Srila Prabhupada की Biography हिंदी में।

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अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का इतिहास/जीवनी और प्रेरणा(Srila Prabhupada Biography)-

ISKON के संस्थापक Srila Prabhupadaश्रील प्रभुपाद का इतिहास पढ़कर ना सिर्फ़ आपको प्रेरणा मिलेंगी बल्कि आप जान सकेंगे कि ISKON के पीछे कितना जीनियस व्यक्ति था। इन्होंने विदेशों में हिंदुत्व की नीव रखी और फ़ैला दिया श्रीमद् भागवत गीता को दुनियां के कोने कोने में।

जन्म- 1 सितंबर 1896 को कोलकाता में हुआ था।

देवलोक गमन– 14 नवंबर 1977 को Srila Prabhupada वृंदावन में पंचतत्व में विलीन हो गए।

पूरा नाम- अभय चरण डी।

विवाह– इनका विवाह 1918 में राधारानी देवी के साथ हुआ था।

संताने- वृंदावन चंद्र डे, प्रयागराज और मथुरा मोहन डे।

गुरु- इनके गुरु का नाम भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर था।

मंदिर: इस्कॉन मंदिर को इन्होंने ही बनवाया था।

संप्रदाय- श्रील प्रभुपाद ब्रह्ममधवगौड़िया संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे।

इनका जन्म सितंबर सन 1896 में बंगाल में हुआ था। जब यह मात्र 14 वर्ष के थे इनकी माता का देहांत हो गया।

इन्होंने “स्कॉटिश चर्च कॉलेज” से पढ़ाई की पढ़ने में बहुत तेज है साथ ही बचपन से ही यह बहुत जीनियस थे। ऐसा नहीं था कि ये बचपन से ही सन्यासी बन गए।

अगर बात की जाए तो अंग्रेजी भाषा पर इनकी पकड़ बहुत अच्छी थी। प्रयागराज और इलाहाबाद में इनका खुद का फार्मेसी का व्यवसाय था।

जब इनकी मुलाकात इनके गुरु भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से हुई तो उन्होंने इनको पहचान लिया कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है।

उन्होंने सोचा कि इनकी अंग्रेजी इतनी अच्छी है कि यदि यह अंग्रेजों के सामने अंग्रेजी बोलेंगे तो उनको भी आश्चर्य होगा कि कोई कैसे इतनी अच्छी अंग्रेजी बोल सकता हैं।

Srila Prabhupada की अध्यात्म में बहुत रूचि थी इनको शास्त्र पढ़ना ,समझना और लोगों को समझाना बहुत अच्छा लगता था। यह बात इनके गुरुजी भलीभांति  जानते थे।

एक दिन उनके गुरु जी ने उनको अपने पास बुलाया और कहा कि क्या तुम मेरा एक काम कर सकते हो। श्रील प्रभुपाद ने का हे गुरुदेव आप आज्ञा दीजिए।

गुरुजी ने कहा अभी तक किसी ने भी हमारे शास्त्रों को विश्व भर के लोगों तक नहीं पहुंचाया है। क्या तुम अंग्रेजी भाषा में श्रीमद्भागवत गीता को संपूर्ण विश्व में लोगों तक पहुंचा सकते हो?

क्योंकि आपकी अंग्रेजी अच्छी है और आध्यात्मिक की ओर आपका झुकाव देखकर मुझे लगता है कि यह काम तुम कर सकते हो।

इन्होंने गुरु के मुंह से निकली हुई बात को दिल से लगा लिया और ठान लिया कि मुझे गुरु की आज्ञा का पालन करना है इसके लिए मुझे चाहे कुछ भी करना पड़े।

इस समय इनके पास ना तो कोई सुविधा थी और ना कोई ऐसा साधन था जिसके माध्यम से श्रीमद्भागवत गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा सके।

फिर भी कहते हैं जो ठान लेता है वह करके दिखाता है और इनके साथ भी ऐसा ही हुआ। Srila Prabhupada कागज के पेपर लिए और उनके ऊपर लिखना शुरु कर दिया।

श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने गए और उसका अंग्रेजी अनुवाद करते गए। देखते ही देखते इन्होंने पूरी किताब का अंग्रेजी अनुवाद कर दिया।

1 दिन दिए अपने व्यवसाय से घर लौटे तो Srila Prabhupada ने पाया कि इनके कमरे में वह ट्रांसलेट किए हुए पेज नहीं थे।  उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज लगाई और पूछा कि यहां पर पेपर पड़े थे वह कहा गए?

