भारत में दो जगह रथ यात्रा निकाली जाती हैं एक उड़ीसा के जगन्नाथपुरी जिसे पूरी के नाम से भी जाना जाता है और दूसरी गुजरात के अहमदाबाद में लेकिन जगन्नाथपुरी की रथयात्रा ही भारत के साथ-साथ विश्व विख्यात है.

हिंदू धर्म को मानने वाले लोग ज्यादातर त्योहारों को अपने घर पर ही मनाते हैं लेकिन यह एकमात्र ऐसा त्योहार हैं जिसे लोग एक साथ समूह में इकट्ठा होकर मनाते हैं

प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रथ यात्रा निकाली या मनाई जाती हैं. 10 दिनों तक मनाया जाने वाला यह पर्व भारत में मनाए जाने वाले अन्य त्योहारों से थोड़ा अलग है.

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण) आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया से लेकर दशमी तक जगन्नाथपुरी में लोगों के मध्य ही रहते हैं. और यही वजह है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 10 दिनों तक निकाली जाती है.

भगवान जगन्नाथ की यात्रा के लिए 3 रथों का निर्माण किया जाता है. इस रथयात्रा में सबसे आगे भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का रथ रहता है, यह 14 पहियों वाला रथ तालध्वज के नाम से जाना जाता है.

दूसरा रथ भगवान श्री कृष्ण का रहता है जिसे नंदीघोष (गरुणध्वज) नाम से जाना जाता है इसमें 16 पहिए होते हैं.

तीसरा और अंतिम रथ अर्थात् पद्मरथ जो कि 12 पहियों वाला होता है वह भगवान श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का होता है.

अपनी बहन सुभद्रा की इस इच्छा को पूरी करने के लिए भगवान श्री कृष्ण रथ पर बिठाकर यह यात्रा करवाते हैं. तब से लेकर आज तक इस परंपरा को प्रतिवर्ष मनाया जाता है. जगन्नाथपुरी में रथ यात्रा के पीछे की यह कहानी सार्वभौमिक है.

रथ यात्रा के पीछे की असली कहानी.

भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर बैठकर नगर में भ्रमण के लिए निकलते हैं, ताकि भक्त उनके दर्शन कर सके.