चित्तौड़ का तीसरा जौहर कब और क्यों हुआ?

चित्तौड़ का तीसरा जौहर या चित्तौड़ का तीसरा साका अकबर के आक्रमण के समय हुआ। इस समय चित्तौड़ के राजा महाराणा उदयसिंह थे। चित्तौड़ का तीसरा साका या चित्तौड़ का तीसरा जौहर कब हुआ था? चित्तौड़ का तीसरा साका या चित्तौड़ का तीसरा जौहर 1567 ईस्वी के अक्टूबर माह में हुआ। इस समय चित्तौड़ किले […]

चित्तौड़ का दूसरा जौहर कब और क्यों हुआ?

चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर राजमाता कर्मावती या कर्णावती के समय हुआ था। चित्तौड़ के प्रथम साका की तरह, चित्तौड़ का दूसरा साका या चित्तौड़ का दूसरा जौहर  भी विश्व प्रसिद्ध है। यह भी पढ़ें- जौहर किसे कहते हैं ? भारत का प्रथम जौहर कब हुआ था ,जानें जौहर का इतिहास।

चित्तौड़ का पहला जौहर कब और क्यों हुआ?

चित्तौड़ का पहला साका (chittor ka saka) या फिर यह कहे कि चित्तौड़ का पहला जौहर तो यह विश्व प्रसिद्ध है। यह किस लिए प्रसिद्ध है कि चित्तौड़ के प्रथम जौहर में रानी पद्मावती ने स्वयं को 16000 क्षत्राणियों के साथ अग्नि के हवाले कर दिया था। रानियों ने अपनी पवित्रता की रक्षार्थ “जय-हर, जय-हर” का

जौहर किसे कहते हैं? भारत का प्रथम जौहर कब हुआ था, जानें जौहर का इतिहास

(भारत का प्रथम जौहर) जौहर का शाब्दिक अर्थ होता है “सबका कल्याण करने वाली प्रकृति की जय” हैं। प्रकृति के प्रति संपूर्ण समर्पण का भाव ही सही मायने में जौहर का अर्थ है। इस लेख के द्वारा आप भारत का प्रथम जौहर, जौहर का अर्थ ,जौहर किसे कहते हैं और जौहर का इतिहास जान सकेंगे। जौहर

महाराणा प्रताप की जीत के प्रमाण || Evidence of Maharana Pratap's victory

महाराणा प्रताप की जीत के प्रमाण– अकबर कभी जीता नहीं और महाराणा कभी हारे नहीं, अकबर की सेना में दम था लेकिन महाराणा के सीने में दम था। हम कैसे मान लें कि महाराणा प्रताप के नाम से कांपने वाला अकबर उन्हें युद्ध में हरा देगा। 1576 ईस्वी में हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप

चित्तौड़गढ़ के राजा की कहानी और चित्तौड़गढ़ के राजा का नाम क्या था?

चित्तौड़गढ़ के राजा की कहानी और चित्तौड़गढ़ के राजा का नाम जानने से पहले बता दें कि चित्तौड़गढ़ राजस्थान राज्य का एक ज़िला हैं जिसे शौर्य, पराक्रम, भक्ति और शक्ति के साथ ही ऐतिहासिक शहर के रुप में याद किया जाता हैं। चित्तौड़गढ़ का प्राचीन नाम चित्रकूट था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भीम भी चित्तौड़

चित्रांगद मौर्य कौन थे? || History Of Chitrangada Maurya

चित्रांगद मौर्य/चित्रांगद मोरी (Chitrangada Maurya) के इतिहास की गवाही देता सदियों से चित्तौड़गढ़ दुर्ग खड़ा हैं। कई बड़े -बड़े महारथी राजा महाराजा आए और चले गए लेकिन वीरों की चित्तौड़गढ़ का क़िला ज्यों का त्यों खड़ा हैं। आज भी किले को छूकर बहने वाली हवा चित्रांगद मौर्य की वाह वाही करती हैं। चित्रांगद मौर्य/चित्रांगद मोरी

समाधिश्वर महादेव मंदिर || History Of Samadhishwar Temple Chittorgarh

समाधिश्वर महादेव का मंदिर, चित्तौड़गढ़/समृद्धेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध त्रिभुवन नारायण मंदिर ( तीन मूर्ति शिवजी की) चित्तौड़गढ़ किले पर स्थित बहुत ही प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर है। चित्तौड़गढ़ किले पर स्थित ऐतिहासिक स्मारकों में शामिल “विजय स्तंभ” के समीप और गौमुख कुण्ड के उत्तरी छौर पर यह मंदिर (समाधिश्वर महादेव का मंदिर, चित्तौड़गढ़)

गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया किसने कहा था?

गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया ( garh to chittorgarh baki sab gadhaiya) यह कहावत प्रचलित हैं। लेकिन ऐसा क्यों कहा जाता है इसके पीछे की मुख्य वजह इस किले की बनावट, यहां का इतिहास, संस्कृति और कला है। संपूर्ण भारत का इतिहास उठा कर देखा जाए तो पूरे देश में किलों की कोई कमी

राजा मान मोरी का इतिहास || History Of Raja Maan Mori

मान मोरी या राजा मौन को उनके वंश का अंतिम शासक कहा जाता है, जिन्होंने चित्तौड़ में मानसरोवर झील का निर्माण करवाया था। राजा मान मोरी ने गहलोत वंश के बप्पा रावल को अपने राज्य में आश्रय दिया था। उज्जैन का यह मोरी वंश इतिहास के पन्नों और किताबों से लगभग गायब हो गया है।

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