वीरांगना पूरी बाई का इतिहास || History Of Puri Bai

मेवाड़ की महान वीरांगना माँ पूरी बाई (Puri Bai) का संबंध कीर समाज से है। ये एक निडर योद्धा थीं, जिन्होंने आम जनता की रक्षा और सुरक्षा के लिए डाकुओं तथा अन्याय के खिलाफ वीरतापूर्वक संघर्ष किया था। हालांकि इतिहास के पन्नों में इनको वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वो हकदार थी।

इस प्रामाणिक लेख में महान वीरांगना पूरी बाई का इतिहास, जीवन परिचय और उनकी अमूल्य विरासत के बारे में जानकारी दी गई है।

वीरांगना पूरी बाई का इतिहास

नामपूरी बाई
समाजकीर समाज
प्रसिद्धिक्रांतिकारी
क्षेत्रमेवाड़
जन्म11 दिसंबर 1797

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, महान वीरांगना माता पूरी बाई का जन्म 11 दिसंबर 1797 को हुआ था। उनका जन्म एक साधारण कीर परिवार में हुआ था। कीर समाज को कहार, केवट, कश्यप और भोई जैसे भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।

वीरांगना पूरी बाई अपने समय में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के समान एक पराक्रमी योद्धा थीं। वे पुरुषों की पोशाक (भेष) धारण कर आसपास के क्षेत्रों में आतंक फैलाने वाले चोर-डाकुओं से आम जन की रक्षा करती थी। इसके साथ ही, मेवाड़ क्षेत्र से गुजरने वाले राजकीय खजाने और राजा-महाराजाओं के माल (खाद्य सामग्री, सैन्य सामग्री) को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में मदद करती थी।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1832 तत्कालीन मेवाड़ शासक के दरबार में वीरांगना पूरी बाई की सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें इस क्षेत्र की 172 बीघा जमीन जागीर के रूप में दी गई थी।

वल्लभनगर तहसील में उदयपुर-चित्तौड़गढ़ राष्ट्रिय राजमार्ग पर स्थित मेनार-मंगलवाड़ चौराहा अब “कीर की चौकी” के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ राष्ट्रिय राजमार्ग के समीप ही उनकी एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो वहाँ से गुजरने वाले राहगीरों के आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है।

19वीं शताब्दी में राजस्थान के भील विद्रोह के दौरान पूरी बाई ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के खिलाफ अभूतपूर्व साहस और नेतृत्व का परिचय दिया था। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार इन्होंने सेना का गठन कर अंग्रेजों की चौकियों पर रणनीतिक “छापामार युद्ध” का नेतृत्व किया था।

प्रामाणिक स्त्रोतों के आभाव में भी आज भी पूरी बाई लोककथाओं और मौखिक परम्पराओं में जीवित है।

वीरांगना पूरी बाई की मुख्य उपलब्धियां

> उन्होंने अपनी सेना बनाई और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
>उन्होंने कई लड़ाइयां जीतीं।
>उन्होंने ग्वालियर के पास एक लड़ाई में अंग्रेजों को हरा दिया।
>उन्होंने कीर समाज के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।

पूरी बाई भारत की एक महान स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भी लोहा लिया था।

ईस्ट इंडिया कंपनी से संघर्ष

ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, पूरी बाई का संबंध 19वीं सदी के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों से भी जोड़ा जाता है। इनका जन्म 1797 में केराव (मेवाड़) गाँव में हुआ था। इनका विवाह एक स्थानीय सामंत उदय सिंह से हुआ था, जिनकी 1821 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुए संघर्ष के दौरान हत्या कर दी गई।

पति के बलिदान के पश्चात पूरी बाई ने हथियार उठाए और ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। 1828 तक चले इस जन-विद्रोह के बाद उन्हें अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिया गया। रिहा होने के बाद उन्होंने 1869 में अपनी अंतिम सांस तक निर्वासन का जीवन जिया।

कीर समुदाय और पुरे राजस्थान में इन्हें साहस, स्वाभिमान और ब्रिटिश प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

पुरी बाई कीर के जीवन की कुछ उल्लेखनीय घटनाएँ इस प्रकार हैं:

1797: राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के केराव गाँव में जन्म.

1821: उदय सिंह से शादी, जो एक स्थानीय सरदार थे, जिनकी अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी.

1821-1828: अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया.

1828: पराजित और बंदी बनाये गये.

1869: जेल से रिहा किया गया और अपनी मृत्यु तक निर्वासन में रहीं.

पुरी बाई कीर की विरासत साहस, प्रतिरोध और बलिदान की है। वह राजस्थान के लोगों के लिए एक नायिका और दुनिया भर की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं।