अमरा भगत जी (अनगढ़ बावजी) का इतिहास और जीवन परिचय | Angadh Bavji History

संत अमरा भगत जी (अनगढ़ बावजी): चित्तौड़गढ़ की पावन धरा प्राचीन काल से ही भक्ति और शक्ति का प्रमुख केंद्र रही है। मीराबाई की अनन्य भक्ति से लेकर वीर योद्धाओं के त्याग तक, इस भूमि ने भारत को कई महान विभूतियाँ दी हैं। इसी पवित्र धरा पर महान संत और लोकदेवता अमरा भगत जी का जन्म हुआ।

अमरा भगत जी ने जिस स्थान पर तपस्या की उस स्थान पर उन्होंने बिना नक्काशी या तराशे एक प्रतिमा (मूर्ति) की स्थापना की, जिसे “अनगढ़ बावजी” के नाम से जाना जाता है। राजस्थानी भाषा में ‘अनगढ़’ का अर्थ बिना गढ़े/तराशे से है और ‘बावजी’ का अर्थ ‘भगवान’ होता है।

संत श्री अमरा भगत जी भगवान श्री कृष्ण के उपासक थे। इन्होंने बाल्यकाल से ही कई लीलाएँ दिखाई।

अनगढ़ बावजी धाम, नरबदिया (Angadh Bavji Narbadiya, Chittorgarh) और अमरा भगत जी की तपोस्थली राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील के नरबदिया गाँव में स्थित है। जिसकी दुरी जिला मुख्यालय से करीब 38 किलोमीटर है।

इस लेख में अमरा भगत जी का सम्पूर्ण इतिहास, उनके माता-पिता, जन्म स्थान, बाल्यकाल और जीवन से जुड़े अलौकिक चमत्कारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

संत अमरा भगत जी का जीवन परिचय

इनका जन्म 9 अगस्त 1898 को (कृष्ण जन्माष्टमी) को हुआ था। इसलिए प्रतिवर्ष कृष्ण जन्मोत्सव के साथ ही इनका जन्मोत्सव भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

विवरणपरिचय
पूरा नामअमरा जी भगत
जाती/समाजधनगर (गाडरी)
जन्म तिथि9 अगस्त 1898, मंगलवार (विक्रम संवत 1942).
जन्म तिथिकृष्ण जन्माष्टमी (श्रावण माह)
माता का नामदाखीबाई
पिता का नामराम लाल जी
जन्म स्थानगाँव नरबदिया (चित्तौड़गढ़, राजस्थान)
समाधी तिथिसन 1951 (वि.सं. 2006) श्रावण सुदी 9, बुधवार
उपाधिलोकदेवता और संत
समाधीजीवित समाधी (नरबदिया)

अमरा भगत जी के जन्म की कहानी

नरबदिया गाँव के दम्पति रामा जी (राम लाल जी) और उनकी धर्मपत्नी दाखीबाई के घर लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई। संतान प्राप्ति की कामना को लेकर वे बाँसी नामक गाँव जो कि चित्तौड़गढ़ जिले में ही स्थित है, वहां सिद्ध संत श्री धुन्दलमल स्वामी जी पावन धूणी पर गए।

प्रचलित किंवदंतियों और लोक-मान्यताओं के अनुसार, धुन्दलमल स्वामी जी के दिव्य आशीर्वाद से ही दाखीबाई की गोद हरी हुई। समय बीतने के साथ, विक्रम संवत 1942 (9 अगस्त 1898) को भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र पर्व पर उनके घर पुत्र रत्न के रूप में बालक का जन्म हुआ।

बालक अमरा भगत जी के जन्म के साथ एक अलौकिक घटना जुड़ी हुई है। जन्म के शुरूआती 9 दिनों तक बालक ने अपनी माता का दूध नहीं पिया। माता-पिता और परिजन इस बात से बहुत चिंतित थे।

परन्तु, जैसे ही जन्म के 9वें दिन सनातन परंपरा के अनुसार सूरज पूजन (सूर्य दर्शन) का धार्मिक संस्कार संपन्न हुआ, बालक ने पहली बार माता का दूध मुंह लगाया। इस अलौकिक दृश्य को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह गया। इस घटना के बाद आसपास के पुरे क्षेत्र में यह सन्देश फैल गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि एक दिव्य अवतार हैं।

महामारी से रक्षा

1910 से 1920 के बीच इस इलाके में प्लेग और लाल बुखार (Scarlet Fever) जैसी घातक महामारियों ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया था, तब अमरा जी भगत ने अनगढ़ बावजी की तपोस्थली पर बैठकर कठोर तपस्या की थी।

अपनी अलौकिक आध्यात्मिक शक्ति से उन्होंने पुरे क्षेत्र को इस महामारी से सुरक्षित रखा। आज भी लोग कहते है कि उस समय आसपास के गाँवों में इस बीमारी से किसी भी व्यक्ति की अकाल मृत्यु नहीं हुई। इस महान जनसेवा और चमत्कार के बाद श्रद्धालुओं का विश्वास संत अमरा भगत जी और अनगढ़ बावजी के प्रति अटूट हो गया।

अनगढ़ बावजी का नाम कैसे पड़ा?

