंद की मृत्यु हुई थी।

राजा जयचंद बहुत ही वीरता के साथ मोहम्मद गौरी की सेना के साथ युद्ध कर रहे थे इसी युद्ध का वर्णन करते हुए इतिहासकार डॉ. आशीर्वादी लाल लिखते हैं कि राजा जयचंद की सेना कॉल बंद कर मोहम्मद गौरी की सेना पर टूट पड़ी।

ऐसा लग रहा था कि यह सेना मोहम्मद गोरी का सर्वनाश कर के ही छोड़ेगी लेकिन समय बलवान होता है, किसी सैनिक के बाण से निकला एक तीर राजा जयचंद की आंख में जा लगा और उनकी मृत्यु हो गई। राजा जयचंद की मृत्यु हो जाने के पश्चात राजा जयचंद की सेना घबरा गई और हार मान ली। राजा जयचंद की मृत्यु से मुस्लिम हावी हुए।

इतिहासकारों का मानना है कि भाग्यवश यह युद्ध मोहम्मद गोरी जीत गया (राजा जयचंद की मृत्यु के पश्चात् ) और यही युद्ध मुसलमानों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ, इसी युद्ध के बाद मुसलमानों ने मुस्लिम साम्राज्य विस्तार की भारत में नींव रखी।

राजा जयचंद को गद्दार क्यों कहा जाता है?

राजा जयचंद को गद्दार क्यों कहा जाता हैं (Raja jaichand history ) यह प्रश्न लोगों के दिमाग में आ जाता हैं जब भी उनका नाम लिया जाता हैं ? जैसा की आप जानते हैं की राजा जयचंद कन्नौज के राजा थे।

भारतीय इतिहास के मुख्य गद्दारों की जब भी बात होती है तब राजा जयचंद का नाम सबकी जबान पर आता है। या कोई व्यक्ति किसी भी तरह का धोखा करता है, कपट करता है या फिर देशद्रोही होता है उसे जयचंद कहकर पुकारा जाता है।

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी भारतीय इतिहास में बहुत प्रसिद्ध (Raja jaichand history) है। संयोगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थी।

इस समय पृथ्वी राज चौहान के सबसे बड़े दुश्मन थे मोहम्मद गौरी। मोहम्मद गोरी को सन 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने हराया था। मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज चौहान ने 13 बार लगातार हराया था और हर बार माफ कर दिया।

दूसरी तरफ राजा जयचंद की पृथ्वीराज चौहान से नफरत करते थे क्योंकि उन्हें पृथ्वीराज चौहान और उनकी पुत्री संयोगिता का रिश्ता पसंद नहीं था। इस प्रेम कहानी के वह खिलाफ थे।
पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता के साथ शादी कर ली और उन्हें अपने साथ ले आए। इस बात से राजा जयचंद बहुत अधिक क्रोधित हुए और पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने के लिए मोहम्मद गोरी से जाकर मिल गए।

कहते हैं कि दुश्मन के दुश्मन आपस में दोस्त होते हैं ऐसा ही यहां पर भी हुआ कन्नौज के राजा जयचंद और मोहम्मद गौरी एक हो गई और दोनों का एक ही मकसद था किसी भी तरह पृथ्वीराज चौहान को पराजित करना।

इसमें मोहम्मद गोरी का भी फायदा था, वह अपनी हार का बदला लेना चाहता था जबकि दूसरी तरफ बदले की आग में जल रहे राजा जयचंद किसी भी तरह पृथ्वीराज चौहान को नीचा दिखाना चाहते थे।

इस तरह संयोगिता के साथ शादी कर लेने से कई बड़े-बड़े राजपूत राजा भी पृथ्वीराज चौहान से नाराज हो गए और अपने आपको उनसे अलग कर लिया।

अपमान का बदला लेने के लिए जयचंद ने मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने के लिए बुलाया और साथ ही वादा किया कि युद्ध के दौरान राजा जयचंद की पूरी सेना मोहम्मद गौरी का साथ देगी। राजा जयचंद की बात मानकर मोहम्मद गोरी ने एक बार फिर पृथ्वीराज चौहान पर हमला कर दिया।

पृथ्वीराज चौहान ने पड़ोसी और राजपूत राजाओं से मदद की गुहार लगाई लेकिन कोई भी राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान के मदद करने के लिए आगे नहीं आए।