 तो उनकी पत्नी ने जवाब दिया कि वह पेपर मैंने कबाड़ वाले को बेच दिए हैं और उसके बदले में चाय ली है।

इनको बहुत दुख हुआ और गुस्सा भी आया कि वह पेपर बहुत महत्वपूर्ण थे तुम्हें ऐसा करने से पहले एक बार मुझसे पूछना चाहिए था।

उनकी पत्नी ने जवाब दिया कि उनके बदले चाय मिली है। इन्होंने अगला प्रश्न अपनी पत्नी से किया चाय अच्छी या मैं ? उनकी पत्नी कुछ नहीं बोली इतने में इन्होंने पुनः पूछा चाय या मैं ? उनकी पत्नी ने जवाब दिया चाय।

यह सुनकर Srila Prabhupada को बहुत गहरा धक्का लगा। उन्होंने अपना झोला उठाया और उसमें श्रीमद् भागवत गीता की एक प्रति रखी और घर छोड़कर निकल गए।

इस समय तक इनको यह भी नहीं पता था कि कहां जाना है कहां रुकना है। इनके दिमाग में एक ख्याल आया कि विश्व में सबसे बड़ा देश है अमेरिका और अमेरिका में भी सबसे अच्छी सिटी है न्यूयॉर्क, तो क्यों ना अपने काम की शुरुआत न्यूयॉर्क से ही की जाए।

आगे पीछे का ना कुछ अता- पता, आने वाले समय में क्या होगा? क्या नहीं होगा? कुछ भी विचार किए बिना यह जहाज में बैठ गए और अमेरिका के लिए निकल गए।

लगभग 32 से 35 दिनों की यात्रा के बाद जब यह अमेरिका पहुंचे तो लोग इनकी वेशभूषा देखकर इनकी हंसी उड़ा रहे थे। रात्रि के समय सड़क के किनारे पर सो कर इन्होंने कुछ दिन काटे।

लेकिन इनके दिमाग में एक बात चल रही थी कि मैं अकेला हूं इसका मतलब यह नहीं कि मैं कुछ नहीं कर सकता। हां यह ठीक है कि मैं सब कुछ नहीं कर सकता लेकिन कुछ तो कर ही सकता हूं और मैं कुछ करके ही जाऊंगा गुरुजी की बात खाली नहीं जाएगी।

यह वह समय था जब अमेरिका और वियतनाम के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था और यह पिछले काफी समय से चला आ रहा था। परिस्थितियां Srila Prabhupada के पक्ष में नहीं थी फिर भी यह डटे रहे और खड़े रहे।

हिप्पी और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था।  हिप्पी वह लोग थे जिनका रहन-सहन बहुत ही खराब था।  यह कहीं पर भी सो जाते थे, इनके शरीर से बदबू आ रही होती थी।

जब Srila Prabhupada ने इनके बारे में जाना तो उनके दिमाग में आया कि क्यों नाम में इन लोगों से ही शुरू करो।

उन्होंने एक-एक करके लोगों को श्रीमद्भागवत गीता के बारे में बताया और इनके बीच में रहकर नियमित रूप से भजन कीर्तन करने लगे लेकिन इन लोगों को कहां समझ में आने वाला था यह लोग उल्टा श्रील प्रभुपाद को हास्य का पात्र बना रहे थे।

यह सभी लोग नशे के आदी थे, श्रील प्रभुपाद ने उनसे पूछा कि तुम लोग नशा क्यों करते हो? तो उन्होंने बोला कि यह हमारी आदत बन चुका है।

साथ ही नशे से हमारी उच्च गुणवत्ता का पता चलता है।  लोग हमारे स्टेटस को ऊंचा समझते हैं। यह बात सुनकर Srila Prabhupada ने कहा कि-

“मैं आपको इससे भी बड़ा और ऐसा नशा बता सकता हूं जिसको एक बार करने के बाद तुम जीवन भर उसी नशे को करोगे और इस नशे के समक्ष इस विश्व में दूसरा नशा कुछ भी नहीं हो सकता है” .