संत अमरा भगत जी की तपोस्थली को “अनगढ़ बावजी” के नाम से जाना जाता है। इस पावन नाम के पीछे एक विशेष धार्मिक मान्यता और इतिहास है:

अनगढ़ का शाब्दिक अर्थ: ‘अनगढ़’ का तात्पर्य है- बिना गढ़ा हुआ, यानि जिसे छेनी या हथौड़ी से तराशा अथवा कोई मानव-निर्मित आकार न दिया गया हो अथवा स्वयंभू / प्राकृतिक।

बावजी का अर्थ: मेवाड़ व राजस्थानी लोक-संस्कृति में ‘बावजी’ शब्द का प्रयोग ‘भगवान’ या अति-पूज्यनीय संत के लिए किया जाता है।

जिस स्थान पर अमरा भगत जी ने तप किया, वहाँ स्थापित प्रतिमा को कोई कृत्रिम रूप या नक्काशी नहीं दी गई है। यह प्रतिमा जिस अमूर्त स्वरुप में थी, आज भी उसी मूल रूप में विद्यमान है। बिना गढ़ी होने के कारण ही इस पावन स्वरुप मूर्ति को “अनगढ़ बावजी‘ कहा जाता है।

अमरा भगत जी के चमत्कार की पहली कहानी

किंवदंतियों के अनुसार एक बार नरबदिया गाँव का एक समूह चार धाम की यात्रा करने के लिए निकला, अमरा भगत जी भी उनमें से एक थे। इस समय के दौरान रक्षाबंधन (राखी) का त्यौहार आया। जब अमरा भगत जी घर पर नहीं थे, तो उनके माता-पिता ने त्यौहार के अवसर पर घर में कोई भी पकवान नहीं बनाया।

यह अमरा भगत जी भाँप गए। उन्हें उनके माता-पिता की मनोदशा समझ आ गई। सभी मित्र भोजन बनाने की तैयारी कर रहे थे। अमरा भगत जी ने उनसे कहा कि आप खाना बनाओ तब तक मैं नहाकर आता हूँ। इतना कहते ही वहाँ पर एक सरोवर में उन्होंने डुबकी लगाई और नरबदिया में जा निकले।

अमरा भगत जी उनके गाँव में स्थित “चारभुजा मंदिर” में बैठकर माला का जाप करने लगे। जब उनकी माता चारभुजा नाथ को त्यौहार के अवसर पर भोग लगाने पहुंची तो, वहाँ अपने पुत्र को देखकर आश्चर्य चकित रह गई। पहले भगवान को भोग लगाने के लिए एक ही बर्तन का प्रयोग होता था।

जब उनकी माता ने देखा की अमरा जी भगत भगवान की तपस्या में लीन हैं, तो वह भोग का प्याला वहाँ रखकर वापस चली गई।अपने बेटे को सकुशल देखकर उन्होंने घर जाकर पकवान बनाए। उनकी माता के वहाँ से जाते ही अमरा भगत जी ने वह प्याला उठाया और पुनः द्वारकाधीश पहुँच गए जहाँ पर उनके साथी उनका इन्तजार कर रहे थे।

जब उनके साथियों ने चारभुजा नाथ के भोग लगाने का प्याला देखा तो उनके होश उड़ गए। उस दिन सभी साथियों ने अमरा भगत जी का चमत्कार देखा। यह चमत्कार देख कर उनके साथी और आस-पास के लोग उन्हें भगवान का रूप मानने लगे। राजस्थान में संत अमरा भगत जी को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता हैं।

अमरा भगत जी के चमत्कार की दूसरी कहानी

अमरा भगत जी के चमत्कारों से सम्बंधित दूसरी कहानी उनके समाधी के समय की हैं। सन 1951 (वि.सं. 2006) श्रावण सुदी 9, बुधवार के दिन अमरा भगत जी ने समाधी ली थी। अमरा भगत जी ने खुद अपने हाथों से समाधी स्थल तैयार किया और आस-पास के लोगों और उनके अनुयायों के इस बारे में अवगत करवाया।