सन 1112 9 ईसवी में तराइन का दूसरा युद्ध मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के पास तीन लाख से अधिक सैनिकों की सेना थी जबकि पृथ्वीराज चौहान के मुकाबले में मोहम्मद गोरी के पास मात्र 1लाख 20 हज़र सैनिक थे।

लेकिन युद्ध में मोहम्मद गौरी की सेना ने पूर्व नियोजित प्लान के तहत पृथ्वीराज चौहान की सेना में शामिल हाथियों पर तीरों से हमला करना शुरू कर दिया। जिससे हाथी घायल होकर गिर गए और युद्ध मैदान में इधर-उधर दौड़ने लगे। जिससे वहां पर भगदड़ मच गई और परिणाम स्वरूप पृथ्वीराज चौहान की सेना के ही कई सैनिक मारे गए।

इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और उन्हें बंदी बना लिया गया।

पृथ्वीराज चौहान की हार मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ी जीत की मोहम्मद गोरी ने “कुतुबुद्दीन ऐबक” को भारत का शासन देखने के लिए नियुक्त किया।

जैसे-जैसे समय बीतता गया मोहम्मद गौरी की आकांक्षा बढ़ती गई। मोहम्मद गोरी ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया, जिसमें मोहम्मद गौरी की सेना का सामना जयचंद की सेना के साथ हुआ। तीर लगने की वजह से राजा जयचंद की मौत हो गई और इस तरह कन्नौज का राज्य भी मोहम्मद गोरी के हाथों में आ गया। यही मुख्य वजह रही की राजा जयचंद को गद्दार कहा (Raja jaichand history) जाता हैं।

क्या राजा जयचंद गद्दार नहीं थे? ( Raja jaichand history)

इस तरह इस आर्टिकल को पढ़ने पर यही साबित होता है कि राजा जयचंद गद्दार (Raja jaichand history) थे। लेकिन कई इतिहासकारों ने गहन शोध किया जोकि बिल्कुल विपरीत रहा और यह साबित करता है कि राजा जयचंद गद्दार नहीं थे।

ऐसे ही एक इतिहासकार डॉ. आनंद शर्मा ने राजा जयचंद के जीवन पर शोध किया (Raja jaichand history) और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि संयोगिता नामक उनकी कोई पुत्री नहीं थी।

 इतिहास का डॉक्टर आनंद शर्मा के शोध पर विचार किया जाए जिनके अनुसार राजा जयचंद की संयोगिता नाम की कोई बेटी नहीं थी, अगर इसे सही मान लिया जाए तो पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की शादी की बात एकदम गलत साबित हो जाती है।

जब यह बात गलत साबित हो जाती है तो राजा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच में जो मतभेद थे और जिस वजह से राजा जयचंद अपमान का बदला लेना चाहते थे, यह बात बिल्कुल निरर्थक हो जाती है।

इतना ही नहीं इतिहासकार डॉ आनंद शर्मा का मानना है कि उन्हें कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिसके बलबूते यह कहा जा सके कि पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद के बीच मतभेद थे।
राजा जयचंद के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मोहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।

साथ ही तराइन के प्रथम युद्ध में राजा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान दोनों एक साथ मोहम्मद गोरी के खिलाफ लड़े थे, इस चीज का भी कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है।

मोहम्मद गोरी ने अपना साथ देने वाला राजा जयचंद को भारत का गवर्नर भी घोषित किया था। तो ऐसी क्या वजह हो सकती है कि मोहम्मद गोरी ने राजा जयचंद को मौत के घाट उतार दिया हो।

भारत वर्ष के इतिहास (Raja jaichand history) के बाद की जाए तो प्रारंभ से ही यह बात की जाती रही है कि भारतीय इतिहास के वह पन्ने फाड़ दिए गए या उन्हें दबा दिया गया जो भारतीय इतिहास की साफ तस्वीर का उल्लेख करते थे।

ऐसा भी ऐसा भी माना जाता है कि जो लोग कथाएं हैं और प्राचीन कहानियां चली आ रही है उनके आधार पर भारतीय इतिहास था। जबकि आधुनिक इतिहासकारों ने इन चीजों को झुठला दिया है जो कि उचित नहीं है।

यह पढ़कर कहा जा सकता हैं कि राजा जयचंद गद्दार नहीं थे। Raja jaichand का इतिहास बहुत रोचक भी और असामंजस्यपूर्ण हैं।

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