  यह बात सुनकर वो लोग बहुत ही आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने पूछा कि यदि ऐसा कोई नशा है तो हमें जल्दी से जल्दी बताओ।

नियमित रूप से भजन कीर्तन की वजह से श्रील प्रभुपाद के साथ-साथ कुछ लोगों को आनंद आने लगा और यह श्रील प्रभुपाद के पास नियमित रूप से आने लगे।

देखते ही देखते पूरा का पूरा हिप्पी समुदाय श्रील प्रभुपाद के साथ आ गया और यहां पर इन्होंने अपने लगभग 100 शिष्य बनाएं और इन सभी से कहा कि मैं अकेला पूरे विश्व में जाकर इसका प्रचार नहीं कर सकता हूं, अगर आप सब मेरा साथ दें तो यह संभव है।

उनके शिष्य इतने मजबूत इरादे वाले थे कि उन्होंने तत्काल हां कर दी।  दो- दो लोगों की टीम बनाकर संपूर्ण विश्व में निकल गए श्रीमद् भागवत गीता का प्रचार करने के लिए।

इन्होंने पूरी दुनिया में 5.50 करोड़ से भी अधिक पुस्तकें बाटी। एक समय की बात है जब एक मीडिया वाला इनका इंटरव्यू लेने आया और उसने इन से पूछा कि क्या आप भगवान है ? तो इन्होंने इसका जवाब दिया नहीं मैं भगवान नहीं हूं, मैं भगवान का नौकर हूं और हां मैं भगवान का नौकर भी नहीं हूं मैं भगवान का नौकर बनने का सिर्फ प्रयास कर रहा हूं।

यह सुनकर उस इंटरव्यू लेने वाले को बहुत ही आश्चर्य हुआ। यह खबर अमेरिका के सभी न्यूज़पेपर में छप गई।

इसी समय दरमियान हेनरी फोर्ड के पोते अलफ्रेड फोर्ड इनसे मिलने के लिए आए और उन्होंने बताया कि हेनरी फोर्ड मेरे दादा थे।  तब श्रील प्रभुपाद ने उनकी आंखों में आंखें डाली और उनसे प्रश्न किया कि अब हेनरी फोर्ड कहां है?

यह सुनकर अलफ्रेड फोर्ड दांतो तले उंगली दबाने लगे और यह बात समझ गए कि इस दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं है जो भी आया है उसको जाना है और उन्होंने Srila Prabhupada के चरण पकड़ लिए।

आज संपूर्ण विश्व में  न्यूजीलैंड ऑस्ट्रेलिया ,दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज और पाकिस्तान जैसे देशों में इस्कॉन के जो मंदिर बने हुए हैं यह सब Srila Prabhupada की ही देन है।

इतना ही नहीं भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू से ही इतना तनाव पूर्ण माहौल रहा है मगर फिर भी इनकी वजह से पाकिस्तान में इस्कॉन के 12 मंदिर बने यह सबसे बड़ी आश्चर्य की बात है।

रूस जैसे देश में श्रीमद् भागवत कथा और भगवान श्री कृष्ण के प्रति लोगों का रुझान देखने लायक है। आने वाले समय में यहां पर हिंदू धर्म का जिस तरह से लोगों के मन में लगाओ बढ़ता जा रहा है हो सकता है कि रूस में इस धर्म को मुख्य रूप से मान्यता मिल जाए।

यह लगातार हाथ से लिख लिख कर पुस्तकों का वितरण करते रहे।  इतना नहीं  जब मौत इनके करीब थी तो भी यह अस्पताल में खाट पर पड़े पड़े अंग्रेजी अनुवाद कर रहे थे। संपूर्ण विश्व में 25 भाषाओं में इन्होंने इस किताब का अनुवाद किया और संपूर्ण विश्व को बता दिया श्रीमद् भागवत के ज्ञान को।

