लाखोटा बारी चित्तौड़गढ़ का इतिहास और रहस्य | Lakhota Baari Chittorgarh History

लाखोटा बारी (Lakhota Baari) चित्तौड़गढ़ फोर्ट के उत्तरी छोर पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक उत्तरमुखी गुप्त द्वार है। स्थापत्य कला के अद्भत संरक्षक महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित यह गुप्त द्वार मेवाड़ की सामरिक सुरक्षा (Strategic Security) व्यवस्था का एक अटूट हिस्सा रहा है।

भारतीय इतिहास में चित्तौड़गढ़ का इतिहास अपनी अभेद्य बनावट, अदम्य साहस और भक्ति की गाथाओं के लिए जाना जाता है। लाखोटा बारी वही स्थान है, जहाँ सन 1567 ईस्वी में मुग़ल आक्रांता अकबर के आक्रमण के समय मेवाड़ के शूरवीर सेनापति जयमल राठौड़ को तैनात किया गया था।

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (जौहर) और रणनीति में लाखोटा बारी की अहम भूमिका रही।

लाखोटा बारी का इतिहास (History Of Lakhota Baari)

मुख्य विवरणजानकारी
नामलाखोटा बारी या उत्तरमुखी गुप्त द्वार
निर्माताराणा कुम्भा
स्थानचित्तौड़गढ़ दुर्ग (उत्तरी छोर)
दिशाचित्तौड़गढ़ दुर्ग की उत्तर दिशा में
प्रसिद्धि का कारणचित्तौड़गढ़ का तीसरा साका (1567 ई.) जयमल राठौड़ का बलिदान

लाखोटा बारी नाम क्यों पड़ा?

चित्तौड़गढ़ का इतिहास हमारे लिए गर्व का विषय हैं। चित्तौड़गढ़ के कण-कण में वीरता की गाथाएँ, त्याग और बलिदान के किस्से छिपे हुए हैं। यहाँ पर लाखों सैनिकों ने अपनी मातृभूमि की आन-बान और शान के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दी।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर शायद ही ऐसा कोई स्थान या कण होगा जो रक्त से रंजीत ना हो, लाखोटा बारी भी इनमें से एक हैं। यहाँ सवा लाख सर कटे थे, यही वजह हैं कि इस स्थान को लाखोटा बारी के नाम से जाना जाता हैं

लाखोटा बारी का निर्माण और सामरिक महत्त्व

किले के उत्तरी छोर पर स्थित यह द्वार एक गुप्त द्वार हैं, जिसका निर्माण राणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था। इसी द्वार की जिम्मेदारी जयमल राठौड़ के पास थी। अकबर द्वारा 1567 ईस्वी के हमले के समय चित्तौड़गढ़ दुर्ग की सुरक्षा का दायित्व मेड़ता के जयमल जी राठौड़ के पास था।

अंदर की तरफ जयमल जी तैनात थे, वहीं बाहर की तरफ निचे नगरी नामक गाँव था (अब यह गाँव मानपुरा के नाम से जाना जाता हैं जबकि उस समय नगरी यहाँ तक फैली हुई थी) जहाँ पर अकबर ने अपना तोपखाना स्थापित कर रखा था और हाथी भी बाँध रखे थे। इतना ही नहीं अकबर का स्वयं का कैंप (तम्बू) यहीं लगा हुआ था।

अक्टूबर माह में अकबर (Akbar) की सेना यहाँ आ चुकी थी, लेकिन जनवरी का माह आ जाने के बाद भी अकबर ना तो इस किले पर आक्रमण कर पाया और ना ही उसे ऐसा लग रहा था कि वह इसे जीत पाएगा। तभी अकबर के सिपाही और सलाहकारों ने सुझाव दिया की बादशाह हमारे लिए यह दुर्ग जीतना संभव नहीं हैं, हम संधि कर लेते हैं। लेकिन अकबर ने कुछ दिन और इन्तजार करना उचित समझा।

संधि प्रस्ताव हाथ में लिए जब ईसरदास चौहान वापस किले की तरफ लौट रहे थे, तब अकबर ने टोडरमल से कहा की यह कौन हैं? जिसने मुजरा पेश (सलाम) नहीं किया, इसको वापस बुलाओ। जब अकबर का दूत गया और उसने ईसरदास से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा सही समय आने पर मुजरा पेश किया जाएगा

ईसरदास चौहान और अकबर की मुलाकात लाखोटा बारी दरवाजे पर ही हुई थी। अकबर की ओर से धावा बोल दिया गया।

जब भी बारूद लगाकर अकबर की सेना द्वारा इस द्वार को तोड़ने का प्रयास किया जाता, वहां पर मौजूद सैनिकों द्वारा रात्रि के समय इसका पुनर्निर्माण कर दिया जाता।

एक बार जयमल जी राठौड़ की देखरेख में लाखोटा बारी के समीप टूटी हुई दीवार का पुर्ननिर्माण हो रहा था, तभी अकबर की सेना द्वारा दागी गई गोली जयमल राठौड़ के दाएँ पैर पर लगी और वो घायल हो गए। जयमल जी राठौड़ के घायल होने के बाद ही इस द्वार को खोला गया ताकि अकबर की सेना से युद्ध किया जा सके।

किले से उतरकर ईसरदास चौहान और साहिब खान (अफगान बंदूकची) अकबर से मिलने गए।

इस समय किले पर मात्र 8000 सैनिक थे, जबकि अकबर के पास लाखों की तादाद में सैनिक थे। युद्ध शुरू हो चूका था। अकबर की सेना में मधुकर नाम का एक हाथी था, जिसकी सूंड में खंजर मारकर और दाँत पर पैर देकर ईसरदास चौहान ऊपर चढ़े और महावत पर वार करते हुए अबुल फजल (अकबर का लेखक) से कहा की जाकर अकबर को मेरा मुजरा पेश करना।

लाखोटा बारी (Lakhota Baari) चित्तौड़गढ़ दुर्ग का केवल एक गुप्त द्वार नहीं हैं, इसके अनकहे इतिहास के बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। चाहे दुर्ग प्राचीर की मरम्मत का कार्य हो या मुग़ल सेना को कड़ा जवाब देना, लाखोटा बारी रणनीति और अदम्य साहस का मुख्य साक्षी बना।