शक्तिसिंह

कुँवर शक्तिसिंह का इतिहास (महाराणा प्रताप के भाई).

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शक्तिसिंह का इतिहास ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं. शक्ति सिंह को उनके द्वारा महाराणा प्रताप और मेवाड़ के साथ किए गए विश्वासघात के लिए याद किया जाता हैं लेकिन यह गलत है. शक्तिसिंह और महाराणा प्रताप के बीच अनबन जरूर थी लेकिन वह गद्दार नहीं थे. शक्तिसिंह के 17 पुत्र थे.

शक्ति सिंह के पिता का नाम महाराणा उदयसिंह द्वितीय तथा माता का नाम सज्जाबाई सोलंकिनी था. महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह दोनों भाई थे लेकिन सगे नहीं. महाराणा उदयसिंह द्वितीय की दूसरी पत्नी से शक्तिसिंह का जन्म हुआ था. शक्ति सिंह के सगे भाई का नाम वीरमदेव था. शक्तिसिंह के घोड़े का नाम त्राटक था जो कि महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का भाई था.

शक्तिसिंह का इतिहास और जीवन परिचय (Kunwar Shakti Singh History In Hindi)

पूरा नामकुंवर शक्ति सिंह सिसोदिया.
जन्म वर्ष-1540 ईस्वी.
पिता का नाममहाराणा उदय सिंह द्वितीय.
माता का नामरानी सज्जाबाई सोलंकिनी.
शक्ति सिंह की पत्नी का नामअज्ञात
शक्ति सिंह की पुत्री/पुत्र का नामसुरसिंह
शक्ति सिंह के घोड़े का नामत्राटक
मृत्यु-1594 ईस्वी.
मृत्यु के समय आयु54 वर्ष.
शक्ति सिंह की छतरीभैंसरोडगढ़.
Kunwar Shakti Singh History In Hindi

शक्ति सिंह महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे, जिन्हें महाराणा प्रताप अत्यधिक प्रेम करते थे. महाराणा उदयसिंह द्वितीय की छोटी रानी सज्जाबाई सोलंकिनी ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनका नाम शक्तिसिंह और वीरमदेव था. महाराणा प्रताप द्वारा अपने छोटे भाइयों को अत्यधिक प्रेम दिए जाने के बाद भी रानी सज्जाबाई सोलंकीनी महाराणा प्रताप को पसंद नहीं करती थी.

बड़े भाई होने के नाते महाराणा प्रताप को शक्ति सिंह से अत्यधिक प्रेम था, बाल्यकाल में दोनों भाइयों में किसी तरह का झगड़ा और मनमुटाव नहीं था. महाराणा उदयसिंह के दरबार में प्रताप सिंह और शक्ति सिंह दोनों मौजूद थे जो लगभग युवा हो चुके थे. महाराणा उदय सिंह के दरबार में एक तलवार का परीक्षण चल रहा था.

महाराणा प्रताप ने उस तलवार से एक कपड़े के दो टुकड़े कर दिए. वहीं दूसरी तरफ शक्ति सिंह ने अपनी बहादुरी का परिचय देने के लिए तलवार की धार पर अंगूठा रखा और काटते हुए बोला की तलवार की धार अच्छी है. इस घटना से मेवाड़ के शासक महाराणा उदय सिंह द्वितीय आक्रोशित हो गए और उन्होंने अपने छोटे बेटे शक्तिसिंह को दरबार से बाहर जाने का आदेश दिया.

भरी सभा में इस तरह से तिरस्कार किए जाने से कुंवर शक्तिसिंह नाराज हो गए और दरबार से बाहर चले गए.

शक्तिसिंह के संबंध में अबुल फजल लिखते हैं

मुगल आक्रांता अकबर के दरबारी अबुल फजल ने शक्तिसिंह को “शक्ता” नाम से पुकारा था. अबुल फजल ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम था “अकबरनामा” जिसमें उन्होंने बताया कि 31 अगस्त 1567 ईस्वी में धौलपुर में उनकी मुलाकात मेवाड़ के कुंवर शक्तिसिंह से हुई.

अबुल फजल यह जानते थे की शक्ति सिंह, महाराणा उदयसिंह अर्थात अपने पिता से नाराज हैं क्योंकि उन्होंने कुंवर शक्तिसिंह को दरबार से बाहर निकाल दिया था.