समाधी की जानकारी प्रसाशन को भी दी गई। जब सिपाही वहाँ पहुंचे तब तक संत अमरा भगत जी समाधी ले चुके थे, तभी सिपाहियों ने उस समाधी पर रखे पत्थर को हटाया और अंदर देखा तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने देखा की समाधी के अंदर शेर बैठा हैं. यह दृश्य देखकर सिपाही पुनः लौट गए।

लोगों की मदद से जिस स्थान को सिपाहियों ने हटाया उसको पुनः समाधी का रूप दिया गया। यह एक बहुत बड़ी चमत्कारिक घटना थी।

अमरा भगत जी चमत्कार की तीसरी कहानी

जब अमरा भगत जी छोटे थे तब उनके माता-पिता कृषि कार्य करने के लिए बच्चे को भी साथ में लेकर जाते थे। जब माता-पिता खेत में काम करते तब वो बालक को एक झूले में जिसे मेवाड़ की बोलचाल की भाषा में पालना कहा जाता हैं, में सुलाकर काम करते थे। एक बार की बात हैं, काम करते-करते उनकी माता दाखीबाई उनको दूध पिलाने और बच्चे को देखने आई।

जब वह झूले (पालना) के पास पहुंची तो उन्होंने देखा की एक साँप अपने फन (मुँह से बनाया विशेष आकार) की छाया कर बैठा हैं। यह देखकर उनकी माता चीख पड़ी लेकिन बच्चा आराम से हँसता खेल रहा था।

अमरा भगत जी का साँवरिया सेठ से सम्बन्ध

संत और लोकदेवता अमरा भगत जी का मंडपिया स्थित साँवरिया सेठ मंदिर से विशेष सम्बन्ध हैं। अमरा भगत जी सांवरिया मंदिर परिसर में स्थित “आमलिया बावजी” नामक स्थान पर भी तपस्या करते थे। यह सांवरिया जी मंदिर के पीछे की तरफ स्थित हैं। ऐसी मान्यता हैं की साँवरिया के दर्शन करने वाले प्रत्येक श्रदालु को आमलिया बावजी के भी दर्शन करने चाहिए।

क्या अनगढ़ बावजी और अमरा भगत जी एक ही हैं?

नहीं, अनगढ़ बावजी वह स्थान हैं, जहाँ पर बैठकर अमरा भगत जी तपस्या करते थे, दोनों अलग-अलग है।

अनगढ़ बावजी धनगर (गाडरी) समाज के आराध्य

अनगढ़ बावजी अखिल भारतीय धनगर, गाडरी, पाल, बघेल, गड़रिया और होल्कर समाज के आराध्य देव के रूप में सम्पूर्ण भारत में विख्यात हैं। समय के साथ-साथ इस स्थान की महिमा और गरिमा बढ़ती जा रही हैं। अमरा भगत जी के जन्मदिवस और जन्माष्टमी के अवसर पर पुरे भारत और आस-पास के क्षेत्रों से हजारों की तादाद में श्रदालु आते हैं।

धनगर समाज द्वारा प्रतिवर्ष विशाल वाहन रैली का आयोजन भी किया जाता हैं। अनगढ़ बावजी (Angadh Bavji) के स्थान की देख रेख के लिए “अमरा भगत सेवा संस्थान कमेटी” भी बनी हुई हैं, जो इस स्थान की देखरेख का काम करती हैं और प्रतिवर्ष जन्माष्टमी और अमरा भगत जी के जन्मोत्सव पर विशाल मेले का आयोजन करवाती हैं।

यहाँ पर हर महीने की अमावस्या के दिन दानपात्र खोला जाता हैं, जिसमें लाखों रुपये चढ़ावे के निकलते हैं।

अमरा भगत जी का सामाजिक योगदान

अनगढ़ बावजी के अनन्य भक्त अमरा भगत जी ने समाज में फैली कुरीतियों, समाज सुधार, शिक्षा और भगवान के प्रति आस्था पर विशेष बल दिया था।

अमरा भगत जी का पेनोरमा

राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले में भदेसर तहसील के गाँव दौलतपुरा (ग्राम पंचायत बागुंड) में धनगर समाज के आराध्य लोकदेवता और संत अमरा जी भगत (अनगढ़ बावजी) का पेनोरमा का निर्माण करवा रही हैं।

यहाँ बनने वाले पेनोरमा में मुख्य भवन, सभागार, हॉल, पुस्तकालय, प्रतिमा, छतरी, शिलालेख, स्कल्पचर्स, ऑडियो-वीडियो सिस्टम जैसे विभिन्न कार्य होंगे जिसका निर्माण कार्य पर्यटन विकास कोष की सहायता से किया जाएगा। यहाँ से आपको भगवान अनगढ़ बावजी और संत अमरा जी भगत के बारें में सम्पूर्ण जानकारी मिल सकेगी।