रॉकस्टार बीटल्स इनका फैन हो गया और उस समय इनको 70 एक कार्ड जमीन दान कर दी।

जैसे-जसे इनकी उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे इनके लिखने की रफ्तार भी बढ़ती गई क्योंकि यह चाहते थे कि मरने से पहले अधिक से अधिक लिख लूं ताकि यह ज्ञान संपूर्ण विश्व में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके। इनकी ज़िद्द और हौसला का ही नतीजा था कि यह बहुत ही जल्द संपूर्ण विश्व में फैल गया।

ऐसा कहा जाता है कि 24 में से 22 घंटे यह रिकॉर्डिंग करते रहते थे। मात्र 2 घंटे रेस्ट करते थे और यह समय होता था रात्रि 10:00 बजे से लेकर 12:00 बजे तक। मात्र 12 साल के प्रयास से इन्होंने संपूर्ण विश्व को श्रीमद् भागवत कथा का पाठ पढ़ा दिया। उन्होंने 12 साल के अंदर 108 मंदिर बनाए।

एक बार की बात है Srila Prabhupada अपने शिष्यों के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए गए लेकिन वहां के नियमानुसार दूसरे धर्मों के लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता है।

वहां के पुजारी ने यह कहकर मना कर दिया कि आपके साथ अंग्रेज हैं यह मंदिर में नहीं जा सकते ,केवल आप जा सकते हो तो श्रील प्रभुपाद ने उनसे कहा कि अगर मैं जगन्नाथ मंदिर के अंदर भगवान के दर्शन करने के लिए नहीं जा सकता हूं तो यकीन मानिए मैं भगवान जगन्नाथ को ही बाहर लेकर आऊंगा और पूरी दुनिया इनके दर्शन करेगी।

Srila Prabhupada ने भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू की देखते ही देखते पूरी दुनिया में रथयात्रा का प्रचलन हो गया। यह वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने रथ यात्रा की शुरुआत की थी।

दान पुण्य में भी यह पीछे नहीं दे यह इनके द्वारा स्थापित सभी इस्कॉन मंदिर में लोगों के लिए फ्री में खाने की व्यवस्था हैं। यह भारत में भी 14,00,000 बच्चों को रोज फ्री में खाना खिलाता है जो कि इस्कॉन मंदिर में बनकर आता है। इन्होंने गवर्नमेंट की “मिड डे मील योजना” को अपने अंदर ले लिया और अपनी ओर से लोगों तक खाना पहुंचाने लगे।

स्टीव जॉब्स जैसे व्यक्ति के पास एक समय का खाना खाने के पैसे नहीं थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि मैं खाना खाने के लिए 7  मील चलकर इस्कॉन मंदिर में, कृष्णा टेंपल में खाना खाकर आता हूँ।

साथ ही भारत की पूर्व विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने भागवत गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग संसद में कई बार उठाई थी। इतना ही नहीं “सैटर्न हॉल यूनिवर्सिटी” ने श्रीमद भगवत गीता को कंपलसरी सब्जेक्ट घोषित कर दिया। कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भी इसको अनिवार्य कर दिया गया।

ISKON/इस्कॉन क्या है what is iskon?

इस्कॉन दुनिया भर में भगवान श्री कृष्ण की भक्ति से संबंधित सबसे बड़ा आंदोलन और संगठन है। इस्कॉन का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णाकांशसनेस हैं।

ISKON का सबसे बड़ा मंत्र है ‘हरे रामा – हरे रामा, राम -राम हरे- हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण -कृष्ण हरे- हरे।।

इस आंदोलन की शुरुआत 1966 में अमेरिका के न्यूयॉर्क सिटी में की गई थी। इस्कॉन का सबसे बड़ा मंदिर वृंदावन में स्थित है।

इस ISKON की खासियत यह है कि विश्व में जितने भी मंदिर हैं सभी की बनावट संरचना एक समान है। साथ ही समय और भोजन प्रसाद का वितरण भी एक समान है।

इस्कॉन के चार महत्वपूर्ण नियम Rules Of ISKON-

1  ISKON के अनुयायियों को लहसुन, मांस, मदिरा और प्याज आदि चीजों को त्यागना होगा।

2 अनैतिक आचरण से दूर रहना।

3 कम से कम एक घंटा “गीता” का अध्ययन करना।

4 ISKON मंत्र की 1 दिन में 16 बार जाप करना।

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