इसका फायदा उठाने के लिए अकबर ने शक्ति सिंह से कहा कि हम चित्तौड़गढ़ के महाराणा उदय सिंह के खिलाफ युद्ध करने जा रहे हैं, अगर तुम चाहो तो हमारा साथ दे सकते हो. यह सुनकर शक्ति सिंह को मन ही मन बहुत गुस्सा आया और वह बिना कुछ कहे वहां से चले गए.

कुछ इतिहासकार बताते हैं कि कुंवर शक्ति सिंह वहां से चित्तौड़गढ़ पहुंचे और अकबर के हमले की सूचना दी. कुंवर शक्तिसिंह के संबंध में यह जानकारी जरूर मिलती है कि वह मुगलों से जाकर मिले थे. लेकिन यह कोरी अफवाह लगती है कि उन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ा था. 

महाराणा प्रताप से शक्तिसिंह की अनबन क्यों हुई?

महाराणा उदयसिंह द्वितीय द्वारा शक्ति सिंह को दरबार से निकाले जाने के बाद, वह थोड़ा नाराज तो वह था ही. धीरे-धीरे समय बीतता गया महाराणा उदय सिंह अपनी रानी की बातों में आकर महाराणा प्रताप की जगह जगमाल को मेवाड़ का महाराणा बना दिया और महाराणा उदय सिंह जी का देहांत हो गया.

लेकिन महाराणा प्रताप को मेवाड़ के सामंतों और राजपुरोहित ने मिलकर मेवाड़ का महाराणा घोषित कर दिया. 1 दिन महाराणा प्रताप शिकार करने के लिए जंगल में गए, जहां पर शिकार करने आए शक्तिसिंह से उनकी मुठभेड़ हुई.

जैसे ही महाराणा प्रताप ने शक्ति सिंह को अपने सामने देखा बहुत प्रसन्न हुए और उनके समीप गए. दूसरी तरफ महाराणा प्रताप को देखकर शक्ति सिंह को तनिक भी खुशी नहीं हुई. दोनों एक जंगली सूअर का पीछा करते हुए आमने-सामने हो गए थे.

महाराणा प्रताप ने उस सूअर का शिकार करने के लिए अपना धनुष निकाला ठीक उसी समय उसी सूअर को मारने के लिए शक्तिसिंह ने भी बाण उठाया. महाराणा प्रताप का तीर सीधा सूअर को जाकर लगा और वह मर गया. लेकिन शक्तिसिंह ने कहा कि यह मेरे तीर से मरा है, इसलिए इस शिकार पर मेरा अधिकार है.

बातों ही बातों में दोनों में झगड़ा हो गया और दोनों भाई युद्ध करने लगे. जब इस युद्ध के बारे में वहां से गुजर रहे मेवाड़ के कुछ सामंतों और पुरोहितों को पता चला तो वह तुरंत उन दोनों के पास गए और दोनों को युद्ध रोकने के लिए कहा. लेकिन उस समय दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे क्योंकि शक्तिसिंह ने महाराणा प्रताप को अपशब्द कहे.

तभी वहां पर मौजूद एक ब्राम्हण (पुरोहित) मैं सोचा कि यदि दोनों में से एक की भी मृत्यु हो गई तो मेवाड़ पर कलंक लग जाएगा. वहां पर मौजूद राजपुरोहित नारायण दास पालीवाल ने तलवार लेकर स्वयं के सीने में गोप ली और उनकी मृत्यु हो गई. किस तरह एक ब्राह्मण की मृत्यु से महाराणा प्रताप बहुत आहत हुए और अपने महलों में लौट आए.

ऐसा कहते हैं कि महाराणा प्रताप ने स्वयं राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल का अंतिम संस्कार किया था. इस घटना से महाराणा प्रताप इतने आहत हुए कि उन्होंने अपने प्रिय छोटे भाई शक्ति सिंह को राज्य से बाहर जाने का दण्ड दिया. यही वह घटना थी जिसके चलते महाराणा प्रताप और शक्तिसिंह के बीच अनबन हुई थी.

महाराणा प्रताप द्वारा राज्य से निष्कासित करने के बाद शक्तिसिंह का जीवन

महाराणा प्रताप द्वारा कुंवर शक्ति सिंह को राज्य से निष्कासित करने के बाद निराश हताश शक्ति सिंह वर्ष 1572 ईस्वी से लेकर 1576 ईस्वी तक डूंगरपुर में वहां के रावल आसकरण के साथ रहे, ऐसी जानकारी इतिहास के पन्नों से प्राप्त होती हैं.

वर्ष 1576 में कुंवर शक्ति सिंह मुगलों से जा मिले. हालांकि शक्ति सिंह ने कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की और इतिहास में ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं मिलता है.

क्या शक्ति सिंह ने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ा था? इस संबंध में एक भी ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है जिसके संदर्भ में यह कहा जा सके कि महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह ने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ा था.

अगर महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह हल्दीघाटी के युद्ध में अपने भाई और मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ते तो उसी युद्ध में मौजूद अब्दुल कादिर बदायूनी उनके संबंध में जरूर लिखता लेकिन ऐसा कहीं लिखा हुआ नहीं है.

इस आधार पर हम कह सकते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में शक्ति सिंह हैं अकबर की तरफ से नहीं लड़े थे. यह कथित रूप से कुछ इतिहासकारों द्वारा शक्तिसिंह पर लगाया गया एक कलंक ही था कि वह मेवाड़ के साथ नहीं थे.

कुंवर शक्तिसिंह द्वारा महाराणा प्रताप की रक्षा

हल्दीघाटी का युद्ध अंतिम चरण पर था. महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया लेकिन वह जैसे तैसे महाराणा प्रताप को लेकर युद्ध भूमि से बाहर जा रहा था. तभी बनास नदी के समीप खुरासान खान और मुल्तान खान नामक दो मुगल सैनिक महाराणा प्रताप का पीछा कर रहे थे. वहां पर कुंवर शक्तिसिंह पहुंच जाते हैं और दोनों मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार देते हैं.

दोनों मुगलों को जहन्नुम में पहुंचाने के बाद कुंवर शक्तिसिंह महाराणा प्रताप के चरणों में गिर जाते हैं और उनसे क्षमा याचना करने लगते हैं. महाराणा प्रताप भाई के प्रति प्रेम और दया दिखाते हुए माफ कर देते हैं.

यहीं पर कुंवर शक्तिसिंह ने महाराणा प्रताप को अपना घोड़ा त्राटक भेंट किया था.

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद शक्तिसिंह

हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो गया और इसमें महाराणा प्रताप ने विजय प्राप्त की. महाराणा प्रताप की जीत के प्रमाण मिले हैं. भींडर के पास वैणगढ़ नामक एक किला मौजूद हैं, जहां पर कुछ मुगल अधिकार किए बैठे थे. जिन्हें शक्तिसिंह ने मौत के घाट उतार दिया और भैंसरोडगढ़ किले पर चढ़ाई करते हुए विजय प्राप्त की.

इस किले को जीतने के बाद कुंवर शक्तिसिंह ने महाराणा प्रताप को कहा कि इस पर आपका अधिकार है. लेकिन महाराणा प्रताप ने यह किला कुंवर शक्तिसिंह को सौंपते हुए राज दरबार की महिलाओं को इस किले में रखने और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी.

कुंवर शक्तिसिंह की मृत्यु

कुंवर शक्तिसिंह की मृत्यु एक गंभीर बीमारी की वजह से हुई थी. वर्ष 1594 ईस्वी में कुंवर शक्तिसिंह की मृत्यु हो गई. मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग 54 वर्ष थी.

कुंवर शक्तिसिंह की मृत्यु के समय उनके बड़े भाई महाराणा प्रताप भी वहां पर मौजूद थे. कहते हैं कि अपने भाई की मृत्यु पर महाराणा प्रताप फूट-फूटकर रोए थे. आज भी भैंसरोडगढ़ में शक्तिसिंह की छतरी मौजूद हैं. शक्तिसिंह की वंशावली की बात की जाए तो “शक्तावत” उन्हीं के वंशज हैं.

यह लेख पढ़ने के बाद आपको समझ में आ गया होगा कि शक्तिसिंह का इतिहास (Kunwar Shakti Singh History In Hindi) जानबूझकर गलत बताया जाता है. वह गलत नहीं थे. हां यह जरूर कह सकते हैं कि उनकी मेवाड़ से नाराजगी थी लेकिन वह कभी मेवाड़ के खिलाफ नहीं गए, ना ही मेवाड़ के खिलाफ युद्ध लड़ा ना ही मुगलों की तरफ से युद्ध लड़ा.


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